बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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इस समय मैंने एक बात पर विशेष रूप से ध्यान दिया—क्या रेल, क्या सड़क
और क्या हाट-बाजार, सभी जगह अशिक्षित जनता में अंग्रेजों के प्रति तीव्र विद्वेष
फैलता जाता था। एक दिन काशी में, बस्ती से बाहर, कुएं की जगत पर बैठकर
एक संयुक्तप्रदेशवासी व्यक्ति के साथ हमारे ही किसी काम की आलोचना हो
रही थी। पास ही एक किसान घास छील रहा था। थोड़ी देर में देखा कि वह
और भी समीप आ गया और घास छीलते-छीलते मुसकराकर पूछने लगा,
“अंग्रेजों का राज्य रहेगा भी या नही ?” हम लोगों ने पूछा, “तुम्हें क्या लगता
है ?” उत्तर मिला, “बाबू, अब ये हिन्दुस्तान में नही ठहर सकते, इनका वक़्त
हो चुका। बाबू, जर्मन लोग कब तक आएंगे ?” तब हम लोगों ने उसे समझाया
कि जर्मनो के आने से हमारा कुछ फ़ायदा नही; किन्तु उसने फिर कहा, “नही
बाबूजी, अग्रेज लोग अब न्याय नही करते, अब इनका चला जाना ही भला है ।”
इस पर हमको जो कहना चाहिए था वही कहा। यहाँ उसका उल्लेख करने की
आवश्यकता नही। मैने देखा कि ‘बाबू लोग’ यदि ऐसे लोगो की बाते सुनकर हाँ
मे हां न मिलाते तो ये बाबुओं को जरा टेढी नजर मे देखने लगते थे ।