बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
48 / बन्दी जीवन
सिक्खों की शिक्षा-दीक्षा आदि के सम्बन्ध में इन्हें अत्यन्त उत्साह था। ऐसी शिक्षा
के प्रचारार्थ उन अमेरिकावासी मजदूरपेशा सिक्खों ने ही अमेरिका से धन-संग्रह
करके कई बार दस-दस, पन्द्रह-पन्द्रह हज़ार की रकमें पंजाब को अर्पण की थीं।
अमेरिका की स्वाधीन आबहवा के बीच में रहने से और खासी आमदनी कर
सकने से उनमें आत्मसम्मान, मर्यादा और आत्मविश्वास का परिमाण बहुत कुछ
बढ़ गया था। इनमें से कई एक ने अमेरिका में रहकर कभी अपने वेश और
परिच्छेद को नही छोड़ा, बहुतेरे तो अपने हाथ से रसोई बनाकर भारतीय ढंग
पर ही आहार किया करते थे। देश से जब पहले-पहल ये लोग अमेरिका पहुँचे
तब शायद अंग्रेज़ी में एक भी बात न कह सकते थे किन्तु वहाँ पहुँचकर अजीब
किस्म की टूटी-फूटी अंग्रेजी बोलना इन्होंने सीख लिया। इनके मुँह से वह टूटी-
फूटी अंग्रेज़ी सुनने मे बड़ा मज़ा आता था। अमेरिका मे ऐसी ही अंग्रेज़ी बोलकर
ये अपनी भावनाएँ व्यक्त करते थे और उम्दा अंग्रेजी न जानने से इनके किसी
काम मे रुकावट न पड़ती थी और फिर इन्होंने धन भी खासा कमाया था। और
सबसे बड़ी बात तो यह थी कि अपने अमेरिका-प्रवास के फलस्वरूप इन लोगों
ने स्वदेश-सम्पर्क को नही तोड़ दिया था। ये करते तो थे अमेरिका में कुलीगिरी
या मज़दूरी, लेकिन यह जानने के लिए सदा व्यग्र रहते थे कि हमारे देश में कहाँ
क्या हो रहा है। उस समय बंगाल की नवजागरण की तरंग ने जिस प्रकार
भारत के अन्यान्य प्रदेशों में एक भाव की हिलोर पैदा कर दी थी उसी प्रकार
उसका हिलकोरा सुदूर अमेरिका मे स्थित भारतीयों के हृदय में भी लगा था।
जब भारत में गदर की चिनगारियाँ धीरे-धीरे इधर-उधर चारो ओर उड़ रही
थीं तब अमेरिका मे कुछ भारतीयों के जी-ही-जी मे वे धधककर जल रही थी।
इसी समय भाई करतार सिंह नामक एक तरुण युवा इनके साथ आकर सम्मिलित
हुए। ये उड़ीसा मे रेवेनशा कालेज की प्रथम श्रेणी की पढ़ाई समाप्त करके विशेष
कारण से अमेरिका चले गए थे। यद्यपि सिक्खो में ये सबसे कम उम्र के थे, फिर
भी इनकी अधिनायकता मे मैंने कितने ही बड़ी उम्र के सिक्खों को भी काम
करते देखा। इन्होंने अपने-जैसे विचार रखनेवाले दो-एक व्यक्तियों की सहायता
से एक सम्वादपत्र के निकालने का सकल्प किया। इसी समय पंजाब के स्वनाम
ख्यात देशभक्त लाला हरदयाल भारत में विप्लव करने की सारी आशाएँ छोड़-
छाडकर अमेरिकन सोशलिस्टों (साम्यवादियों) के साथ आत्मीयता स्थापित
करने का यत्न कर रहे थे। करतारसिंह और उनके मित्र इस अवसर पर हरदयाल
के पास ऐसे पत्र को प्रकाशित करने का प्रस्ताव लेकर उपस्थित हुए। स्वदेश-
प्रेमी हरदयाल तो ऐसे सुयोग की ताक में ही बैठे थे। उन्होंने खुशी-खुशी इस
काम को हाथ में ले लिया। इस प्रकार 'गदर' नामक विख्यात समाचारपत्र का
प्रकाशन होना आरम्भ हुआ, और धीरे-धीरे इसी ने 'गदर' पार्टी का संगठन कर
दिया। कैलीफोरनिया का युगान्तर आश्रम ही इसका केन्द्रस्थल था।
बीसवी सदी के महाभारत (प्रथम विश्वयुद्ध 1914-1919) के आरम्भ होने
सिक्ख दल का परिचय / 49
से पहले तक भारतीय विप्लववादियों का दल समझ ही न सका था कि अंग्रेजों
के साथ जर्मनी का विरोध इतनी जल्दी उपस्थित हो जाएगा । फलतः इनके
विप्लव की तैयारी भी इस ढंग से हो रही थी कि मानो दस-पन्द्रह वर्ष के अनन्तर
वास्तविक 'गदर' शुरू होगा । यही कारण है कि ये लोग महासमर छिड़ते समय
क्रान्ति के लिए पूरी तौर पर तैयार न थे । इसके सिवा अब तक के विप्लव-
कारी दल के साथ भारत से बाहरी देश के किसी भी क्रान्तिकारी दल का कहने
लायक कोई सम्बन्ध ही न था । इसका फल यह हुआ कि जब अमेरिका से क्रान्ति-
कारियों के दल-के-दल भारत में आने लगे तब भारत में स्थित क्रान्तिकारी
लोग उनके साथ दिल खोलकर ठीक समय पर सम्मिलित नही हो सके । यदि
ऐसा सम्मिलन हो जाता तो भारत का भाग्य आज कुछ और ही होता ।
अमेरिका प्रवासी विप्लवपथियो की समझ मे नही आया था कि अंग्रेजों के
साथ जर्मनो का युद्ध शीघ्र ही छिड़ जाएगा, इस कारण उनकी तैयारी और ही
ढग पर हो रही थी। वे समझते थे कि भारत से बाहर की किसी अन्य राजशक्ति
की सहायता लेकर युद्ध की तैयारी करनी होगी और इसी सकल्प को कार्य मे
परिणत करने के लिए बहुत कुछ आयोजन हो रहा था, परन्तु इनके लिए असमय
मे ही यूरोप मे रणचण्डी का नृत्य होने लगा । इसके लिए ये तैयार न थे और
सारा संकल्प एकदम विफल हो गया । अब इन्होने निश्चय किया कि गदरपार्टी के
दल-के-दल भारत मे पहुँचकर भारतीय सैनिको को अपने प्रभाव मे कर ले । बस,
क्रान्ति का यही एकमात्र उपाय निश्चित हो गया । हजारो सिक्ख विदेश मे पड़े
हुए अपने बोरिए-बँधने समेट-ममेटकर स्वदेश को रवाना हो गए ।
इधर भारत सरकार को इस पार्टी की बहुत-सी बातो का पता लग चुका था,
क्योकि इस पार्टी के मेम्बर लोग अमेरिका मे खुले खजाने सभाओ मे, भारत मे
गदर करने के सम्बन्ध मे व्याख्यान दिया करते थे । 'गदर' नामक पत्र भी
प्रकाश्य रूप मे मुद्रित होता था । सन् 1857 के महाविप्लव की दसवी मई एक
उत्सव मे परिणत की जाती थी । लाला हरदयाल पर अग्रेज़ सरकार की विशेष
उग्र दृष्टि थी । कई बार उनकी डायरी तक बडी सफाई से उडा ली गई । अन्त
मे जब उनको गिरफ्तार करने की सलाह हो रही थी तब एक अमेरिकन ने उन्हें
सावधान कर दिया । अतएव हरदयाल और अन्य भारतीयो ने अमेरिका से हट
जाने मे ही भलाई सोची ।
विभिन्न स्थानों के जर्मन एलची (कोन्सल) उस समय भारत मे विप्लव
मचा देने की इच्छा रखनेवालो की अनेक प्रकार से सहायता करते थे । अमेरिका
से लौटे हुए इन दलो ने उनसे मिलने-जुलने के अवसर को कभी खाली नही जाने
दिया ।
इस प्रकार कुछ व्यक्ति तो यूरोप की ओर चले गए और जो रह गए वे
भारत की ओर रवाना हुए। रास्ते मे यें लोग जहाँ-तहाँ अपना अभिप्राय प्रकट
कर दिया करते थे । इस प्रकार का एक दल जापान के बन्दर मे पहुँचा । यहाँ पर
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परमानन्द नामक एक छरहरे डील के युवा पुरुष इन लोगों में आ मिले। ये
बुन्देलखण्ड के निवासी थे। अण्डमन में इन्हें हम लोग छोटे परमानन्द कहते थे,
क्योंकि बड़े परमानन्द थे डी० ए० वी० कालेज लाहौर के भूतपूर्व अध्यापक भाई
परमानन्दजी। इन्हें भी लाहौर षड्यन्त्र के मामले में आजन्म कालेपानी की
सजा दी गई थी। पंजाब में सिक्खों के अभ्युत्थान के अवसर पर स्वदेश और
स्वधर्म के लिए जब निडर देशभक्तगण मुसलमानों के अत्याचार के आगे बेधड़क
बलिदान हो रहे थे—सिर दे देते थे लेकिन धर्म न देते थे—उस समय भाई
परमानन्द के एक पूर्वपुरुष ने आत्म-बलिदान की पराकाष्ठा दिखला दी थी। उस
समय उन्हें मुसलमानों ने आरे से चीरकर मारा था। उसी समय से सिक्खों में यह
खानदान 'भाई' नाम से विख्यात हो गया। सिक्खों में यह 'भाई' संज्ञा बड़ी
सम्मानसूचक है। इसलिए हम लोग सिक्ख मात्र को उनके नाम के साथ 'भाई'
