बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
पृष्ठ 51, कुल 408 में से
संदर्भ में पढ़ेंसिक्ख दल का परिचय / 49
से पहले तक भारतीय विप्लववादियों का दल समझ ही न सका था कि अंग्रेजों
के साथ जर्मनी का विरोध इतनी जल्दी उपस्थित हो जाएगा । फलतः इनके
विप्लव की तैयारी भी इस ढंग से हो रही थी कि मानो दस-पन्द्रह वर्ष के अनन्तर
वास्तविक 'गदर' शुरू होगा । यही कारण है कि ये लोग महासमर छिड़ते समय
क्रान्ति के लिए पूरी तौर पर तैयार न थे । इसके सिवा अब तक के विप्लव-
कारी दल के साथ भारत से बाहरी देश के किसी भी क्रान्तिकारी दल का कहने
लायक कोई सम्बन्ध ही न था । इसका फल यह हुआ कि जब अमेरिका से क्रान्ति-
कारियों के दल-के-दल भारत में आने लगे तब भारत में स्थित क्रान्तिकारी
लोग उनके साथ दिल खोलकर ठीक समय पर सम्मिलित नही हो सके । यदि
ऐसा सम्मिलन हो जाता तो भारत का भाग्य आज कुछ और ही होता ।
अमेरिका प्रवासी विप्लवपथियो की समझ मे नही आया था कि अंग्रेजों के
साथ जर्मनो का युद्ध शीघ्र ही छिड़ जाएगा, इस कारण उनकी तैयारी और ही
ढग पर हो रही थी। वे समझते थे कि भारत से बाहर की किसी अन्य राजशक्ति
की सहायता लेकर युद्ध की तैयारी करनी होगी और इसी सकल्प को कार्य मे
परिणत करने के लिए बहुत कुछ आयोजन हो रहा था, परन्तु इनके लिए असमय
मे ही यूरोप मे रणचण्डी का नृत्य होने लगा । इसके लिए ये तैयार न थे और
सारा संकल्प एकदम विफल हो गया । अब इन्होने निश्चय किया कि गदरपार्टी के
दल-के-दल भारत मे पहुँचकर भारतीय सैनिको को अपने प्रभाव मे कर ले । बस,
क्रान्ति का यही एकमात्र उपाय निश्चित हो गया । हजारो सिक्ख विदेश मे पड़े
हुए अपने बोरिए-बँधने समेट-ममेटकर स्वदेश को रवाना हो गए ।
इधर भारत सरकार को इस पार्टी की बहुत-सी बातो का पता लग चुका था,
क्योकि इस पार्टी के मेम्बर लोग अमेरिका मे खुले खजाने सभाओ मे, भारत मे
गदर करने के सम्बन्ध मे व्याख्यान दिया करते थे । 'गदर' नामक पत्र भी
प्रकाश्य रूप मे मुद्रित होता था । सन् 1857 के महाविप्लव की दसवी मई एक
उत्सव मे परिणत की जाती थी । लाला हरदयाल पर अग्रेज़ सरकार की विशेष
उग्र दृष्टि थी । कई बार उनकी डायरी तक बडी सफाई से उडा ली गई । अन्त
मे जब उनको गिरफ्तार करने की सलाह हो रही थी तब एक अमेरिकन ने उन्हें
सावधान कर दिया । अतएव हरदयाल और अन्य भारतीयो ने अमेरिका से हट
जाने मे ही भलाई सोची ।
विभिन्न स्थानों के जर्मन एलची (कोन्सल) उस समय भारत मे विप्लव
मचा देने की इच्छा रखनेवालो की अनेक प्रकार से सहायता करते थे । अमेरिका
से लौटे हुए इन दलो ने उनसे मिलने-जुलने के अवसर को कभी खाली नही जाने
दिया ।
इस प्रकार कुछ व्यक्ति तो यूरोप की ओर चले गए और जो रह गए वे
भारत की ओर रवाना हुए। रास्ते मे यें लोग जहाँ-तहाँ अपना अभिप्राय प्रकट
कर दिया करते थे । इस प्रकार का एक दल जापान के बन्दर मे पहुँचा । यहाँ पर