बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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सिक्खों की शिक्षा-दीक्षा आदि के सम्बन्ध में इन्हें अत्यन्त उत्साह था। ऐसी शिक्षा
के प्रचारार्थ उन अमेरिकावासी मजदूरपेशा सिक्खों ने ही अमेरिका से धन-संग्रह
करके कई बार दस-दस, पन्द्रह-पन्द्रह हज़ार की रकमें पंजाब को अर्पण की थीं।
अमेरिका की स्वाधीन आबहवा के बीच में रहने से और खासी आमदनी कर
सकने से उनमें आत्मसम्मान, मर्यादा और आत्मविश्वास का परिमाण बहुत कुछ
बढ़ गया था। इनमें से कई एक ने अमेरिका में रहकर कभी अपने वेश और
परिच्छेद को नही छोड़ा, बहुतेरे तो अपने हाथ से रसोई बनाकर भारतीय ढंग
पर ही आहार किया करते थे। देश से जब पहले-पहल ये लोग अमेरिका पहुँचे
तब शायद अंग्रेज़ी में एक भी बात न कह सकते थे किन्तु वहाँ पहुँचकर अजीब
किस्म की टूटी-फूटी अंग्रेजी बोलना इन्होंने सीख लिया। इनके मुँह से वह टूटी-
फूटी अंग्रेज़ी सुनने मे बड़ा मज़ा आता था। अमेरिका मे ऐसी ही अंग्रेज़ी बोलकर
ये अपनी भावनाएँ व्यक्त करते थे और उम्दा अंग्रेजी न जानने से इनके किसी
काम मे रुकावट न पड़ती थी और फिर इन्होंने धन भी खासा कमाया था। और
सबसे बड़ी बात तो यह थी कि अपने अमेरिका-प्रवास के फलस्वरूप इन लोगों
ने स्वदेश-सम्पर्क को नही तोड़ दिया था। ये करते तो थे अमेरिका में कुलीगिरी
या मज़दूरी, लेकिन यह जानने के लिए सदा व्यग्र रहते थे कि हमारे देश में कहाँ
क्या हो रहा है। उस समय बंगाल की नवजागरण की तरंग ने जिस प्रकार
भारत के अन्यान्य प्रदेशों में एक भाव की हिलोर पैदा कर दी थी उसी प्रकार
उसका हिलकोरा सुदूर अमेरिका मे स्थित भारतीयों के हृदय में भी लगा था।
जब भारत में गदर की चिनगारियाँ धीरे-धीरे इधर-उधर चारो ओर उड़ रही
थीं तब अमेरिका मे कुछ भारतीयों के जी-ही-जी मे वे धधककर जल रही थी।
इसी समय भाई करतार सिंह नामक एक तरुण युवा इनके साथ आकर सम्मिलित
हुए। ये उड़ीसा मे रेवेनशा कालेज की प्रथम श्रेणी की पढ़ाई समाप्त करके विशेष
कारण से अमेरिका चले गए थे। यद्यपि सिक्खो में ये सबसे कम उम्र के थे, फिर
भी इनकी अधिनायकता मे मैंने कितने ही बड़ी उम्र के सिक्खों को भी काम
करते देखा। इन्होंने अपने-जैसे विचार रखनेवाले दो-एक व्यक्तियों की सहायता
से एक सम्वादपत्र के निकालने का सकल्प किया। इसी समय पंजाब के स्वनाम
ख्यात देशभक्त लाला हरदयाल भारत में विप्लव करने की सारी आशाएँ छोड़-
छाडकर अमेरिकन सोशलिस्टों (साम्यवादियों) के साथ आत्मीयता स्थापित
करने का यत्न कर रहे थे। करतारसिंह और उनके मित्र इस अवसर पर हरदयाल
के पास ऐसे पत्र को प्रकाशित करने का प्रस्ताव लेकर उपस्थित हुए। स्वदेश-
प्रेमी हरदयाल तो ऐसे सुयोग की ताक में ही बैठे थे। उन्होंने खुशी-खुशी इस
काम को हाथ में ले लिया। इस प्रकार 'गदर' नामक विख्यात समाचारपत्र का
प्रकाशन होना आरम्भ हुआ, और धीरे-धीरे इसी ने 'गदर' पार्टी का संगठन कर
दिया। कैलीफोरनिया का युगान्तर आश्रम ही इसका केन्द्रस्थल था।
बीसवी सदी के महाभारत (प्रथम विश्वयुद्ध 1914-1919) के आरम्भ होने