शब्द लगाकर बुलाया करते थे।
सिक्खों के एक बड़े उत्साही नेता भाई भगवानसिंह थे। इनके व्याख्यान सुन-
सुनकर कितने ही सिक्ख, अपना काम-काज छोड़, विप्लव कार्य में सहायता करने
के लिए देश में लौट आए थे। ये लोग कुछ क्षणिक उत्तेजना में आकर, सर्वस्व
छोड़-छाड़कर, इस विप्लव-धर्म में दीक्षित नहीं हुए थे, वरन् इनमें सचमुच
देशसेवा की प्रेरणा जाग्रत थी। इस प्रकार से जो सिक्ख देश में लौट आए थे
उनमें बहुतों से मेरी बातचीत हुई थी। उससे मालूम हुआ कि वे सचमुच प्राणों
की प्रत्येक तह में—दिल के हर पहलू में—पराधीनता की जलन का अनुभव
करके विप्लव कार्य में सम्मिलित हुए थे। इनमें से कोई तो पिनांग की मिलिटरी
पुलिस में नियुक्त था, कोई हांगकांग में पहरेदार था और कोई सौदागरी करता
था। इस समय हांगकांग में सिक्खों की एक रेजिमेंट थी। इस रेजिमेंट पर भी
इन लोगों का आधिपत्य हो गया था।
भारत में लौटे हुए दल के अनेक व्यक्ति ऐसे थे जो कि अंग्रेज़ों की पलटनों में
सैनिक पद पर रह चुके थे। इनमें से किसी की सर्विस आठ वर्ष की, किसी की
दस वर्ष की और किसी-किसी की ग्यारह वर्ष की थी। इनमें कोई भी ऐसा सैनिक
न था जिसे तीन वर्ष से कम की अभिज्ञता हो, क्योंकि प्रत्येक सैनिक को कम से
कम तीन वर्ष तक नोकरी करने की शर्त करनी पड़ती है। इनमें से बहुतेरों का
काम मशीनगन चलाना था और कुछ लोग तोपखाने में भी काम कर चुके थे।
भारत में लौटने के मार्ग में पुलिस विभाग के कर्मचारियों ने इन लोगों से
पूछा था कि आखिर तुम लोग हिन्दुस्तान किसलिए जा रहे हो? तो इनमें से
किसी ने कहा कि विवाह करने जाता हूँ और किसी ने कहा कि घर छोड़े बहुत
दिन हो गए, इसलिए देश को जा रहा हूँ। ऐसे ही ऐसे कारण बतला दिए थे।
फिर अदालत में मुकदमे के वक्त जब न्यायकर्ता इनसे हिन्दुस्तान में आने का कारण
पूछते तब भी ये लोग प्रायः वैसे ही उत्तर देते थे जो कि ऊपर दिए गए हैं।
सिर्फ एक व्यक्ति ने दूसरे ढंग का उत्तर दिया था। न्यायकर्ता ने अभियुक्त से
सिक्ख दल का परिचय / 51
पूछा, "तुम देश में किसलिए आए थे ?" इसका उत्तर दिया था कि "यह हमारा
स्वदेश जो है।" इन पंजाबी ब्राह्मण का नाम जगतराम था। ये 'गदर' पत्रिका
के सम्पादन विभाग में काम करते थे।
अमेरिका से आये हुए सिक्खों में उत्साह तो अदम्य था किन्तु काम करने की
रीति उन्हें मालूम ही न थी। न इसका कोई केन्द्र था और न कोई शाखा ही।
किसी-किसी की अधीनता में बीस-पचीस मनुष्य रहते थे। उसे इन बीस-
पचीस आदमियों का सरदार कहा जाता था। ये सरदार कभी एकत्र हो जाते थे
और कभी कुछ दिनों तक इनकी परस्पर भेंट ही न होती थी। असल बात यह कि
सम्मिलित रूप में काम करने की एक प्रणाली का इनमें अभाव था। इसका कारण
यही था कि इनका कही केन्द्र न था। इस प्रकार देश में बिलकुल अव्यवस्थित
रूप से कितने लोग गड़बड़ मचा रहे थे यह कौन जानता है। जो लोग मुलतान
जेल में कैद थे वे भी यही कहते थे कि अब शीघ्र ही बलवा होगा और इससे हम
झटपट रिहाई पा जाएँगे। इमका फल यह हुआ कि ये भिन्न-भिन्न जेलों में बाँट
दिए गए। समानधर्मा और एक ही भाव के भावुक बहुत लोगों के एक स्थान में
रहने से जो आनन्द प्राप्त होता है वह आनन्द भी इनसे छिन गया।
इन सब दलों ने भारत में आते ही बंगाल के गुप्त विप्लव दल का पता
लगाना आरम्भ कर दिया। किन्तु पहले से ही किसी के साथ जान-पहचान न
रहने के कारण पात्र-अपात्र का विचार किए बिना ही ये लोग पंजाब में विद्रोह
की बातें कहने लगे। इस समय कलकत्ता की मामूली सड़कों पर भी मैंने सुना था
कि पंजाब मे विप्लव की तैयारी हो रही है। 'भारत रक्षा' क़ानून बनाते समय
हार्डिज साहब ने इम बात का उल्लेख किया था।
इसी समय करतारसिंह ने आकर बंगाल के किसी सुपरिचित, लब्धप्रतिष्ठ
सार्वजनिक नेता से मुलाक़ात की। उन्होने करतारसिंह को उपदेश दिया कि तुम
अपने संकल्प और सुभीते के अनुसार काम करते जाओ, बंगाल तो ठीक समय पर
तुम्हारी सहायता करेगा ही। अब यह कहने में कोई बाधा नही है कि ये व्यक्ति
सर सुरेन्द्रनाथ बनर्जी थे।
इस समय इन्हें थोड़े-बहुत हथियारों की ज़रूरत हुई। यद्यपि इस विप्लव का
प्रधान अवलम्ब पंजाबी सैनिकों के दल थे, तथापि आत्मरक्षा करने के लिए यथा-
सम्भव प्रत्येक कार्यकर्त्ता को सशस्त्र रखने की इच्छा से कुछ रिवाल्वर इत्यादि की
आवश्यकता हुई। इस उद्देश्य की सिद्धि के लिए श्रीयुत जगतराम कुछ रुपये देकर
काबुल की ओर भेजे गए और यही से कारागार की यन्त्रणाओं ने उनका पल्ला
पकड़ लिया। बेचारे जगतराम पेशावर मे ही पकड़ लिए गए और आगे चलकर
अण्डमन में मुझे उनके दर्शन हुए थे।
छोटे परमानन्द को भी इन लोगों ने इसी काम के लिए बंगाल भेजा था पर
ये भी खाली हाथ लौट आए।
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पंजाब यात्रा
इस विप्लव की तैयारी के समय काशी में, बाहरी लोगों से मुलाक़ात करने
के लिए खास-खास मकान थे। पंजाब से जो लोग मुलाक़ात करने आते थे वे
पहले ऐसे ही खास मकान में पहुँचाए जाते थे। वहाँ से खबर मिलने पर दूर से
आगन्तुक व्यक्ति को छिपकर पहचान लिया जाता था। तब, सन्देह न रहने पर,
उससे भेंट की जाती थी। मैं उस दिन काशी में ही था जब पंजाबी दल का एक
मनुष्य वहाँ के विप्लव की तैयारी का समाचार लेकर हमारे पास आया। जब
उसके मुंह से सुना कि विप्लव के लिए दो-तीन हज़ार सिक्ख कमर कसे तैयार
बैठे हैं तब हमारा अन्तरतम पुरुष आनन्द से थिरकने लगा । पजाब के कार्यकर्ताओं
ने आगन्तुक व्यक्ति द्वारा कहला भेजा था कि रासबिहारी की हमें बहुत ज़रूरत
है। दिल्ली षड्यन्त्र के फ़रार असामी प्रसिद्ध कर्मवीर रासबिहारी का नाम उस
समय अमेरिका तक में विश्रुत हो चुका था। इन लोगों ने अमेरिका में ही इनका
नाम सुना था।
कई कारणों से उस समय रासबिहारी पंजाब न जा सके, इसलिए पहले वहाँ
मेरा ही भेजा जाना तय हुआ ताकि जब मैं पंजाब की दशा अपनी आँखों देख
आऊँ और सबको वहाँ का हाल बताऊँ तब आगे का कर्तव्य निर्धारित हो।
पहले ही निश्चित हो गया था कि मैं जालन्धर शहर में जाकर सिक्खों के
नेताओं से भेंट करूँगा। उस समय नवम्बर का महीना खत्म होने को था।
पश्चिम में ठण्ड का मौसम था। उसी शीतकाल के प्रातःकाल लुधियाना में गाड़ी
पहुँचते ही देखा कि मेरे मित्र के परिचित एक सिक्ख युवक हम लोगों की प्रतीक्षा
कर रहे हैं। मित्र ने इनसे मेरा परिचय करा दिया। यही करतारसिंह थे। वह
गाड़ी में सवार होकर हमारे साथ जालन्धर की ओर रवाना हुए। रास्ते में थोड़ी-
बहुत बातें हुईं। उनसे मालूम हुआ कि इस समय लुधियाना में दो-तीन सौ मनुष्य
एकत्र हुए हैं। जुदा-जुदा काम करने के लिए ये लोग विभिन्न दिशाओं में भेजे
जाएँगे। ये लोग गुरुद्वारे में अध्ययन करने के बहाने एकत्र होते थे।
उस दिन की बात मुझे आज खासी स्मरण है। गाड़ी के उस डिब्बे में हम
कई आदमी एकत्र हुए थे, किन्तु सभी के मन का भाव कई तरह का था। हम
