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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 68, कुल 408 में से

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पृष्ठ 68

66 / बन्दी जीवन
की जगह में जाकर गायब हो जाना। इसके सिवा घर से चलने के पहले ही मैं खूब
चौकन्ना हो जाता था और जिस दिन खास काम होता उस दिन तो बड़े तड़के
घर से चल देता था। जब लौटकर घर आता तो देखता कि मेरा पीछा करने के
लिए तैनात किए गए पहरेदारजी घर को घेरे हुए इस तरह बैठे हैं गोया मैं घर के
भीतर ही हूँ।
पुलिस के साथ मेरा ऐसा ही सम्बन्ध था। ऐसी ही दशा में तीन बजे दिन
को मैं काशी आ पहुँचा। पुलिस की नज़र बचाकर घर गया और फिर वहाँ से
दादा के डेरे पर। रासबिहारी उस समय काशी में ही थे। किन्तु पुलिस को उस
समय स्वप्न में भी हमारी गतिविधि की कुछ भी जानकारी न थी।
दादा से सलाह करने पर निश्चय हुआ कि युक्त प्रान्त के सैनिकों में भी
विप्लव के विचार फैला देने चाहिएँ। और बंगाल को पंजाब के विद्रोह की खबर
बहुत जल्द दे देनी चाहिए। पाँचवीं दिसम्बर की बाट जोही जाने लगी, क्यों-
कि पृथ्वीसिंह से बातचीत हो जाने पर बंगाल को मेरा जाना निश्चित किया गया
था। इस बीच अब मैं इस ताक में लगा कि काशी की छावनी में—बारकों में—
किस प्रकार मेरी रसाई हो। दो-एक दिन के बाद अखबार में पढ़ा कि अमेरिका
से लौटे हुए कुछ सिक्ख, ताँगे में सवार हो, एक गाँव में जा रहे थे। सन्देह करके
पुलिस उन्हें गिरफ़्तार करने गई तो उनके पास से रिवाल्वर इत्यादि अस्त्र
बरामद हुए। फिर पुलिस जब उन्हें गिरफ़्तार करने को तैयार हुई तब सिक्खों ने
गोली चलाई जिससे एक सिपाही बहुत घायल हो गया। बाद को मालूम हुआ
कि ये किसी खज़ाने को लूटने गए थे। किन्तु इनकी 'होशियारी' की 'तारीफ़'
करनी पड़ती है कि इन पर नज़र पड़ते ही पुलिस को शक हो गया !
ध्यान देने की बात है कि इस मौके पर गाँववालों ने पुलिस को सहायता दी
थी। गाँववालों ने समझा कि पुलिस मामूली उचक्कों और चोरों को गिरफ़्तार
कर रही है। बस, इसी धोखे में आकर उन्होंने पुलिस को मदद दी थी। इससे
कुछ दिन बाद की एक घटना का हाल सुनिए। उस समय विप्लव की तैयारी का
भण्डा फूट चुका था। सारे पंजाब में धर-पकड़ की धूम से विचित्र कोलाहल
मचा हुआ था। पुलिस भाई प्यारासिंह नामक एक सिक्ख युवक को गिरफ़्तार
करने की फ़िक्र में थी। एक दिन ऐसा हुआ कि पुलिस का एक घुड़सवार एक
युवक के पीछे बेतहाशा घोड़ा दौड़ाए जा रहा था। इस दशा में वह युवक तीन
मील के लगभग दौड़ा। घोड़े की दौड़ से बाजी मारने में वह असमर्थ होने पर था
कि उसी के गाँववालों ने आकर उसका रास्ता रोक लिया। पल-भर में पुलिस के
सवार ने आकर बहुत दिनों से भागे हुए आसामी भाई प्यारासिंह को गिरफ़्तार कर
लिया। गाँववालों को जब यह मालूम हुआ कि उन्होंने जिन्हें गिरफ़्तार कराया है
वह उन्हीं के गाँव के सुपरिचित और सभी के परमप्रिय भाई प्यारासिंह हैं, तब
उनके पछतावे का अन्त न रहा। जो लोग कभी इन भाई प्यारासिंह से मिले हैं
वे इनके चरित्र की मधुरता से अवश्य मुग्ध हुए हैं, और उन सभी को स्वीकार