बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर मैं ठीक निर्दिष्ट समय पर स्टेशन गया। यथासमय गाड़ी तो आ गई किन्तु
करतारसिंह के दर्शन न हुए। तब दूसरी गाड़ी आने पर फिर उनको ढूंढा किन्तु
फल एक-सा ही रहा। सारे स्टेशन में उनके लिए चक्कर काटे, आँखें फाड़-फाड़-
कर कितने ही लोगों के चेहरों को देखा किन्तु किसी का चेहरा करतारसिंह-जैसा
न दीख पड़ा। लाचार होकर डेरे पर लौट आया। मैं तो जानता ही न था कि
करतारसिंह से कहाँ मेट होगी, लेकिन मज़ा यह है कि उनके दल का भी कोई
आदमी यह बात न जान सकता था ! बम के गोले जहाँ के तहाँ रह गए। मैं
लाहौर को लौट गया। यहाँ पुराने मुलाक़ातियों से मिला-जुला और इनसे भी
पंजाब की दशा जानने की चेष्टा की। इस प्रकार अनेक स्थानों और अनेक
उपायों से जो कुछ संग्रह किया था उसकी अनेक बातें मैं आपसे कह चुका। शाम
को लाहौर के समीप एक सार्वजनिक स्थान मे पृथ्वीसिंह मेरी प्रतीक्षा कर रहे
थे, उनसे मैंने करतारसिंह की बात कही। वह भी उनका कुछ पता-ठिकाना न
बतला सके। काशी जाने के सम्बन्ध में उन्होंने तीन-चार दिन की मुहलत
माँगी। निश्चय हुआ कि पाँचवीं दिसम्बर को वह पंजाब मेल द्वारा काशी
पहुँचेंगे। फिर उन्हें मै रासबिहारी के स्थान पर ले जाऊँगा। मैंने इस समय भी
इन लोगों को ठीक पता न बताया था कि रासबिहारी अमुक स्थान पर है।
लाहौर से रवाना होने के पहले मैंने अपने जिन पुरानी जान-पहचानवालो से
मुलाक़ात और बातचीत की थी उनमें से एक व्यक्ति के सम्बन्ध में यहाँ कुछ कहना
चाहता हूँ। शायद ये पंजाबी न थे। ये पहले संयुक्त प्रान्त में ही कहीं निवास करते
रहे होंगे। हाँ, अब पंजाबी हो गए थे और इनके आचार-व्यवहार में पंजाबीपन
आ गया था। इनका पूर्व परिचय सुने बिना ज़रा भी भ्रम न होता कि ये पंजाबी
नहीं हैं। बंगाल से बाहर अन्यान्य प्रान्तों में बहुतेरे बंगाली रहने लगे हैं, किन्तु
वे लोग इतनी जल्दी अपनी विशेषता को खो नहीं देते। तीन-चार पुश्त अथवा
इससे भी अधिक समय तक अन्य प्रान्त में रहने पर भी अधिकांश स्थलों में बंगाली
—बंगाली बने रहते हैं, बल्कि उन स्थानों में उनके मुहल्ले बस जाते हैं। किन्तु
मैंने उत्तर भारत के लोगों को देखा है कि वे ऐसी दशा में, अन्य प्रदेश में
रहते-रहते बहुत जल्दी अपनी विशेषता छोड़कर बिलकुल उस देश वालों में घुल-
मिल जाते हैं। अस्तु, काशी लौटने के पहले इनकी बातचीत से मुझे इनकी थोड़ी-
सी संकीर्णता का परिचय मिला। इससे मै बहुत ही दुखित हुआ। बहुत बातचीत
करने के बाद इन्होंने दिल्ली-षड्यंत्रवाले मुक़दमे का वर्णन करके कहा कि उक्त
अवसर पर बंगाल से उन लोगों को कुछ भी आर्थिक सहायता नहीं मिली, यद्यपि
उसी मुक़दमे के असामी बसन्तकुमार के लिए रुपये भी दिये गए और बैरिस्टर
भी भेजा गया। कुछ-कुछ इसी ढंग का अभियोग उन्होंने बंगाल पर लगाया।
यद्यपि मुझे उस समय की कुल बातें मालूम न थीं, क्योंकि दिल्ली षड्यन्त्रवाले
मुक़दमे के कुछ ही पहले मै इस दल में भर्ती हुआ था तथापि जो कुछ मुझे मालूम
था उसके अनुसार मैंने कहा कि हम लोगों ने दल की ओर से किसी की कुछ सहा-