तीनों व्यक्ति बीच-बीच में एकाध बात कर लेते थे सही, किन्तु हृदय में न जाने
पंजाब यात्रा / 53
कितने भावों का आलोडन हो रहा था। मैं रास्ते-भर में यही सोचता गया कि इस
सिक्ख दल के आदमी न जाने किस ढंग के होंगे, उनकी शिक्षा-दीक्षा कैसी है;
यह तो सुन ही चुका था कि इनमें बहुतेरों की उम्र तीस वर्ष की या इससे भी
अधिक है, ये मुझे किस दृष्टि से देखेंगे (क्योंकि उस समय मैं कुल बाईस वर्ष का
था), वहाँ जाने पर मेरा इन पर कुछ असर भी पड़ेगा कि नहीं, इतने बड़े उत्साह
से उन्मत्त जनसंघ को हम लोग किस प्रकार सुसंयत करके अपना अभीष्ट साधन
करेंगे; ऐसे-ऐसे सैकड़ों प्रश्न रास्ते-भर भीतर ही भीतर मुझे बेचैन करते रहे।
साथ ही साथ एक आनन्द-स्रोत भी मर्म की ओट करके, मानो बिना जाने ही बहा
चला जा रहा था कि इस बार जीवन का स्वप्न सफल होना चाहता है, युग-
युगान्तर का अँधेरा इस बार हट जाएगा, किन्तु एक और बात को सोचते ही
मानो शंका से मेरी देह कण्टकित हो उठती थी, वह यही कि बंगाल आज कितना
पिछड़ा हुआ है—इस पुण्यधूम यज्ञ से कितने अन्तर पर है ! बंगाल की सैकड़ों-
हजारों वर्षों की कलंक-कालिमा मानो गाढ़ी होकर मुझे निरन्तर कसकती रहती
थी। इसी से बंगाल में जाकर काम करने की मुझे बहुत इच्छा थी। खैर, जाने
दो उस बात को।
लुधियाना पीछे रह गया। अब हम लोग एक और स्टेशन पर पहुँचे। करतार
सिंह ने 'बुलेटिन' नाम का समाचारपत्र मोल लिया। उसमें पढ़ा कि कलकत्ता की
मुसलमान पाड़ा लेन में बम की भीषण घटना हुई है। समाचार था कि खुफिया
पुलिस के डिप्टी सुपरिटेंडेंट श्रीयुत बसन्त चटर्जी के घर पर दो-तीन बम फेंके
गए हैं। इससे एक हेड कांस्टेबल का पैर उड़ गया, कुछ लोग घायल हुए, मकान
की दीवार का कुछ अंश उड़ जाने से गड्ढा हो गया, घर के भीतर का आराईश
का बहुत-सा सामान सड़क पर आ गिरा और मकान के सामने का लालटेन का
खम्भा टूट-फूट गया है, इत्यादि। किन्तु बसन्त बाबू इस बार साफ बच गए।
समाचार पढ़ने से बहुतेरी बातें मैंने समझ लीं। पंजाब का वृत्तान्त लिख चुकने
पर बंगाल की उस समय की दशा पर विचार करते समय इन बातों को ठीक-
ठीक लिखने की इच्छा है।
इन बम गोलों के फटने से भारत में चारों ओर देशभक्तों के बीच जाग्रति-
सी देख पड़ती थी। सभी, कम से कम बहुतेरे, लोग समझते थे कि बड़े भारी
विप्लव की तैयारी का यह ऊपरी लक्षण है और ऐसी घटनाओं से सबको ऐसे-ऐसे
दलों का संगठन करने की इच्छा होती थी। उल्लिखित संवाद को पढ़कर करतार
सिंह बहुत ही प्रसन्न हुए। परस्पर नेत्रों में बातचीत हो गई, एक-दूसरे की आँखों
के कोनों से आनन्द का आभास प्रकट हुआ। इस प्रकार हम लोग जालन्धर
स्टेशन पर पहुँचे। यहाँ करतारसिंह के कई छात्र-मित्र प्रतीक्षा कर रहे थे। इनमें
जिनसे जो कुछ कहना था वह कह-सुन चुकने पर हम लोग रेल की पटरी को पार
करके पास के बगीचे में गए, वहाँ पर इस दल के कई नेता उपस्थित थे। इनको
देखने से मुझे भरोसा हुआ कि इन लोगों के बीच में मैं बिलकुल ही कम उम्र नहीं
54 / बन्दी जीवन
हूँ, क्योंकि इनमें ऐसा कोई भी न जँचा जिसकी उम्र मेरी अपेक्षा बहुत अधिक
हो। उस दिन वहाँ पर करतारसिंह, पृथ्वीसिंह, अमरसिंह और रामरक्खा के
सिवा शायद एक व्यक्ति कोई और उपस्थित था। करतारसिंह की उम्र उस
समय उन्नीस-बीस वर्ष से अधिक न होगी। अमरसिंह और पृथ्वीसिंह दोनों ही
राजपूत थे, किन्तु मुद्दत से पंजाब में ही रहते थे। इनकी अवस्था चौबीस-पचीस
वर्ष से ऊपर नही जँची। रामरक्खा ब्राह्मण थे। इनकी उम्र भी इसी के लगभग
होगी। ये लोग रासबिहारी से मिलने के लिए ठहरे हुए थे। मेरे पूर्व-परिचित
मित्र ने इन लोगों के साथ मेरा परिचय करा दिया। मैंने पहले-पहल इनमें से
किसी का भीनाम-धाम आदि नहीं पूछा। फिर तो बातचीत के सिलसिले में मुझे
सभी का नाम मालूम हो गया। हमारे दल में ऐसी जाँच-पड़ताल ज़रा सन्देह की
दृष्टि से देखी जाती थी और इस प्रकार नाम-धाम पूछना तो मैं बिलकुल
अनावश्यक समझता था। मित्र ने मेरा परिचय यह कहकर कराया कि
रासबिहारी तो एक खास काम के मारे आ नहीं सके, उन्होंने अपने दाहिने हाथ
स्वरूप इन्हें भेजा है। करतारसिंह ने कहा कि हमें तो रासबिहारी से ही काम
है। तब मैंने उन्हें समझाया कि यहाँ आने से पहले वह यहाँ की दशा का पूरा-
पूरा हाल जान लेना चाहते हैं, इसके सिवा वह ऐसी दशा में हैं जिससे और भी
कुछ समय तक इस ओर न आ सकेंगे। इसके पश्चात् मैंने इन लोगों से पजाब
की हालत जानने के लिए पूछा—वे लोग कितने आदमी हैं, आपस में किस प्रकार
मिलते-जुलते और मुलाक़ात करते हैं तथा उनका वास्तविक नेता कौन है,
इत्यादि। मैंने कहा, "जो आपके असली नेता हों उन्ही से मै बातचीत और
पहचान करना चाहता हूँ।" अमरसिंह ने कहा, "सच पूछिए तो हम लोगो मे
वास्तविक नेता की खास कमी है और इसीलिए हमें रामबिहारी की ज़रूरत है।
यहाँ पर हम जितने आदमी मौजूद हैं इनमें किमी को विशेष अभिज्ञता प्राप्त नही
है, इससे हमारे काम का कोई खास सिलसिला नही बैठता। हमको बगाल से
सहायता पाने की बहुत आवश्यकता है। बंगाल में आप लोग बहुत दिन से काम
कर रहे हैं, इन कामों का आप लोगों को यथेष्ट अनुभव हो गया है।" करतारसिह
ने भी इसे माना तो, किन्तु अमरसिंह को लक्ष्य करके कहा, "देखो भाई, यो
हिम्मत क्यों हारते हो? काम के वक्त देख लेना कि तुम्हीं में से कितने छिपे रुस्तम
निकलेंगे।" उस दिन की बातों से मुझे साफ मालूम हो गया कि जिस महान् व्रत
में ये लोग दीक्षित हुए हैं उसके गुरुत्व का अनुभव इनकी नस-नस में भिद गया है
और अपने में शक्ति की कुछ कमी समझकर बाहर एक सहारा ढूँढ़ रहे हैं किन्तु
उसके साथ मैं यह भी समझ गया कि इनमें यदि कोई सचमुच काम करनेवाला है
तो करतारसिंह है। मैंने इसमें जैसा आत्मविश्वास देखा वैसा आत्मविश्वास न
रहने से किसी के द्वारा कोई बड़ा काम नही हो सकता। बहुतों में अहंकार का
भाव रहने पर भी ऐसे आत्मविश्वास का भाव कम देखा जाता है। अहंकार और
आत्मविश्वास. अलग-अलग दो चीजें हैं, अहंकार दूसरे पर चोट करता है, किन्तु
पंजाब यात्रा / 55
जो अहंकार दूसरे पर नोक-झोंक किए बिना ही अपने प्राणों में शक्ति के अनुभव
को जाग्रत करता है वही आत्मविश्वास है।
जो हो, इन लोगों से मुझे पंजाब की बहुत कुछ हालत मालूम हो गई। उनमें
से बहुतेरी बातों का वर्णन पहले किया जा चुका है। इनकी बातों से ज्ञात हुआ
कि इनके विप्लव की तैयारी का मुख्य अवलम्बन पंजाब की सिक्ख फौजें हैं।
करतारसिंह से ज्ञात हुआ कि भारत में अमेरिका से सिक्खों का जो पहला दल
आया था उसी में वे भी आए थे और सितम्बर महीने से इस काम की तैयारी
कर रहे हैं, इत्यादि।
अब करतारसिंह ने मुझसे पूछा, "अस्त्र-शस्त्र आदि देकर के बंगाल हमारी
कहाँ तक सहायता कर सकता है ? बंगाल में कितने हज़ार बन्दूकें हैं ?" इत्यादि ।
मैंने कहा, "आप क्या ख्याल करते हैं ? बंगाल में कितने अस्त्र-शस्त्र होंगे ?"
