बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपंजाब यात्रा / 61
अस्तु, अब मैं यह सोचकर कि विप्लव की तयारी का यह नया पर्व आरम्भ
हो गया है, रेल में बैठकर काशी की ओर बढ़ा । रह-रहकर यह सोचता था कि
कब काशी पहुँचूँ और रासूदा को कब सारा हाल सुनाऊँ ।
पंजाब की दशा देखकर मैंने समझ लिया कि यदि बहुत ही शीघ्र इस नवीन
शक्ति को संयत और सुसंगठित न किया जाएगा तो बहुत सम्भव है कि ये सिक्ख
लोग बेमौके ही कुछ ऐसा कर डालें जिससे सारी शक्ति और उद्यम छिन्न-भिन्न
हो जाय। उस समय किसे खबर थी कि इतनी सावधानी रखने पर भी सब टांय-
टाँय फिस हो जाएगी। "इस जगत् में व्यर्थ कुछ भी जाता है या नहीं ?" इस प्रश्न
पर यहाँ विचार नही करना है। इस प्रकार सोचते-सोचते मैंने रास्ते में ही निश्चय
कर लिया था कि जितनी जल्दी हो सके दादा को इस ओर भेजना होगा और
अपने प्रान्त मे भी अब छावनियों में—फौजों में—काम आरम्भ करना होगा।
आगे चलकर बतलाऊँगा कि हम लोगों ने अब तक इस ओर क्यो ध्यान नहीं
दिया था । मैने अब मन में संकल्प कर लिया कि पंजाब में दादा को भेजूंगा और
मैं स्वयं बंगाल जाऊँगा । बंगाल जाकर काम करने की मेरी बहुत दिनों से प्रबल
इच्छा थी। इस विषय की बातचीत दादा से मै पहले कई बार कर चुका था,
किन्तु उनकी अनुमति नही मिलती थी।
पजाब की सीमा को लाँघकर गाड़ी युक्त प्रदेश मे पहुंची । शाम हो गई ।
मेरे डिब्बे मे मुसाफिर अधिक न थे, शायद कुल तीन-चार थे। उस समय दुनिया
के पर्दे पर शायद ही कोई जगह हो जहाँ बीसवी सदी के कुरुक्षेत्र की बातचीत न
होती हो। मुसाफिरो मे परस्पर जान-पहचान हो जाने पर तुरन्त यूरोप के महा-
समर की चर्चा छिडी। मैने अपने एक साथी मुसाफिर से पूछा, "आपके गाँव से
कैसे रगरूट भर्ती हो रहे हैं ?" उत्तर मिला कि "फौज के लिए अब बहुत
मुश्किल से जवान मिलते है हालांकि विनती-चिरोरी और इनाम-इकराम की
भी कमी नही है। लोगो से कह दिया जाता है कि तनख्वाह माकूल मिलेगी और
एक महीने की तनख्वाह पेशगी दी जाएगी। खुद मजिस्ट्रेट और अन्यान्य अफ़सर
देहात मे इसके लिए दौरा करने जाते हैं। जो लोग फौज के लिए इधर-उधर
से आदमी भर्ती करा देते है, उन्हें खासा कमीशन दिया जाता है। किन्तु यह सब
होने पर भी आदमी नही मिलते। जो लोग फौज मे भर्ती होने लायक हैं वे गाँव
छोडकर दूसरे गांव मे भाग जाते हैं।" मैंने पूछा; "क्या आपकी तरफ फौज के
लिए एक भी रगरूट नही मिलता ?" उन्होने उत्तर दिया, "जो लोग बिलकुल
ही नामसमझ है वे पहले तो लालच में आकर भर्ती होना मंजूर कर लेते है किन्तु
जब सैनिक का सच्चा स्वरूप प्रकट होता है तब वे नौकरी छोड़ने की चेष्टा करने
पर भी नौकरी से अलग नही हो पाते। इस दशा में बहुतेरे मनुष्य छावनी से
भाग खड़े होते है, तब इसके लिए उन्हें पुलिस की साँसत भोगनी पड़ती है।"
पजाब की दशा भी मैं ऐसी ही सुन चुका था। वहाँ तो रंगरूट मिलना और
भी मुश्किल हो गया था।