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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 56, कुल 408 में से

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पृष्ठ 56

54 / बन्दी जीवन

हूँ, क्योंकि इनमें ऐसा कोई भी न जँचा जिसकी उम्र मेरी अपेक्षा बहुत अधिक
हो। उस दिन वहाँ पर करतारसिंह, पृथ्वीसिंह, अमरसिंह और रामरक्खा के
सिवा शायद एक व्यक्ति कोई और उपस्थित था। करतारसिंह की उम्र उस
समय उन्नीस-बीस वर्ष से अधिक न होगी। अमरसिंह और पृथ्वीसिंह दोनों ही
राजपूत थे, किन्तु मुद्दत से पंजाब में ही रहते थे। इनकी अवस्था चौबीस-पचीस
वर्ष से ऊपर नही जँची। रामरक्खा ब्राह्मण थे। इनकी उम्र भी इसी के लगभग
होगी। ये लोग रासबिहारी से मिलने के लिए ठहरे हुए थे। मेरे पूर्व-परिचित
मित्र ने इन लोगों के साथ मेरा परिचय करा दिया। मैंने पहले-पहल इनमें से
किसी का भीनाम-धाम आदि नहीं पूछा। फिर तो बातचीत के सिलसिले में मुझे
सभी का नाम मालूम हो गया। हमारे दल में ऐसी जाँच-पड़ताल ज़रा सन्देह की
दृष्टि से देखी जाती थी और इस प्रकार नाम-धाम पूछना तो मैं बिलकुल
अनावश्यक समझता था। मित्र ने मेरा परिचय यह कहकर कराया कि
रासबिहारी तो एक खास काम के मारे आ नहीं सके, उन्होंने अपने दाहिने हाथ
स्वरूप इन्हें भेजा है। करतारसिंह ने कहा कि हमें तो रासबिहारी से ही काम
है। तब मैंने उन्हें समझाया कि यहाँ आने से पहले वह यहाँ की दशा का पूरा-
पूरा हाल जान लेना चाहते हैं, इसके सिवा वह ऐसी दशा में हैं जिससे और भी
कुछ समय तक इस ओर न आ सकेंगे। इसके पश्चात् मैंने इन लोगों से पजाब
की हालत जानने के लिए पूछा—वे लोग कितने आदमी हैं, आपस में किस प्रकार
मिलते-जुलते और मुलाक़ात करते हैं तथा उनका वास्तविक नेता कौन है,
इत्यादि। मैंने कहा, "जो आपके असली नेता हों उन्ही से मै बातचीत और
पहचान करना चाहता हूँ।" अमरसिंह ने कहा, "सच पूछिए तो हम लोगो मे
वास्तविक नेता की खास कमी है और इसीलिए हमें रामबिहारी की ज़रूरत है।
यहाँ पर हम जितने आदमी मौजूद हैं इनमें किमी को विशेष अभिज्ञता प्राप्त नही
है, इससे हमारे काम का कोई खास सिलसिला नही बैठता। हमको बगाल से
सहायता पाने की बहुत आवश्यकता है। बंगाल में आप लोग बहुत दिन से काम
कर रहे हैं, इन कामों का आप लोगों को यथेष्ट अनुभव हो गया है।" करतारसिह
ने भी इसे माना तो, किन्तु अमरसिंह को लक्ष्य करके कहा, "देखो भाई, यो
हिम्मत क्यों हारते हो? काम के वक्त देख लेना कि तुम्हीं में से कितने छिपे रुस्तम
निकलेंगे।" उस दिन की बातों से मुझे साफ मालूम हो गया कि जिस महान् व्रत
में ये लोग दीक्षित हुए हैं उसके गुरुत्व का अनुभव इनकी नस-नस में भिद गया है
और अपने में शक्ति की कुछ कमी समझकर बाहर एक सहारा ढूँढ़ रहे हैं किन्तु
उसके साथ मैं यह भी समझ गया कि इनमें यदि कोई सचमुच काम करनेवाला है
तो करतारसिंह है। मैंने इसमें जैसा आत्मविश्वास देखा वैसा आत्मविश्वास न
रहने से किसी के द्वारा कोई बड़ा काम नही हो सकता। बहुतों में अहंकार का
भाव रहने पर भी ऐसे आत्मविश्वास का भाव कम देखा जाता है। अहंकार और
आत्मविश्वास. अलग-अलग दो चीजें हैं, अहंकार दूसरे पर चोट करता है, किन्तु