करतारसिंह, "मैं तो समझता हूँ कि बंगाल में काफ़ी हथियार मौजूद कर
'लिये गए है, क्योंकि बंगाल तो बहुत दिनों से विप्लव की तैयारी कर रहा है और
हमारे दल के परमानन्द के एक बंगाली मित्र ने उन्हें पाँच सौ रिवाल्वर का वचन
दिया है। इसके लिए परमानन्द बंगाल गए हैं।"
मैं, "जिन्होंने परमानन्द से यह बात कही है वह कोई फालतू आदमी जँचते
हैं। क्योंकि बगाल में कोई कही पाँच सौ रिवाल्वर न दे सकेगा। जिन्होंने यह बात
कही है उन्होंने गप्प उड़ा दी है।"
करतारसिंह, "तो फिर बंगाल हमको किस प्रकार की सहायता देगा ? तो
क्या वहाँ भी पंजाब के साथ ही साथ गदर होगा ? बंगाल में आपके अधीन काम
करनेवाले कितने है ?" अन्य किसी समय और किसी भी व्यक्ति को ऐसे प्रश्न
करने का हम लोग मौक़ा ही न देते थे और यदि कोई पूछ ही बैठता तो कह देते
थे, "इन बातों को जानकर क्या कीजिएगा, समझ लीजिए कि कुछ भी तैयारी
नही हुई है ; तो भी आप इस दल मे संयुक्त होगे या नही ? आपका स्वयं आरम्भ
मे ही तैयारी करनी होगी, इस दशा मे भी क्या आप इस दल में भर्ती होना चाहते
हैं ?" इत्यादि । हाँ, बगाल में कही-कही कोई-कोई ऐसे भी थे जो विप्लव की
जंगी तैयारी की बातें बढ़ा-चढ़ाकर लोगों को सुनाते और इस तरह प्रलोभन
देकर उन्हें दल में भर्ती करते थे। जो हो, करतारसिंह ने जब ये प्रश्न किए तब
उनको ठीक उत्तर न देकर टाल देना मुनासिब न हुआ। मैंने कहा, "देखिए,
जिस प्रकार यहाँ आपको सैनिकों में भर्ती होने का अवसर मिलता है, उस प्रकार
बंगाल में यदि हम लोगों को फौज में भर्ती होने का सुभीता मिलता तो अब तक
कभी का भीषण विप्लव मच गया होता। बंगाल के दल में प्रधानतया युवक और
छात्र-श्रेणी के सदस्य हैं और इस दल में हम लोग बड़ी ही सावधानी से, बहुत-
कुछ छानबीन करके ऐसे लोगों को सम्मिलित करते हैं जोकि हर घड़ी मरने को
तैयार रहते हैं। इसलिए हमारे दल में अधिक आदमी नही हैं, शायद हज़ार-दो
हज़ार से अधिक न हों, किन्तु यह दृढ़ विश्वास है कि जिस दिन आमतौर
56 / बन्दी जीवन
पर विप्लव शुरू हो जाएगा उस दिन हजारों आदमी हमारे साथ आ मिलेंगे। यदि
पंजाब में गदर हो जाएगा तो यह भी निश्चित समझिए कि उस दिन बंगाल बैठा-
बैठा तमाशा न देखेगा और अंग्रेजों को बंगाल के लिए इतनी उलझन में पड़ना
होगा कि सरकार अपनी कुल शक्ति पंजाब ही पर न लगा सकेगी।" मैंने यह भी
कहा, "बंगाल इस समय भी सरकारी खजाने लूट सकता है या पुलिस की बारकों
पर छापा मारना इत्यादि काम कर सकता है, किन्तु आगे क्या होगा ? इस 'आगे
क्या होगा' को सोचकर ही बंगाल ने अभी तक ऐसा कुछ नहीं किया।" मैंने इन
लोगों को भली-भाँति समझा दिया कि "हम लोगों से सलाह लिए बिना अचानक
कुछ कर न बैठना।" यह भी कह दिया, "खूब सावधानी से काम करना होगा
जिसमें कि यह शक्ति व्यर्थ न हो जाय, सिर्फ़ हू-हा करके फ़िजूल कामों में शक्ति
क्षीण न कर दी जाय।" मैंने इन्हें सलाह दी कि अधिकांश व्यक्तियों से कहो
कि अपने-अपने गाँव में जाकर रहें, केवल मुखियों का और काम करने के लिए
थोड़े-से आदमियों का समीप रहना ठीक होगा, और सब लोगों को कई टुकड़ियों
मे बाँटकर प्रत्येक टुकड़ी पर एक-एक अधिनायक तैनात कर दीजिए। ऐसा
संगठन करने से जिस समय आवश्यकता होगी उस समय सब लोगों से अनायास
ही काम लिया जा सकेगा। यदि इस प्रकार छोटी-छोटी टुकड़ियां न बनाई जाएँगी
तो गिरफ़्तार हो जाने का अन्देशा हर घड़ी रहेगा।" फिर करतार्रसिंह से
कहा, "आपमें से कोई एक व्यक्ति मेरे साथ चले, मैं उसे उस स्थान पर ले
जाऊँगा जहाँ कि रासबिहारी हैं। रासबिहारी के साथ अच्छी तरह सलाह
करनी है।" यह बात इन्हें पसन्द आई। अब निश्चय हुआ कि लाहौर मे पृथ्वी-
सिंह से दोबारा मुलाकात करके, उनको साथ लेकर, रासबिहारी के पास भेंट
करने को जाना ठीक होगा।
करतारसिंह ने हमारे यहाँ से कुछ रिवाल्वर इत्यादि की सहायता माँगी।
आत्मरक्षा करने और छोटे-छोटे सरकारी खजाने लूटने के लिए कुछ अस्त्र-शस्त्रों
की ज़रूरत थी। अमेरिका से ये लोग जब स्वदेश को लौटे तब अनेक स्थानों से
थोड़े-बहुत रिवाल्वर इत्यादि ले आए थे। अंग्रेजों की प्रखर दृष्टि रहने पर भी ये
रिवाल्वर देश में पहुँच गए थे। बाल्टी की तली में लकड़ी या टीन का पटरा
लगाकर उसके बीच में छिपाकर रिवाल्वर इत्यादि लाए जाते थे किन्तु कुछ दिनों
में रिवाल्वर लाने की यह तरक़ीब जाहिर हो गई। कभी-कभी यह भी होता
था कि भारत के बन्दरगाह में पहुँचने से ज़रा देर पहले ये हथियार खलासियों के
ज़िम्मे कर मुसाफ़िर चले आते थे और फिर फुरसत तथा मौका देखकर उनके
पास से उठा लिए जाने थे। इस रीति से इन लोगों के हाथ कुछ रिवाल्वर आ
गए थे। किन्तु अभी हथियारों की ज़रूरत थी ही। मैं काशी से कुछ रिवाल्वर
और गोलियाँ लाया था। ये सब करतारसिंह को सौंपकर मैंने कहा कि इस वक़्त
यही सामान पास था सो लेता आया, फिर और भी ला दूंगा किन्तु यह भी जता
दिया कि हम लोगों के पास अस्त्र-शस्त्रों का अधिक संग्रह नहीं है, अतएव इस
पजाब यात्रा / 57
सम्बन्ध मे अधिक आशा न कीजिएगा।
मैने बमगोलो के सम्बन्ध मे उनसे कहा कि इस काम मे बगाली लोग सिद्ध-
हस्त हो गये है और बमगोलो की जिस कदर ज़रूरत होगी, बगाल देगा। उस
समय ये लोग भी एक प्रकार का बमगोला बनाते थे। पजाब मे शीशे की और
पीतल की बनी एक तरह की दवाते मिलती थी। ये दवातें ही पजाबियो के बम
का ऊपरी खोल थी। इन दवातो के मुंह मे पेच था, दवात का ढक्कन लगा देने से
बहुत अच्छी तरह बन्द हो जाता था। और इसका मसाला वही था जो कि पटाखो
का है, अर्थात् पुटास (क्लोरेट आव्) और मनशिल। हिन्दुस्तान की बनी कांच
की एक तरह की छोटी शीशी बाज़ार मे मिलती थी। इसमे सल्फ्यूरिक एसिड
भरकर मुंह बन्द कर दिया जाता और इसे खोल मे डाल दिया जाता था। यह
मामूली धक्के मे ही फट पडता था। मालूम होता है कि अक्सर इसमे मसाले के
साथ शक्कर भी डाली जाती थी। शीशी के टूटने पर एसिड पुटास और शक्कर
के सयोग से यह बमगोला फट पडता और दवात के टुकडे चारो ओर छितरा
जाते थे। यह बम वैसा घातक नही था, फेके जाने पर अक्सर फटता ही नही था।
जो फट भी पडता तो आदमी की जान लेने के लिए बहुत करके काफी न होता।
मैने इन्हे समझा दिया कि बगाल का बमगोला बडा विकट होता है। करतारसिह
ने कहा कि पजाब के विभिन्न स्थानो मे हमारे कुछ बमगोले रखे हुए है, जरूरत
हो तो दिए जा सकते है। जब वे आग्रह के साथ लेने को तैयार हुए तो मैने पूछा
कि अब आपसे कहाँ मुलाकात होगी ? उन्होने उत्तर दिया कि "हमारे ठहरने का
कोई निश्चित स्थान नही है।" इस पर मैंने पूछा, "क्या आपका कोई केन्द्र नही
