बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
पृष्ठ 65, कुल 408 में से
संदर्भ में पढ़ें5
काशी में पुलिस के साथ सम्बन्ध
काशी मे पजाबमेल तीन बजे पहुँची । मेरे ऊपर पुलिस की खास नज़र
रहती थी । सबेरे से लेकर नौ-दस बजे तक पुलिस या तो मेरे घर के दरवाजे के
सामने ही अथवा वही-कही अगल-बगल मे बैठी रहती थी और घर से बाहर
पैर रखते ही मेरी गतिविधि पर नज़र रखने के लिए वह परछाईं की तरह मेरा
पीछा करती थी । घर मे रहने पर भी मुझसे मिलना-जुलना लोगो के लिए सहज
काम न था । क्योकि पुलिस जिसके साथ मेरा हेल-मेल देखती उसकी भी निग-
रानी उसी तरह करने लगती, जैसी कि मेरी करती थी । इस कारण उन दिनो
मेरे-जैसे लोगो के साथ मामूली ढग पर लोगो का मिलना-जुलना भी जुर्म समझा
जाता था । ऐसा सख्त पहरा रहने पर भी मै इस प्रकार के काम करता गहता था।
बगाल से काशी विभाग मे बम के गोले और रिवाल्वर इत्यादि ले आता और
फिर वहाँ से पजाब के विभिन्न प्रदेशो मे इन चीजो को पहुँचाता था, सभी काम
इस सख्त पहरे के बीच होते रहते थे । पुलिस की आँखो मे धूल झोकना हम लोगो
के लिए साधारण-सी बात थी। आगे की बाते लिखने से पहले यहाँ मैं कुछ वे
लटके लिखता हूँ, जिनमे मालूम होगा कि किस प्रकार हम लोग पुलिस के पहरे-
वाले को छकाते थे ।
पुलिम की नजर मे बचने के लिए हमारी सबसे बढ़िया हिकमत यह थी कि
पहले तो घर से निकलते समय ही होशियारी से किसी तरह पहरे वाले को धोखा
दिया । यदि घर से रवाना होते समय पहरेदार की नज़र न बचा सके तो यह
किया कि उस बार न तो दल का कुछ काम किया और न दल के किसी व्यक्ति
से ही भेट की। उस समय या तो अपने किसी सहपाठी के घर चले गए या हाट-
बाजार मे जाकर ज़रूरी सौदा-सुलुफ मे ऐसा चित्त लगा दिया कि घरवाले मम-
झते कि “आज तो शचीन्द्र का ध्यान गृहस्थी के कामो की ओर बेतरह लगा हुआ
है।” अथवा कारमाइकेल लाइब्रेरी मे जाकर मासिकपत्रो और समाचार-पत्रो
की सैर करके फिर जहाँ-के-तहाँ अपने घर आ गए। आखिरी हिकमत यह थी
कि यदि गर्मी का मोसम हुआ तो घर लौटकर थोडी-मी मालिश की और जाह्नवी
के पवित्र जल मे देह तथा मन को शीतल करके पहरेवाले को महज ही छुट्टी दे
दी, सहज इसलिए कि किमी-किसी दिन बेचारे को हमारा पीछा करते-करते