बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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यता नहीं की; न तो रुपये ही दिए थे और न किसी बैरिस्टर को ही पैरवी के
लिए भेजा था । बसन्त बाबू के ही किसी विशेष मित्र ने अपनी ओर से द्रव्य खर्च
करके ऐसी सहायता की थी। पंजाब के नए सिक्ख दल के सम्बन्ध में पूछताछ
करने पर इन्होंने ऐसा उत्तर दिया मानो ये कुछ भी न जानते हों, और इन्होंने
जो कुछ कहा उससे स्पष्ट हो गया कि उक्त दल के सम्बन्ध में ये सर्वथा अनभिज्ञ
नहीं हैं । हां, उसे मुझ पर प्रकट नहीं करना चाहते । मज़ा यह है कि इस दल की
बातें इनसे जानने का मुझे अधिकार था । इनकी बातचीत के ढंग से यही व्यक्त
हुआ था कि सिक्खों का यह दल अपने विचारों के अनुसार स्वयं सब काम कर
रहा है, यह किसी से कुछ प्रत्याशा नहीं रखता । मतलब यह है कि "बंगाल क्यों
दाल-भात में मूसलचन्द बनता है ?" जब मैंने यह पूछा कि "क्या इस समय
पंजाब में रासबिहारी के आने से काम में कुछ सहूलियत हो सकती है ?" तो
उत्तर मिला कि "हाँ, अगर वह चाहें तो आ सकते हैं।" मैंने मन में सोचा कि
"हाँ, अगर चाहें तो !" मैंने देखा कि रासबिहारी को भी इस ओर बुलाने का
इनका आग्रह नहीं है यद्यपि ये स्वयं उनसे बहुत दिनों से परिचित हैं। सिक्ख
दल के कुछ नेताओं से परिचय करा देने के लिए उनसे अनुरोध किया तो उत्तर
मिला कि "वैसे नेताओं से उनका खुद परिचय नहीं।" लेकिन इससे पहले
ये मुझसे कह चुके थे कि "लाहौर से संग्रह करके उक्त नेताओं को हम हज़ार
रुपया दे चुके हैं।" इस प्रकार ये जिस समय सिक्ख दल की बहुत-सी बातें
मुझसे छिपाने का प्रयत्न कर रहे थे उस समय मैं मन ही मन मुसकराता
था।
'अहं' को हम कितना ही दूर हटाने की चेष्टा क्यों न किया करें, वह प्रकट
रूप से या अनजाने में न मालूम कितने प्रकार से इसी तरह हमारे पीछे पड़ा
रहता है। अस्तु, इनकी संकीर्णता देखकर कोई यह न समझ ले कि सभी पंजाबी
इसी ढंग के थे। असल बात तो यह है कि जो लोग वास्तविक कार्यकर्ता
थे वे अन्य प्रान्तवालों की अपेक्षा, बंगालियों को कुछ अधिक स्नेह और श्रद्धा
की दृष्टि से देखते थे। मुझे तो ऐसा ही याद पड़ता है कि अन्यान्य प्रान्त-
वालों की अपेक्षा, यहां तक कि बहुतेरे पंजाबियों की भी अपेक्षा, ये सिक्ख
लोग मानो बंगालियों के प्रति विशेष रूप से आकृष्ट थे। मुझे तो यही
लगता है कि जो लोग कुछ करते-धरते नहीं वे ही समालोचना करना पसन्द
करते हैं। मेरे ये मित्र महोदय हमारे कामों में अक्सर अनेक तरह से सहायता
तो किया करते थे सही, परन्तु ज्यादातर वे हम लोगों से दूर ही रहते थे। इस
कारण हम लोग भी उनसे विशेष सम्बन्ध नहीं रखते थे। हाँ, इस समय पंजाब
की भीतरी दशा को जानने-समझने के लिए मैंने सभी के पास जाना आवश्यक
समझा । विपत्ति में पड़ने पर भी ये किसी गुप्त बात को प्रकट नहीं ही करेंगे,
हमारा इतना विश्वास इन पर ज़रूर था और इस विश्वास की सत्यता प्रमाणित
हो चुकी थी, क्योंकि एक बार ये चक्कर में आ चुके थे।