है जहाँ पहुँचने मे सब बातो का पता ( ' जाय ?" उत्तर नही' मे मिला।
मालूम हुआ कि ये लोग अलग-अलग काम से चले जाएँगे और काम हो जाने पर
फिर एक निर्दिष्ट स्थान पर आ मिलेगे। यदि कि ' कारण मे इस प्रकार एकत्र
न मिल सके तो गुरुद्वारे मे ढूंढने के सिवा पता लगाने का और कोई उपाय
नही। यह सुनने से मुझे बडा अचम्भा हुआ। मैने समझा कि शायद मुझे सब
बाते बतलाई नही जा रही है। इस कारण अपनी रीति के अनुसार, मैने विशेष
पछताछ नही की। इसके विषय मे कुछ सलाह भी न दी। पीछे सम्बन्ध घनिष्ठ
होने पर मालूम हुआ कि सचमुच यही दशा थी, तब उसका उपाय भी कर दिया
गया था। उस बाग मे, जहा बातचीत हो रही थी, पहुँचते ही मुझे जँच गया था
कि जालन्धर शहर मे इनका कोई खास अड्डा नही है। जो लोग यहाँ उपस्थित थे
वे सभी जालन्धर शहर के बाहर के ये और मिलने के लिए आए थे। यहाँ इनका
ऐसा कोई स्थान न था जहाँ जाकर मैं आराम कर सकता। इस प्रकार कुछ
सिलसिला न रहने पर भी, ऐसी ही गडबड मे ये उन रासबिहारी को बुलाना
चाहते थे कि जिन्हे गिरफ्तार कराने के लिए उस समय साढे सात हज़ार रुपए
का इनाम घोषित किया गया था। अस्तु, ये सब बाते सुनकर मैने करतारसिह म
अगले दिन किसी स्थान पर पहुँचने के लिए कहा, वह राजी हो गए। निश्चय
58 / बन्दी जीवन
हुआ कि मैं उनकी प्रतीक्षा उसी स्टेशन पर आकर करूँगा, फिर उनको साथ ले
जाऊँगा और संरक्षित बम के गोले उनके सुपुर्द कर दूंगा।
घड़ी देखी, सब लोग अपना-अपना काम करने को उठ खड़े हुए। उनकी
गाड़ी का समय हो गया था। मैं और मेरे मित्र दोनों एक होटल में गए। वहाँ
मालूम हुआ कि मित्रजी मांस-मछली कुछ भी नहीं खाते। इसलिए मुझे भी
दाल और शाक-सब्जी से ही सन्तोष करना पड़ा। पंजाब की तन्दूरी रोटियाँ और
दाल बहुत बढ़िया होती है।
मैं भी पहले मांस-मछली से परहेज करता था। नहीं कह सकता कि कितनी
बार मांस-मछली खाना बिल्कुल छोड़ दिया और फिर परहेज़ को भी तोड़
डाला। इससे कुछ पहले की बात है, "मैं एक बार होरिद्वार से आकर लक्सर
जंक्शन पर रासूदा की प्रतीक्षा कर रहा था। वह दिन का तीसरे पहर की गाड़ी
मे आने वाले थे। स्टेशन पर अच्छा रिफ्रेशमेंट-रूम था। मैं हाथ-मुंह और सिर
धोकर रिफ्रेशमेंट-रूम में गया। वहाँ मैंने रोटी और तरकारी माँगी। रोटियाँ तो
बढ़िया पछाहीं थीं, किन्तु यह क्या—मांस क्यों ले आया? मुझे उस समय तक
मालूम न था कि पंजाबी लोग गोश्त को तरकारी कहते हैं। क्या करता, बड़े
पशोपेश में पड़ा। लौटाता तो किस तरह और वे लोग ही इसका क्या मतलब
समझते। सोच-विचारकर मैंने खा लेने का ही निश्चय किया। दुबारा जब तीसरे
पहर रासूदा के साथ खाने को बैठा तब उन्होंने भी गोश्त-रोटी की फरमाइश
की। किन्तु तुरन्त ही मेरी ओर देखकर अर्द्धस्फुट स्वर में कहा, "ओह, तुम तो
गोश्त खाओगे नही।" यह कहकर हुक्म बदलने को थे कि मैंने रोककर कह दिया
कि अब आता है तो आने दो और फिर सबेरे की घटना का वर्णन करके कहा कि
उस वक़्त तो खा चुका हूँ, अब जो इस वक़्त न खाऊँगा तो खासा पाखण्ड होगा।
किन्तु रासूदा ने कहा, "देखो, इससे मन में किसी तरह की ग्लानि न होने देना।"
उस दिन से मैं फिर मांस खाने लग गया, परन्तु मांस खाने पर भी, तथा बम को
हाथ से स्पर्श कर चुकने पर भी मैं खूंखार जन्तु नहीं हूँ।
जो हो, तन्दूरी रोटियाँ और बढ़िया दाल खाकर जब मैं तृप्त हो गया तब
शारीरिक स्वराज्य प्राप्त करके मैं तो करतारसिंह के लिए बम के गोले लाने को
दूसरी ओर चला गया और मेरे मित्र महोदय लाहौर की ओर रवाना हुए। मैं
गन्तव्य स्थान में पहुँचकर अपने अड्डे पर गया। यहाँ पर जो हमारा आदमी
था उससे मैंने जालन्धर में सिक्खों से भेंट होने आदि का कुछ ज़िक्र नहीं किया,
सिर्फ यही कहा कि मुझे बम के गोलों की ज़रूरत है, एक सिक्ख महोदय आएँगे,
वह उन्हें ले जाएँगे। सिक्ख नाम सुनकर वह तनिक झिझका और कहने लगा
कि सावधान, सिक्खों से ज़रा सोच-समझकर हेल-मेल करना, उन पर आजकल
सरकार की बड़ी सख्त नज़र है। इस समय उनके संसर्ग से अलग रहना ही भला
है। मैंने मन में सोचा कि बड़ी आफ़त है, अब इस पर विश्वास करना ठीक नहीं
और अब इससे कुछ वास्ता न रखा जाय। प्रकट रूप से उसकी हाँ में हाँ मिला-
कर मैं ठीक निर्दिष्ट समय पर स्टेशन गया। यथासमय गाड़ी तो आ गई किन्तु
करतारसिंह के दर्शन न हुए। तब दूसरी गाड़ी आने पर फिर उनको ढूंढा किन्तु
फल एक-सा ही रहा। सारे स्टेशन में उनके लिए चक्कर काटे, आँखें फाड़-फाड़-
कर कितने ही लोगों के चेहरों को देखा किन्तु किसी का चेहरा करतारसिंह-जैसा
न दीख पड़ा। लाचार होकर डेरे पर लौट आया। मैं तो जानता ही न था कि
करतारसिंह से कहाँ मेट होगी, लेकिन मज़ा यह है कि उनके दल का भी कोई
आदमी यह बात न जान सकता था ! बम के गोले जहाँ के तहाँ रह गए। मैं
लाहौर को लौट गया। यहाँ पुराने मुलाक़ातियों से मिला-जुला और इनसे भी
पंजाब की दशा जानने की चेष्टा की। इस प्रकार अनेक स्थानों और अनेक
उपायों से जो कुछ संग्रह किया था उसकी अनेक बातें मैं आपसे कह चुका। शाम
को लाहौर के समीप एक सार्वजनिक स्थान मे पृथ्वीसिंह मेरी प्रतीक्षा कर रहे
थे, उनसे मैंने करतारसिंह की बात कही। वह भी उनका कुछ पता-ठिकाना न
बतला सके। काशी जाने के सम्बन्ध में उन्होंने तीन-चार दिन की मुहलत
माँगी। निश्चय हुआ कि पाँचवीं दिसम्बर को वह पंजाब मेल द्वारा काशी
पहुँचेंगे। फिर उन्हें मै रासबिहारी के स्थान पर ले जाऊँगा। मैंने इस समय भी
इन लोगों को ठीक पता न बताया था कि रासबिहारी अमुक स्थान पर है।
लाहौर से रवाना होने के पहले मैंने अपने जिन पुरानी जान-पहचानवालो से
मुलाक़ात और बातचीत की थी उनमें से एक व्यक्ति के सम्बन्ध में यहाँ कुछ कहना
चाहता हूँ। शायद ये पंजाबी न थे। ये पहले संयुक्त प्रान्त में ही कहीं निवास करते
रहे होंगे। हाँ, अब पंजाबी हो गए थे और इनके आचार-व्यवहार में पंजाबीपन
आ गया था। इनका पूर्व परिचय सुने बिना ज़रा भी भ्रम न होता कि ये पंजाबी
नहीं हैं। बंगाल से बाहर अन्यान्य प्रान्तों में बहुतेरे बंगाली रहने लगे हैं, किन्तु
वे लोग इतनी जल्दी अपनी विशेषता को खो नहीं देते। तीन-चार पुश्त अथवा
इससे भी अधिक समय तक अन्य प्रान्त में रहने पर भी अधिकांश स्थलों में बंगाली
—बंगाली बने रहते हैं, बल्कि उन स्थानों में उनके मुहल्ले बस जाते हैं। किन्तु
मैंने उत्तर भारत के लोगों को देखा है कि वे ऐसी दशा में, अन्य प्रदेश में
रहते-रहते बहुत जल्दी अपनी विशेषता छोड़कर बिलकुल उस देश वालों में घुल-
