बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसिक्ख दल का परिचय / 51
पूछा, "तुम देश में किसलिए आए थे ?" इसका उत्तर दिया था कि "यह हमारा
स्वदेश जो है।" इन पंजाबी ब्राह्मण का नाम जगतराम था। ये 'गदर' पत्रिका
के सम्पादन विभाग में काम करते थे।
अमेरिका से आये हुए सिक्खों में उत्साह तो अदम्य था किन्तु काम करने की
रीति उन्हें मालूम ही न थी। न इसका कोई केन्द्र था और न कोई शाखा ही।
किसी-किसी की अधीनता में बीस-पचीस मनुष्य रहते थे। उसे इन बीस-
पचीस आदमियों का सरदार कहा जाता था। ये सरदार कभी एकत्र हो जाते थे
और कभी कुछ दिनों तक इनकी परस्पर भेंट ही न होती थी। असल बात यह कि
सम्मिलित रूप में काम करने की एक प्रणाली का इनमें अभाव था। इसका कारण
यही था कि इनका कही केन्द्र न था। इस प्रकार देश में बिलकुल अव्यवस्थित
रूप से कितने लोग गड़बड़ मचा रहे थे यह कौन जानता है। जो लोग मुलतान
जेल में कैद थे वे भी यही कहते थे कि अब शीघ्र ही बलवा होगा और इससे हम
झटपट रिहाई पा जाएँगे। इमका फल यह हुआ कि ये भिन्न-भिन्न जेलों में बाँट
दिए गए। समानधर्मा और एक ही भाव के भावुक बहुत लोगों के एक स्थान में
रहने से जो आनन्द प्राप्त होता है वह आनन्द भी इनसे छिन गया।
इन सब दलों ने भारत में आते ही बंगाल के गुप्त विप्लव दल का पता
लगाना आरम्भ कर दिया। किन्तु पहले से ही किसी के साथ जान-पहचान न
रहने के कारण पात्र-अपात्र का विचार किए बिना ही ये लोग पंजाब में विद्रोह
की बातें कहने लगे। इस समय कलकत्ता की मामूली सड़कों पर भी मैंने सुना था
कि पंजाब मे विप्लव की तैयारी हो रही है। 'भारत रक्षा' क़ानून बनाते समय
हार्डिज साहब ने इम बात का उल्लेख किया था।
इसी समय करतारसिंह ने आकर बंगाल के किसी सुपरिचित, लब्धप्रतिष्ठ
सार्वजनिक नेता से मुलाक़ात की। उन्होने करतारसिंह को उपदेश दिया कि तुम
अपने संकल्प और सुभीते के अनुसार काम करते जाओ, बंगाल तो ठीक समय पर
तुम्हारी सहायता करेगा ही। अब यह कहने में कोई बाधा नही है कि ये व्यक्ति
सर सुरेन्द्रनाथ बनर्जी थे।
इस समय इन्हें थोड़े-बहुत हथियारों की ज़रूरत हुई। यद्यपि इस विप्लव का
प्रधान अवलम्ब पंजाबी सैनिकों के दल थे, तथापि आत्मरक्षा करने के लिए यथा-
सम्भव प्रत्येक कार्यकर्त्ता को सशस्त्र रखने की इच्छा से कुछ रिवाल्वर इत्यादि की
आवश्यकता हुई। इस उद्देश्य की सिद्धि के लिए श्रीयुत जगतराम कुछ रुपये देकर
काबुल की ओर भेजे गए और यही से कारागार की यन्त्रणाओं ने उनका पल्ला
पकड़ लिया। बेचारे जगतराम पेशावर मे ही पकड़ लिए गए और आगे चलकर
अण्डमन में मुझे उनके दर्शन हुए थे।
छोटे परमानन्द को भी इन लोगों ने इसी काम के लिए बंगाल भेजा था पर
ये भी खाली हाथ लौट आए।