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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 52, कुल 408 में से

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पृष्ठ 52

50 / बन्दी जीवन
परमानन्द नामक एक छरहरे डील के युवा पुरुष इन लोगों में आ मिले। ये
बुन्देलखण्ड के निवासी थे। अण्डमन में इन्हें हम लोग छोटे परमानन्द कहते थे,
क्योंकि बड़े परमानन्द थे डी० ए० वी० कालेज लाहौर के भूतपूर्व अध्यापक भाई
परमानन्दजी। इन्हें भी लाहौर षड्यन्त्र के मामले में आजन्म कालेपानी की
सजा दी गई थी। पंजाब में सिक्खों के अभ्युत्थान के अवसर पर स्वदेश और
स्वधर्म के लिए जब निडर देशभक्तगण मुसलमानों के अत्याचार के आगे बेधड़क
बलिदान हो रहे थे—सिर दे देते थे लेकिन धर्म न देते थे—उस समय भाई
परमानन्द के एक पूर्वपुरुष ने आत्म-बलिदान की पराकाष्ठा दिखला दी थी। उस
समय उन्हें मुसलमानों ने आरे से चीरकर मारा था। उसी समय से सिक्खों में यह
खानदान 'भाई' नाम से विख्यात हो गया। सिक्खों में यह 'भाई' संज्ञा बड़ी
सम्मानसूचक है। इसलिए हम लोग सिक्ख मात्र को उनके नाम के साथ 'भाई'
शब्द लगाकर बुलाया करते थे।
सिक्खों के एक बड़े उत्साही नेता भाई भगवानसिंह थे। इनके व्याख्यान सुन-
सुनकर कितने ही सिक्ख, अपना काम-काज छोड़, विप्लव कार्य में सहायता करने
के लिए देश में लौट आए थे। ये लोग कुछ क्षणिक उत्तेजना में आकर, सर्वस्व
छोड़-छाड़कर, इस विप्लव-धर्म में दीक्षित नहीं हुए थे, वरन् इनमें सचमुच
देशसेवा की प्रेरणा जाग्रत थी। इस प्रकार से जो सिक्ख देश में लौट आए थे
उनमें बहुतों से मेरी बातचीत हुई थी। उससे मालूम हुआ कि वे सचमुच प्राणों
की प्रत्येक तह में—दिल के हर पहलू में—पराधीनता की जलन का अनुभव
करके विप्लव कार्य में सम्मिलित हुए थे। इनमें से कोई तो पिनांग की मिलिटरी
पुलिस में नियुक्त था, कोई हांगकांग में पहरेदार था और कोई सौदागरी करता
था। इस समय हांगकांग में सिक्खों की एक रेजिमेंट थी। इस रेजिमेंट पर भी
इन लोगों का आधिपत्य हो गया था।
भारत में लौटे हुए दल के अनेक व्यक्ति ऐसे थे जो कि अंग्रेज़ों की पलटनों में
सैनिक पद पर रह चुके थे। इनमें से किसी की सर्विस आठ वर्ष की, किसी की
दस वर्ष की और किसी-किसी की ग्यारह वर्ष की थी। इनमें कोई भी ऐसा सैनिक
न था जिसे तीन वर्ष से कम की अभिज्ञता हो, क्योंकि प्रत्येक सैनिक को कम से
कम तीन वर्ष तक नोकरी करने की शर्त करनी पड़ती है। इनमें से बहुतेरों का
काम मशीनगन चलाना था और कुछ लोग तोपखाने में भी काम कर चुके थे।
भारत में लौटने के मार्ग में पुलिस विभाग के कर्मचारियों ने इन लोगों से
पूछा था कि आखिर तुम लोग हिन्दुस्तान किसलिए जा रहे हो? तो इनमें से
किसी ने कहा कि विवाह करने जाता हूँ और किसी ने कहा कि घर छोड़े बहुत
दिन हो गए, इसलिए देश को जा रहा हूँ। ऐसे ही ऐसे कारण बतला दिए थे।
फिर अदालत में मुकदमे के वक्त जब न्यायकर्ता इनसे हिन्दुस्तान में आने का कारण
पूछते तब भी ये लोग प्रायः वैसे ही उत्तर देते थे जो कि ऊपर दिए गए हैं।
सिर्फ एक व्यक्ति ने दूसरे ढंग का उत्तर दिया था। न्यायकर्ता ने अभियुक्त से