मिल जाते हैं। अस्तु, काशी लौटने के पहले इनकी बातचीत से मुझे इनकी थोड़ी-
सी संकीर्णता का परिचय मिला। इससे मै बहुत ही दुखित हुआ। बहुत बातचीत
करने के बाद इन्होंने दिल्ली-षड्यंत्रवाले मुक़दमे का वर्णन करके कहा कि उक्त
अवसर पर बंगाल से उन लोगों को कुछ भी आर्थिक सहायता नहीं मिली, यद्यपि
उसी मुक़दमे के असामी बसन्तकुमार के लिए रुपये भी दिये गए और बैरिस्टर
भी भेजा गया। कुछ-कुछ इसी ढंग का अभियोग उन्होंने बंगाल पर लगाया।
यद्यपि मुझे उस समय की कुल बातें मालूम न थीं, क्योंकि दिल्ली षड्यन्त्रवाले
मुक़दमे के कुछ ही पहले मै इस दल में भर्ती हुआ था तथापि जो कुछ मुझे मालूम
था उसके अनुसार मैंने कहा कि हम लोगों ने दल की ओर से किसी की कुछ सहा-
60 / बन्दी जीवन
यता नहीं की; न तो रुपये ही दिए थे और न किसी बैरिस्टर को ही पैरवी के
लिए भेजा था । बसन्त बाबू के ही किसी विशेष मित्र ने अपनी ओर से द्रव्य खर्च
करके ऐसी सहायता की थी। पंजाब के नए सिक्ख दल के सम्बन्ध में पूछताछ
करने पर इन्होंने ऐसा उत्तर दिया मानो ये कुछ भी न जानते हों, और इन्होंने
जो कुछ कहा उससे स्पष्ट हो गया कि उक्त दल के सम्बन्ध में ये सर्वथा अनभिज्ञ
नहीं हैं । हां, उसे मुझ पर प्रकट नहीं करना चाहते । मज़ा यह है कि इस दल की
बातें इनसे जानने का मुझे अधिकार था । इनकी बातचीत के ढंग से यही व्यक्त
हुआ था कि सिक्खों का यह दल अपने विचारों के अनुसार स्वयं सब काम कर
रहा है, यह किसी से कुछ प्रत्याशा नहीं रखता । मतलब यह है कि "बंगाल क्यों
दाल-भात में मूसलचन्द बनता है ?" जब मैंने यह पूछा कि "क्या इस समय
पंजाब में रासबिहारी के आने से काम में कुछ सहूलियत हो सकती है ?" तो
उत्तर मिला कि "हाँ, अगर वह चाहें तो आ सकते हैं।" मैंने मन में सोचा कि
"हाँ, अगर चाहें तो !" मैंने देखा कि रासबिहारी को भी इस ओर बुलाने का
इनका आग्रह नहीं है यद्यपि ये स्वयं उनसे बहुत दिनों से परिचित हैं। सिक्ख
दल के कुछ नेताओं से परिचय करा देने के लिए उनसे अनुरोध किया तो उत्तर
मिला कि "वैसे नेताओं से उनका खुद परिचय नहीं।" लेकिन इससे पहले
ये मुझसे कह चुके थे कि "लाहौर से संग्रह करके उक्त नेताओं को हम हज़ार
रुपया दे चुके हैं।" इस प्रकार ये जिस समय सिक्ख दल की बहुत-सी बातें
मुझसे छिपाने का प्रयत्न कर रहे थे उस समय मैं मन ही मन मुसकराता
था।
'अहं' को हम कितना ही दूर हटाने की चेष्टा क्यों न किया करें, वह प्रकट
रूप से या अनजाने में न मालूम कितने प्रकार से इसी तरह हमारे पीछे पड़ा
रहता है। अस्तु, इनकी संकीर्णता देखकर कोई यह न समझ ले कि सभी पंजाबी
इसी ढंग के थे। असल बात तो यह है कि जो लोग वास्तविक कार्यकर्ता
थे वे अन्य प्रान्तवालों की अपेक्षा, बंगालियों को कुछ अधिक स्नेह और श्रद्धा
की दृष्टि से देखते थे। मुझे तो ऐसा ही याद पड़ता है कि अन्यान्य प्रान्त-
वालों की अपेक्षा, यहां तक कि बहुतेरे पंजाबियों की भी अपेक्षा, ये सिक्ख
लोग मानो बंगालियों के प्रति विशेष रूप से आकृष्ट थे। मुझे तो यही
लगता है कि जो लोग कुछ करते-धरते नहीं वे ही समालोचना करना पसन्द
करते हैं। मेरे ये मित्र महोदय हमारे कामों में अक्सर अनेक तरह से सहायता
तो किया करते थे सही, परन्तु ज्यादातर वे हम लोगों से दूर ही रहते थे। इस
कारण हम लोग भी उनसे विशेष सम्बन्ध नहीं रखते थे। हाँ, इस समय पंजाब
की भीतरी दशा को जानने-समझने के लिए मैंने सभी के पास जाना आवश्यक
समझा । विपत्ति में पड़ने पर भी ये किसी गुप्त बात को प्रकट नहीं ही करेंगे,
हमारा इतना विश्वास इन पर ज़रूर था और इस विश्वास की सत्यता प्रमाणित
हो चुकी थी, क्योंकि एक बार ये चक्कर में आ चुके थे।
पंजाब यात्रा / 61
अस्तु, अब मैं यह सोचकर कि विप्लव की तयारी का यह नया पर्व आरम्भ
हो गया है, रेल में बैठकर काशी की ओर बढ़ा । रह-रहकर यह सोचता था कि
कब काशी पहुँचूँ और रासूदा को कब सारा हाल सुनाऊँ ।
पंजाब की दशा देखकर मैंने समझ लिया कि यदि बहुत ही शीघ्र इस नवीन
शक्ति को संयत और सुसंगठित न किया जाएगा तो बहुत सम्भव है कि ये सिक्ख
लोग बेमौके ही कुछ ऐसा कर डालें जिससे सारी शक्ति और उद्यम छिन्न-भिन्न
हो जाय। उस समय किसे खबर थी कि इतनी सावधानी रखने पर भी सब टांय-
टाँय फिस हो जाएगी। "इस जगत् में व्यर्थ कुछ भी जाता है या नहीं ?" इस प्रश्न
पर यहाँ विचार नही करना है। इस प्रकार सोचते-सोचते मैंने रास्ते में ही निश्चय
कर लिया था कि जितनी जल्दी हो सके दादा को इस ओर भेजना होगा और
अपने प्रान्त मे भी अब छावनियों में—फौजों में—काम आरम्भ करना होगा।
आगे चलकर बतलाऊँगा कि हम लोगों ने अब तक इस ओर क्यो ध्यान नहीं
दिया था । मैने अब मन में संकल्प कर लिया कि पंजाब में दादा को भेजूंगा और
मैं स्वयं बंगाल जाऊँगा । बंगाल जाकर काम करने की मेरी बहुत दिनों से प्रबल
इच्छा थी। इस विषय की बातचीत दादा से मै पहले कई बार कर चुका था,
किन्तु उनकी अनुमति नही मिलती थी।
पजाब की सीमा को लाँघकर गाड़ी युक्त प्रदेश मे पहुंची । शाम हो गई ।
मेरे डिब्बे मे मुसाफिर अधिक न थे, शायद कुल तीन-चार थे। उस समय दुनिया
के पर्दे पर शायद ही कोई जगह हो जहाँ बीसवी सदी के कुरुक्षेत्र की बातचीत न
होती हो। मुसाफिरो मे परस्पर जान-पहचान हो जाने पर तुरन्त यूरोप के महा-
समर की चर्चा छिडी। मैने अपने एक साथी मुसाफिर से पूछा, "आपके गाँव से
कैसे रगरूट भर्ती हो रहे हैं ?" उत्तर मिला कि "फौज के लिए अब बहुत
मुश्किल से जवान मिलते है हालांकि विनती-चिरोरी और इनाम-इकराम की
भी कमी नही है। लोगो से कह दिया जाता है कि तनख्वाह माकूल मिलेगी और
एक महीने की तनख्वाह पेशगी दी जाएगी। खुद मजिस्ट्रेट और अन्यान्य अफ़सर
देहात मे इसके लिए दौरा करने जाते हैं। जो लोग फौज के लिए इधर-उधर
से आदमी भर्ती करा देते है, उन्हें खासा कमीशन दिया जाता है। किन्तु यह सब
होने पर भी आदमी नही मिलते। जो लोग फौज मे भर्ती होने लायक हैं वे गाँव
छोडकर दूसरे गांव मे भाग जाते हैं।" मैंने पूछा; "क्या आपकी तरफ फौज के
लिए एक भी रगरूट नही मिलता ?" उन्होने उत्तर दिया, "जो लोग बिलकुल
ही नामसमझ है वे पहले तो लालच में आकर भर्ती होना मंजूर कर लेते है किन्तु
जब सैनिक का सच्चा स्वरूप प्रकट होता है तब वे नौकरी छोड़ने की चेष्टा करने
पर भी नौकरी से अलग नही हो पाते। इस दशा में बहुतेरे मनुष्य छावनी से
भाग खड़े होते है, तब इसके लिए उन्हें पुलिस की साँसत भोगनी पड़ती है।"
पजाब की दशा भी मैं ऐसी ही सुन चुका था। वहाँ तो रंगरूट मिलना और
भी मुश्किल हो गया था।
