बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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नाकों चने चबाने पड़ते थे। इन पहरे वालों में से प्रायः किसी के भी साथ मेरा
व्यक्तिगत विरोध न था। आँख से आँख मिलते ही मैं मुसकरा देता था। कभी
तिमंजिले की खिड़की से झांककर मैंने देखना चाहा कि देखें पहरेदार किस ओर
क्या कर रहा है और ठीक इसी समय उसकी भी नज़र मुझ पर पड़ गई तब मैंने
जंगले को खोल दिया। हज़रत नीची निगाह करके टहलते हुए, घर के सामने
से, मुसकराकर कुछ आगे बढ़ गए। ऐसा अवसर होता ही रहता था। इन पहरे-
दारों को धोखा देने में भी मज़ा आता था और धोखा देने में विफल हो जाने से
भी हँसी-मज़ाक का मसाला हाथ लगता था। किन्तु किसी-किसी दिन इम तेज़
निगाह की बदौलत काम में गड़बड़ हो जाने से इन लोगों पर क्रोध भी कम न
होता था। इन्हें हम लोग जब-तब समझाया करते कि "भैया, किसी तरह नौकरी
सँभाले रहो, भला इस तरह दिन-भर दरवाज़े पर डटे रहना कहाँ की भलमनसी
है ? घरवाले और टोले-मुहल्लेवाले भला क्या कहेंगे ? सरकार समझती है कि
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