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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 60, कुल 408 में से

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पृष्ठ 60

58 / बन्दी जीवन
हुआ कि मैं उनकी प्रतीक्षा उसी स्टेशन पर आकर करूँगा, फिर उनको साथ ले
जाऊँगा और संरक्षित बम के गोले उनके सुपुर्द कर दूंगा।
घड़ी देखी, सब लोग अपना-अपना काम करने को उठ खड़े हुए। उनकी
गाड़ी का समय हो गया था। मैं और मेरे मित्र दोनों एक होटल में गए। वहाँ
मालूम हुआ कि मित्रजी मांस-मछली कुछ भी नहीं खाते। इसलिए मुझे भी
दाल और शाक-सब्जी से ही सन्तोष करना पड़ा। पंजाब की तन्दूरी रोटियाँ और
दाल बहुत बढ़िया होती है।
मैं भी पहले मांस-मछली से परहेज करता था। नहीं कह सकता कि कितनी
बार मांस-मछली खाना बिल्कुल छोड़ दिया और फिर परहेज़ को भी तोड़
डाला। इससे कुछ पहले की बात है, "मैं एक बार होरिद्वार से आकर लक्सर
जंक्शन पर रासूदा की प्रतीक्षा कर रहा था। वह दिन का तीसरे पहर की गाड़ी
मे आने वाले थे। स्टेशन पर अच्छा रिफ्रेशमेंट-रूम था। मैं हाथ-मुंह और सिर
धोकर रिफ्रेशमेंट-रूम में गया। वहाँ मैंने रोटी और तरकारी माँगी। रोटियाँ तो
बढ़िया पछाहीं थीं, किन्तु यह क्या—मांस क्यों ले आया? मुझे उस समय तक
मालूम न था कि पंजाबी लोग गोश्त को तरकारी कहते हैं। क्या करता, बड़े
पशोपेश में पड़ा। लौटाता तो किस तरह और वे लोग ही इसका क्या मतलब
समझते। सोच-विचारकर मैंने खा लेने का ही निश्चय किया। दुबारा जब तीसरे
पहर रासूदा के साथ खाने को बैठा तब उन्होंने भी गोश्त-रोटी की फरमाइश
की। किन्तु तुरन्त ही मेरी ओर देखकर अर्द्धस्फुट स्वर में कहा, "ओह, तुम तो
गोश्त खाओगे नही।" यह कहकर हुक्म बदलने को थे कि मैंने रोककर कह दिया
कि अब आता है तो आने दो और फिर सबेरे की घटना का वर्णन करके कहा कि
उस वक़्त तो खा चुका हूँ, अब जो इस वक़्त न खाऊँगा तो खासा पाखण्ड होगा।
किन्तु रासूदा ने कहा, "देखो, इससे मन में किसी तरह की ग्लानि न होने देना।"
उस दिन से मैं फिर मांस खाने लग गया, परन्तु मांस खाने पर भी, तथा बम को
हाथ से स्पर्श कर चुकने पर भी मैं खूंखार जन्तु नहीं हूँ।
जो हो, तन्दूरी रोटियाँ और बढ़िया दाल खाकर जब मैं तृप्त हो गया तब
शारीरिक स्वराज्य प्राप्त करके मैं तो करतारसिंह के लिए बम के गोले लाने को
दूसरी ओर चला गया और मेरे मित्र महोदय लाहौर की ओर रवाना हुए। मैं
गन्तव्य स्थान में पहुँचकर अपने अड्डे पर गया। यहाँ पर जो हमारा आदमी
था उससे मैंने जालन्धर में सिक्खों से भेंट होने आदि का कुछ ज़िक्र नहीं किया,
सिर्फ यही कहा कि मुझे बम के गोलों की ज़रूरत है, एक सिक्ख महोदय आएँगे,
वह उन्हें ले जाएँगे। सिक्ख नाम सुनकर वह तनिक झिझका और कहने लगा
कि सावधान, सिक्खों से ज़रा सोच-समझकर हेल-मेल करना, उन पर आजकल
सरकार की बड़ी सख्त नज़र है। इस समय उनके संसर्ग से अलग रहना ही भला
है। मैंने मन में सोचा कि बड़ी आफ़त है, अब इस पर विश्वास करना ठीक नहीं
और अब इससे कुछ वास्ता न रखा जाय। प्रकट रूप से उसकी हाँ में हाँ मिला-