62 / बन्दी जीवन
इस समय मैंने एक बात पर विशेष रूप से ध्यान दिया—क्या रेल, क्या सड़क
और क्या हाट-बाजार, सभी जगह अशिक्षित जनता में अंग्रेजों के प्रति तीव्र विद्वेष
फैलता जाता था। एक दिन काशी में, बस्ती से बाहर, कुएं की जगत पर बैठकर
एक संयुक्तप्रदेशवासी व्यक्ति के साथ हमारे ही किसी काम की आलोचना हो
रही थी। पास ही एक किसान घास छील रहा था। थोड़ी देर में देखा कि वह
और भी समीप आ गया और घास छीलते-छीलते मुसकराकर पूछने लगा,
“अंग्रेजों का राज्य रहेगा भी या नही ?” हम लोगों ने पूछा, “तुम्हें क्या लगता
है ?” उत्तर मिला, “बाबू, अब ये हिन्दुस्तान में नही ठहर सकते, इनका वक़्त
हो चुका। बाबू, जर्मन लोग कब तक आएंगे ?” तब हम लोगों ने उसे समझाया
कि जर्मनो के आने से हमारा कुछ फ़ायदा नही; किन्तु उसने फिर कहा, “नही
बाबूजी, अग्रेज लोग अब न्याय नही करते, अब इनका चला जाना ही भला है ।”
इस पर हमको जो कहना चाहिए था वही कहा। यहाँ उसका उल्लेख करने की
आवश्यकता नही। मैने देखा कि ‘बाबू लोग’ यदि ऐसे लोगो की बाते सुनकर हाँ
मे हां न मिलाते तो ये बाबुओं को जरा टेढी नजर मे देखने लगते थे ।
5
काशी में पुलिस के साथ सम्बन्ध
काशी मे पजाबमेल तीन बजे पहुँची । मेरे ऊपर पुलिस की खास नज़र
रहती थी । सबेरे से लेकर नौ-दस बजे तक पुलिस या तो मेरे घर के दरवाजे के
सामने ही अथवा वही-कही अगल-बगल मे बैठी रहती थी और घर से बाहर
पैर रखते ही मेरी गतिविधि पर नज़र रखने के लिए वह परछाईं की तरह मेरा
पीछा करती थी । घर मे रहने पर भी मुझसे मिलना-जुलना लोगो के लिए सहज
काम न था । क्योकि पुलिस जिसके साथ मेरा हेल-मेल देखती उसकी भी निग-
रानी उसी तरह करने लगती, जैसी कि मेरी करती थी । इस कारण उन दिनो
मेरे-जैसे लोगो के साथ मामूली ढग पर लोगो का मिलना-जुलना भी जुर्म समझा
जाता था । ऐसा सख्त पहरा रहने पर भी मै इस प्रकार के काम करता गहता था।
बगाल से काशी विभाग मे बम के गोले और रिवाल्वर इत्यादि ले आता और
फिर वहाँ से पजाब के विभिन्न प्रदेशो मे इन चीजो को पहुँचाता था, सभी काम
इस सख्त पहरे के बीच होते रहते थे । पुलिस की आँखो मे धूल झोकना हम लोगो
के लिए साधारण-सी बात थी। आगे की बाते लिखने से पहले यहाँ मैं कुछ वे
लटके लिखता हूँ, जिनमे मालूम होगा कि किस प्रकार हम लोग पुलिस के पहरे-
वाले को छकाते थे ।
पुलिम की नजर मे बचने के लिए हमारी सबसे बढ़िया हिकमत यह थी कि
पहले तो घर से निकलते समय ही होशियारी से किसी तरह पहरे वाले को धोखा
दिया । यदि घर से रवाना होते समय पहरेदार की नज़र न बचा सके तो यह
किया कि उस बार न तो दल का कुछ काम किया और न दल के किसी व्यक्ति
से ही भेट की। उस समय या तो अपने किसी सहपाठी के घर चले गए या हाट-
बाजार मे जाकर ज़रूरी सौदा-सुलुफ मे ऐसा चित्त लगा दिया कि घरवाले मम-
झते कि “आज तो शचीन्द्र का ध्यान गृहस्थी के कामो की ओर बेतरह लगा हुआ
है।” अथवा कारमाइकेल लाइब्रेरी मे जाकर मासिकपत्रो और समाचार-पत्रो
की सैर करके फिर जहाँ-के-तहाँ अपने घर आ गए। आखिरी हिकमत यह थी
कि यदि गर्मी का मोसम हुआ तो घर लौटकर थोडी-मी मालिश की और जाह्नवी
के पवित्र जल मे देह तथा मन को शीतल करके पहरेवाले को महज ही छुट्टी दे
दी, सहज इसलिए कि किमी-किसी दिन बेचारे को हमारा पीछा करते-करते
64 / बन्दी जीवन
नाकों चने चबाने पड़ते थे। इन पहरे वालों में से प्रायः किसी के भी साथ मेरा
व्यक्तिगत विरोध न था। आँख से आँख मिलते ही मैं मुसकरा देता था। कभी
तिमंजिले की खिड़की से झांककर मैंने देखना चाहा कि देखें पहरेदार किस ओर
क्या कर रहा है और ठीक इसी समय उसकी भी नज़र मुझ पर पड़ गई तब मैंने
जंगले को खोल दिया। हज़रत नीची निगाह करके टहलते हुए, घर के सामने
से, मुसकराकर कुछ आगे बढ़ गए। ऐसा अवसर होता ही रहता था। इन पहरे-
दारों को धोखा देने में भी मज़ा आता था और धोखा देने में विफल हो जाने से
भी हँसी-मज़ाक का मसाला हाथ लगता था। किन्तु किसी-किसी दिन इम तेज़
निगाह की बदौलत काम में गड़बड़ हो जाने से इन लोगों पर क्रोध भी कम न
होता था। इन्हें हम लोग जब-तब समझाया करते कि "भैया, किसी तरह नौकरी
सँभाले रहो, भला इस तरह दिन-भर दरवाज़े पर डटे रहना कहाँ की भलमनसी
है ? घरवाले और टोले-मुहल्लेवाले भला क्या कहेंगे ? सरकार समझती है कि
[L1
काशी में पुलिस के साथ सम्बन्ध / 65
बाहर से काशी में लाये भी, फिर वहां से बाहर भेज भी दिया। मैं एक दिन
सबेरे घर जा रहा था। घर के पास आते ही एकदम भेदिया विभाग के दारोगा
के सामने जा पड़ा। दारोगा अकेला न था, उसके साथ उसका एक अनुचर भी
था। मुझ पर नज़र पड़ते ही वह मुसकराकर आगे बढ़ा और मेरे पास आ खड़ा
हुआ। मैं भी उसी तरह हंस-हंसकर उससे बातचीत करने लगा। "क्या मार्निंग
वाक करने तशरीफ ले गए थे ?" मैंने भी कहा, "जी हां, ज़रा घूम-घाम आया
हूँ।" "यह क्या है ?" कहकर मेरे बुक-पॉकेट की एक छोटी-सी किताब की ओर
उसने अंगुली से इशारा किया। मैंने उसी दम किताब निकालकर दारोगा को दे
दी। उसमें नैपोलियन की कुछ उक्तियां और ऐसे ही दो-एक अन्य विख्यात
पुरुषों के जीवन की कोई-कोई विशेष घटना लिखी हुई थी। उसने खूब देख-
भालकर मुझे किताब लौटा दी। फिर मुसकराकर हम लोग अपनी-अपनी राह
से लगे। उस दिन और उसी समय मेरे कोट के नीचेवाले पॉकेट में गनकाटन
(इस कपास से बम चलाने की बत्ती का पलीता बनता है) और इसी किस्म के
अन्यान्य भीषण पदार्थ भरे हुए थे।
दूर से नज़र पड़ते ही हम लोग ताड़ लेते थे कि यह पुलिस का आदमी है।
मामूली पहरेदारों को तो उनकी जूतियों से ही पहचान लिया जाता था। फिर
ज्यादातर उनके सिर की टोपी, चलन का ढंग और हाथ में छड़ी लेने की रीति—
अपनी विशेषता के कारण—हमारी दृष्टि को धोखे से बचा लेती थी। कभी-
कभी अपने साथियों के कारण ये लोग पहचान लिए जाते थे। सड़क पर चलते
समय हम लोगों को कुछ ऐसी आदत पड़ गई थी जो कि जेल से लौट आने पर
भी बहुत दिन तक बनी रही। वह यह कि सड़क पर चलते समय एकाएक किसी
जगह ठहरकर किसी व्यक्ति से बातचीत करने लगे और उसी अवसर पर आगे-
पीछे नज़र डालकर एक बार भली भांति देख लिया कि कोई पीछा तो नहीं कर
रहा है। सड़क के मोड़ पर जाकर पीछे भेद भरी निगाह डालने की जो आदत
मुझे पड़ गई थी उसके लिए अभी उस दिन लोगों ने खूब मज़ाक किया। अथवा
कोई चीज़ मोल लेने के बहाने किसी दूकान पर ठहरकर या किसी और ढंग से
चलते-चलते एकदम रुककर आगे-पीछे देखे बिना मैं रास्ता चलता ही न था। मैं
इस बात का ध्यान हमेशा रखता था कि मेरी तनिक-सी भी ग़फ़लत से समूचा दल
