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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 69, कुल 408 में से

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पृष्ठ 69

काशी में पुलिस के साथ सम्बन्ध / 67
करना पड़ेगा कि इनका 'प्यारा' नाम सोलहों आने ठीक है। जैसे ये स्वभाव
से नम्र थे वैसे ही इनके चरित्र से एक शान्त, समाहित संयत तेज का आभास
मिलता था । गाँववाले सचमुच इनके गुणो पर लट्टू थे और विधाता की मर्जी
देखिए कि उन्ही गुण-मुग्ध गाँववालों ने मानो अपने हाथों अपने प्यारे को पुलिस
के पंजे मे फँसा दिया ।
अस्तु, पंजाब में गिरफ्तारियां होने की खबर पढकर हम लोग किंचित् विच-
लित हुए, क्योंकि हम लोग हरदम यही सोचते रहते थे कि ऐसा बढ़िया मौक़ा
तनिक-सी भूल से कही हाथ से न निकल जाय । इधर अपने दल के उपर्युक्त दो-
एक लड़कों से हमने अपने निश्चित कार्य की बाते कही । इस समय से हम लोगो
ने और सब कामो से ध्यान हटाकर अपना सारा सामर्थ्य सैनिकों का मन परि-
वर्तन करने की चेष्टा करने मे लगा दिया। मै एक दिन अपने एक महाराष्ट्री
मित्र के साथ फौज की बारको की ओर गया । हम लोग सीधे बारकों मे नही
गए, पहले छावनी स्टेशन पर पहुँचे । यह इसलिए किया कि यदि कोई हमारा
पीछा कर रहा हो तो, स्टेशन पर जाने से, बारको मे जाने की हमारी इच्छा उसे
न मालूम हो । स्टेशन पर पहुँचने के बाद हम लोग रेल की पटरी के किनारे-
किनारे बारको की ओर बढे । स्टेशन पर पहुँचने और वहाँ के लम्बे प्लेटफार्म
को तय करने में साफ मालूम हो सकता था कि हमारा पीछा तो नही किया जा
रहा है। और जब मैं रेल की पटरी के किनारे-किनारे चलने लगता था तब तो
कुछ छिप ही न सकता था। फौज की बारकों में जाते-आते समय किसी भी दिन
हमारा पीछा नही किया गया। रेल की लाइन, फौज की बारक के पास से, ग्रैण्ड-
ट्रंक रोड को काटती हुई चली गई है। ग्रैण्डट्रंक रोड के मोड़ पर आकर हमने
देखा कि दो युवा सिक्ख, बारक से निकलकर, शायद बाजार की ओर जा रहे
थे। हमको अपनी ओर आते देखकर वे लोग खड़े हो गए। मैंने इन लोगों से
कितनी ही बाते पूछी । कुछ प्रश्न ये है—“आप कहाँ जा रहे है ? आपकी पलटन
का क्या नाम है ? आपका हवलदार कौन है ? इस समय पलटन मे कितने जवान
हैं ? इससे पहले आप लोग कहाँ थे ? यहाँ से कही जल्दी बदली तो नही होने-
वाली है ? गोरो की बारको मे कितने सिपाही हैं ? और यहाँ की छावनी में
आपको आए कितना समय हुआ है ?” इत्यादि । सभी प्रश्नों के उत्तर देकर
उन्होंने मुस्कराकर पूछा — “ये बाते आप क्यों पूछते हैं ? हम पर हमला तो न
कीजिएगा ?” तब हम लोग भी इसलिए खिलखिलाकर हँस पड़े कि जिसमें इस
उच्च हास्य के अनन्तर इन लोगों के मन में हमारे किए हुए प्रश्नों के सम्बन्ध में
कुछ खटका न रहे । वे लोग अपने रास्ते लगे और हम धीरे-धीरे सडक पर,
बारकों के पास से होकर जाने लगे । बारकों में जाने की हमें हिम्मत न हुई ।
इतने में देखा कि एक और सिक्ख सड़क की तरफ आ रहा है। उससे हवल-
दार की बाबत पूछा तो वह बारक के एक स्थान की ओर अँगुली से इशारा
करके हमसे वहीं जाने को कहकर चला गया । अब हमने सोचा कि शायद बारकों