बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपजाब यात्रा / 57
सम्बन्ध मे अधिक आशा न कीजिएगा।
मैने बमगोलो के सम्बन्ध मे उनसे कहा कि इस काम मे बगाली लोग सिद्ध-
हस्त हो गये है और बमगोलो की जिस कदर ज़रूरत होगी, बगाल देगा। उस
समय ये लोग भी एक प्रकार का बमगोला बनाते थे। पजाब मे शीशे की और
पीतल की बनी एक तरह की दवाते मिलती थी। ये दवातें ही पजाबियो के बम
का ऊपरी खोल थी। इन दवातो के मुंह मे पेच था, दवात का ढक्कन लगा देने से
बहुत अच्छी तरह बन्द हो जाता था। और इसका मसाला वही था जो कि पटाखो
का है, अर्थात् पुटास (क्लोरेट आव्) और मनशिल। हिन्दुस्तान की बनी कांच
की एक तरह की छोटी शीशी बाज़ार मे मिलती थी। इसमे सल्फ्यूरिक एसिड
भरकर मुंह बन्द कर दिया जाता और इसे खोल मे डाल दिया जाता था। यह
मामूली धक्के मे ही फट पडता था। मालूम होता है कि अक्सर इसमे मसाले के
साथ शक्कर भी डाली जाती थी। शीशी के टूटने पर एसिड पुटास और शक्कर
के सयोग से यह बमगोला फट पडता और दवात के टुकडे चारो ओर छितरा
जाते थे। यह बम वैसा घातक नही था, फेके जाने पर अक्सर फटता ही नही था।
जो फट भी पडता तो आदमी की जान लेने के लिए बहुत करके काफी न होता।
मैने इन्हे समझा दिया कि बगाल का बमगोला बडा विकट होता है। करतारसिह
ने कहा कि पजाब के विभिन्न स्थानो मे हमारे कुछ बमगोले रखे हुए है, जरूरत
हो तो दिए जा सकते है। जब वे आग्रह के साथ लेने को तैयार हुए तो मैने पूछा
कि अब आपसे कहाँ मुलाकात होगी ? उन्होने उत्तर दिया कि "हमारे ठहरने का
कोई निश्चित स्थान नही है।" इस पर मैंने पूछा, "क्या आपका कोई केन्द्र नही
है जहाँ पहुँचने मे सब बातो का पता ( ' जाय ?" उत्तर नही' मे मिला।
मालूम हुआ कि ये लोग अलग-अलग काम से चले जाएँगे और काम हो जाने पर
फिर एक निर्दिष्ट स्थान पर आ मिलेगे। यदि कि ' कारण मे इस प्रकार एकत्र
न मिल सके तो गुरुद्वारे मे ढूंढने के सिवा पता लगाने का और कोई उपाय
नही। यह सुनने से मुझे बडा अचम्भा हुआ। मैने समझा कि शायद मुझे सब
बाते बतलाई नही जा रही है। इस कारण अपनी रीति के अनुसार, मैने विशेष
पछताछ नही की। इसके विषय मे कुछ सलाह भी न दी। पीछे सम्बन्ध घनिष्ठ
होने पर मालूम हुआ कि सचमुच यही दशा थी, तब उसका उपाय भी कर दिया
गया था। उस बाग मे, जहा बातचीत हो रही थी, पहुँचते ही मुझे जँच गया था
कि जालन्धर शहर मे इनका कोई खास अड्डा नही है। जो लोग यहाँ उपस्थित थे
वे सभी जालन्धर शहर के बाहर के ये और मिलने के लिए आए थे। यहाँ इनका
ऐसा कोई स्थान न था जहाँ जाकर मैं आराम कर सकता। इस प्रकार कुछ
सिलसिला न रहने पर भी, ऐसी ही गडबड मे ये उन रासबिहारी को बुलाना
चाहते थे कि जिन्हे गिरफ्तार कराने के लिए उस समय साढे सात हज़ार रुपए
का इनाम घोषित किया गया था। अस्तु, ये सब बाते सुनकर मैने करतारसिह म
अगले दिन किसी स्थान पर पहुँचने के लिए कहा, वह राजी हो गए। निश्चय