तहस-नहस हो सकता है। किन्तु चलते-चलते ठहरे बिना कभी पीछे मुड़कर न
देखता था। यदि एक ही चेहरे पर कई बार नज़र पड़ती तो उस पर तुरन्त सन्देह
हो जाता और मैं अपने सन्देह को जांचने के लिए किसी सुनसान गली में जा
निकलता। उस समय या तो पीछा करनेवाला पकड़ लिया जाता यानी विश्वास
हो जाता कि यह जासूस है अथवा उसे लाचार होकर पीछा छोड़ देना पड़ता था।
अपना पीछा करनेवाले को जब इस तरह हम चंगुल में फांस लेते थे तब किसी
तरह उसे धोखा देना ही हमारा पहला काम होता था। ऐसे मौके पर चकमा
देने का खास ढंग था सुनसान रास्ते पर चलते-चलते एकाएक किसी भीड़-भाड़
66 / बन्दी जीवन
की जगह में जाकर गायब हो जाना। इसके सिवा घर से चलने के पहले ही मैं खूब
चौकन्ना हो जाता था और जिस दिन खास काम होता उस दिन तो बड़े तड़के
घर से चल देता था। जब लौटकर घर आता तो देखता कि मेरा पीछा करने के
लिए तैनात किए गए पहरेदारजी घर को घेरे हुए इस तरह बैठे हैं गोया मैं घर के
भीतर ही हूँ।
पुलिस के साथ मेरा ऐसा ही सम्बन्ध था। ऐसी ही दशा में तीन बजे दिन
को मैं काशी आ पहुँचा। पुलिस की नज़र बचाकर घर गया और फिर वहाँ से
दादा के डेरे पर। रासबिहारी उस समय काशी में ही थे। किन्तु पुलिस को उस
समय स्वप्न में भी हमारी गतिविधि की कुछ भी जानकारी न थी।
दादा से सलाह करने पर निश्चय हुआ कि युक्त प्रान्त के सैनिकों में भी
विप्लव के विचार फैला देने चाहिएँ। और बंगाल को पंजाब के विद्रोह की खबर
बहुत जल्द दे देनी चाहिए। पाँचवीं दिसम्बर की बाट जोही जाने लगी, क्यों-
कि पृथ्वीसिंह से बातचीत हो जाने पर बंगाल को मेरा जाना निश्चित किया गया
था। इस बीच अब मैं इस ताक में लगा कि काशी की छावनी में—बारकों में—
किस प्रकार मेरी रसाई हो। दो-एक दिन के बाद अखबार में पढ़ा कि अमेरिका
से लौटे हुए कुछ सिक्ख, ताँगे में सवार हो, एक गाँव में जा रहे थे। सन्देह करके
पुलिस उन्हें गिरफ़्तार करने गई तो उनके पास से रिवाल्वर इत्यादि अस्त्र
बरामद हुए। फिर पुलिस जब उन्हें गिरफ़्तार करने को तैयार हुई तब सिक्खों ने
गोली चलाई जिससे एक सिपाही बहुत घायल हो गया। बाद को मालूम हुआ
कि ये किसी खज़ाने को लूटने गए थे। किन्तु इनकी 'होशियारी' की 'तारीफ़'
करनी पड़ती है कि इन पर नज़र पड़ते ही पुलिस को शक हो गया !
ध्यान देने की बात है कि इस मौके पर गाँववालों ने पुलिस को सहायता दी
थी। गाँववालों ने समझा कि पुलिस मामूली उचक्कों और चोरों को गिरफ़्तार
कर रही है। बस, इसी धोखे में आकर उन्होंने पुलिस को मदद दी थी। इससे
कुछ दिन बाद की एक घटना का हाल सुनिए। उस समय विप्लव की तैयारी का
भण्डा फूट चुका था। सारे पंजाब में धर-पकड़ की धूम से विचित्र कोलाहल
मचा हुआ था। पुलिस भाई प्यारासिंह नामक एक सिक्ख युवक को गिरफ़्तार
करने की फ़िक्र में थी। एक दिन ऐसा हुआ कि पुलिस का एक घुड़सवार एक
युवक के पीछे बेतहाशा घोड़ा दौड़ाए जा रहा था। इस दशा में वह युवक तीन
मील के लगभग दौड़ा। घोड़े की दौड़ से बाजी मारने में वह असमर्थ होने पर था
कि उसी के गाँववालों ने आकर उसका रास्ता रोक लिया। पल-भर में पुलिस के
सवार ने आकर बहुत दिनों से भागे हुए आसामी भाई प्यारासिंह को गिरफ़्तार कर
लिया। गाँववालों को जब यह मालूम हुआ कि उन्होंने जिन्हें गिरफ़्तार कराया है
वह उन्हीं के गाँव के सुपरिचित और सभी के परमप्रिय भाई प्यारासिंह हैं, तब
उनके पछतावे का अन्त न रहा। जो लोग कभी इन भाई प्यारासिंह से मिले हैं
वे इनके चरित्र की मधुरता से अवश्य मुग्ध हुए हैं, और उन सभी को स्वीकार
काशी में पुलिस के साथ सम्बन्ध / 67
करना पड़ेगा कि इनका 'प्यारा' नाम सोलहों आने ठीक है। जैसे ये स्वभाव
से नम्र थे वैसे ही इनके चरित्र से एक शान्त, समाहित संयत तेज का आभास
मिलता था । गाँववाले सचमुच इनके गुणो पर लट्टू थे और विधाता की मर्जी
देखिए कि उन्ही गुण-मुग्ध गाँववालों ने मानो अपने हाथों अपने प्यारे को पुलिस
के पंजे मे फँसा दिया ।
अस्तु, पंजाब में गिरफ्तारियां होने की खबर पढकर हम लोग किंचित् विच-
लित हुए, क्योंकि हम लोग हरदम यही सोचते रहते थे कि ऐसा बढ़िया मौक़ा
तनिक-सी भूल से कही हाथ से न निकल जाय । इधर अपने दल के उपर्युक्त दो-
एक लड़कों से हमने अपने निश्चित कार्य की बाते कही । इस समय से हम लोगो
ने और सब कामो से ध्यान हटाकर अपना सारा सामर्थ्य सैनिकों का मन परि-
वर्तन करने की चेष्टा करने मे लगा दिया। मै एक दिन अपने एक महाराष्ट्री
मित्र के साथ फौज की बारको की ओर गया । हम लोग सीधे बारकों मे नही
गए, पहले छावनी स्टेशन पर पहुँचे । यह इसलिए किया कि यदि कोई हमारा
पीछा कर रहा हो तो, स्टेशन पर जाने से, बारको मे जाने की हमारी इच्छा उसे
न मालूम हो । स्टेशन पर पहुँचने के बाद हम लोग रेल की पटरी के किनारे-
किनारे बारको की ओर बढे । स्टेशन पर पहुँचने और वहाँ के लम्बे प्लेटफार्म
को तय करने में साफ मालूम हो सकता था कि हमारा पीछा तो नही किया जा
रहा है। और जब मैं रेल की पटरी के किनारे-किनारे चलने लगता था तब तो
कुछ छिप ही न सकता था। फौज की बारकों में जाते-आते समय किसी भी दिन
हमारा पीछा नही किया गया। रेल की लाइन, फौज की बारक के पास से, ग्रैण्ड-
ट्रंक रोड को काटती हुई चली गई है। ग्रैण्डट्रंक रोड के मोड़ पर आकर हमने
देखा कि दो युवा सिक्ख, बारक से निकलकर, शायद बाजार की ओर जा रहे
थे। हमको अपनी ओर आते देखकर वे लोग खड़े हो गए। मैंने इन लोगों से
कितनी ही बाते पूछी । कुछ प्रश्न ये है—“आप कहाँ जा रहे है ? आपकी पलटन
का क्या नाम है ? आपका हवलदार कौन है ? इस समय पलटन मे कितने जवान
हैं ? इससे पहले आप लोग कहाँ थे ? यहाँ से कही जल्दी बदली तो नही होने-
वाली है ? गोरो की बारको मे कितने सिपाही हैं ? और यहाँ की छावनी में
आपको आए कितना समय हुआ है ?” इत्यादि । सभी प्रश्नों के उत्तर देकर
उन्होंने मुस्कराकर पूछा — “ये बाते आप क्यों पूछते हैं ? हम पर हमला तो न
कीजिएगा ?” तब हम लोग भी इसलिए खिलखिलाकर हँस पड़े कि जिसमें इस
उच्च हास्य के अनन्तर इन लोगों के मन में हमारे किए हुए प्रश्नों के सम्बन्ध में
कुछ खटका न रहे । वे लोग अपने रास्ते लगे और हम धीरे-धीरे सडक पर,
बारकों के पास से होकर जाने लगे । बारकों में जाने की हमें हिम्मत न हुई ।
इतने में देखा कि एक और सिक्ख सड़क की तरफ आ रहा है। उससे हवल-
दार की बाबत पूछा तो वह बारक के एक स्थान की ओर अँगुली से इशारा
करके हमसे वहीं जाने को कहकर चला गया । अब हमने सोचा कि शायद बारकों