बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाशी में पुलिस के साथ सम्बन्ध / 65
बाहर से काशी में लाये भी, फिर वहां से बाहर भेज भी दिया। मैं एक दिन
सबेरे घर जा रहा था। घर के पास आते ही एकदम भेदिया विभाग के दारोगा
के सामने जा पड़ा। दारोगा अकेला न था, उसके साथ उसका एक अनुचर भी
था। मुझ पर नज़र पड़ते ही वह मुसकराकर आगे बढ़ा और मेरे पास आ खड़ा
हुआ। मैं भी उसी तरह हंस-हंसकर उससे बातचीत करने लगा। "क्या मार्निंग
वाक करने तशरीफ ले गए थे ?" मैंने भी कहा, "जी हां, ज़रा घूम-घाम आया
हूँ।" "यह क्या है ?" कहकर मेरे बुक-पॉकेट की एक छोटी-सी किताब की ओर
उसने अंगुली से इशारा किया। मैंने उसी दम किताब निकालकर दारोगा को दे
दी। उसमें नैपोलियन की कुछ उक्तियां और ऐसे ही दो-एक अन्य विख्यात
पुरुषों के जीवन की कोई-कोई विशेष घटना लिखी हुई थी। उसने खूब देख-
भालकर मुझे किताब लौटा दी। फिर मुसकराकर हम लोग अपनी-अपनी राह
से लगे। उस दिन और उसी समय मेरे कोट के नीचेवाले पॉकेट में गनकाटन
(इस कपास से बम चलाने की बत्ती का पलीता बनता है) और इसी किस्म के
अन्यान्य भीषण पदार्थ भरे हुए थे।
दूर से नज़र पड़ते ही हम लोग ताड़ लेते थे कि यह पुलिस का आदमी है।
मामूली पहरेदारों को तो उनकी जूतियों से ही पहचान लिया जाता था। फिर
ज्यादातर उनके सिर की टोपी, चलन का ढंग और हाथ में छड़ी लेने की रीति—
अपनी विशेषता के कारण—हमारी दृष्टि को धोखे से बचा लेती थी। कभी-
कभी अपने साथियों के कारण ये लोग पहचान लिए जाते थे। सड़क पर चलते
समय हम लोगों को कुछ ऐसी आदत पड़ गई थी जो कि जेल से लौट आने पर
भी बहुत दिन तक बनी रही। वह यह कि सड़क पर चलते समय एकाएक किसी
जगह ठहरकर किसी व्यक्ति से बातचीत करने लगे और उसी अवसर पर आगे-
पीछे नज़र डालकर एक बार भली भांति देख लिया कि कोई पीछा तो नहीं कर
रहा है। सड़क के मोड़ पर जाकर पीछे भेद भरी निगाह डालने की जो आदत
मुझे पड़ गई थी उसके लिए अभी उस दिन लोगों ने खूब मज़ाक किया। अथवा
कोई चीज़ मोल लेने के बहाने किसी दूकान पर ठहरकर या किसी और ढंग से
चलते-चलते एकदम रुककर आगे-पीछे देखे बिना मैं रास्ता चलता ही न था। मैं
इस बात का ध्यान हमेशा रखता था कि मेरी तनिक-सी भी ग़फ़लत से समूचा दल
तहस-नहस हो सकता है। किन्तु चलते-चलते ठहरे बिना कभी पीछे मुड़कर न
देखता था। यदि एक ही चेहरे पर कई बार नज़र पड़ती तो उस पर तुरन्त सन्देह
हो जाता और मैं अपने सन्देह को जांचने के लिए किसी सुनसान गली में जा
निकलता। उस समय या तो पीछा करनेवाला पकड़ लिया जाता यानी विश्वास
हो जाता कि यह जासूस है अथवा उसे लाचार होकर पीछा छोड़ देना पड़ता था।
अपना पीछा करनेवाले को जब इस तरह हम चंगुल में फांस लेते थे तब किसी
तरह उसे धोखा देना ही हमारा पहला काम होता था। ऐसे मौके पर चकमा
देने का खास ढंग था सुनसान रास्ते पर चलते-चलते एकाएक किसी भीड़-भाड़