बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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कितने भावों का आलोडन हो रहा था। मैं रास्ते-भर में यही सोचता गया कि इस
सिक्ख दल के आदमी न जाने किस ढंग के होंगे, उनकी शिक्षा-दीक्षा कैसी है;
यह तो सुन ही चुका था कि इनमें बहुतेरों की उम्र तीस वर्ष की या इससे भी
अधिक है, ये मुझे किस दृष्टि से देखेंगे (क्योंकि उस समय मैं कुल बाईस वर्ष का
था), वहाँ जाने पर मेरा इन पर कुछ असर भी पड़ेगा कि नहीं, इतने बड़े उत्साह
से उन्मत्त जनसंघ को हम लोग किस प्रकार सुसंयत करके अपना अभीष्ट साधन
करेंगे; ऐसे-ऐसे सैकड़ों प्रश्न रास्ते-भर भीतर ही भीतर मुझे बेचैन करते रहे।
साथ ही साथ एक आनन्द-स्रोत भी मर्म की ओट करके, मानो बिना जाने ही बहा
चला जा रहा था कि इस बार जीवन का स्वप्न सफल होना चाहता है, युग-
युगान्तर का अँधेरा इस बार हट जाएगा, किन्तु एक और बात को सोचते ही
मानो शंका से मेरी देह कण्टकित हो उठती थी, वह यही कि बंगाल आज कितना
पिछड़ा हुआ है—इस पुण्यधूम यज्ञ से कितने अन्तर पर है ! बंगाल की सैकड़ों-
हजारों वर्षों की कलंक-कालिमा मानो गाढ़ी होकर मुझे निरन्तर कसकती रहती
थी। इसी से बंगाल में जाकर काम करने की मुझे बहुत इच्छा थी। खैर, जाने
दो उस बात को।
लुधियाना पीछे रह गया। अब हम लोग एक और स्टेशन पर पहुँचे। करतार
सिंह ने 'बुलेटिन' नाम का समाचारपत्र मोल लिया। उसमें पढ़ा कि कलकत्ता की
मुसलमान पाड़ा लेन में बम की भीषण घटना हुई है। समाचार था कि खुफिया
पुलिस के डिप्टी सुपरिटेंडेंट श्रीयुत बसन्त चटर्जी के घर पर दो-तीन बम फेंके
गए हैं। इससे एक हेड कांस्टेबल का पैर उड़ गया, कुछ लोग घायल हुए, मकान
की दीवार का कुछ अंश उड़ जाने से गड्ढा हो गया, घर के भीतर का आराईश
का बहुत-सा सामान सड़क पर आ गिरा और मकान के सामने का लालटेन का
खम्भा टूट-फूट गया है, इत्यादि। किन्तु बसन्त बाबू इस बार साफ बच गए।
समाचार पढ़ने से बहुतेरी बातें मैंने समझ लीं। पंजाब का वृत्तान्त लिख चुकने
पर बंगाल की उस समय की दशा पर विचार करते समय इन बातों को ठीक-
ठीक लिखने की इच्छा है।
इन बम गोलों के फटने से भारत में चारों ओर देशभक्तों के बीच जाग्रति-
सी देख पड़ती थी। सभी, कम से कम बहुतेरे, लोग समझते थे कि बड़े भारी
विप्लव की तैयारी का यह ऊपरी लक्षण है और ऐसी घटनाओं से सबको ऐसे-ऐसे
दलों का संगठन करने की इच्छा होती थी। उल्लिखित संवाद को पढ़कर करतार
सिंह बहुत ही प्रसन्न हुए। परस्पर नेत्रों में बातचीत हो गई, एक-दूसरे की आँखों
के कोनों से आनन्द का आभास प्रकट हुआ। इस प्रकार हम लोग जालन्धर
स्टेशन पर पहुँचे। यहाँ करतारसिंह के कई छात्र-मित्र प्रतीक्षा कर रहे थे। इनमें
जिनसे जो कुछ कहना था वह कह-सुन चुकने पर हम लोग रेल की पटरी को पार
करके पास के बगीचे में गए, वहाँ पर इस दल के कई नेता उपस्थित थे। इनको
देखने से मुझे भरोसा हुआ कि इन लोगों के बीच में मैं बिलकुल ही कम उम्र नहीं