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सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

कुछ पूरक तथ्य / 375
भारत में विद्रोह करने के लिए अपने अन्य साथियों सहित भारत आ गए ।
रासबिहारी बोस तथा शचीन्द्रजी के साथ काम किया और फिर गिरफ्तार होकर
पहले फाँसी की सजा पाई जो अपील मे आजीवन कालापानी हो गई । अमेरिका में
ही एक दुर्घटनावश उनका बायाँ हाथ कट गया, इसीलिए वे 'टुण्डालाट' के नाम '
मे भी प्रसिद्ध थे । अभी कुछ दिन पूर्व बाबा हरनामसिंह का स्वर्गवास हुआ है ।
बाबाजी ने अपने लेख मे लिखा है, "....पंजाब और बंगाल मे क्रान्ति प्रारम्भ
करने के लिए 21 फरवरी सन् 1915 की तारीख निश्चित हुई थी । बाबू रास-
बिहारी बोस लाहौर मे पंजाब पार्टी का नेतृत्व कर रहे थे । सरकारी मुखबिर
कृपालसिंह ने इस बात की खबर पुलिस को दे दी थी ।
लाहौर के एक मकान मे कृपालसिंह को किसी काम के लिए लाहौर छावनी
के एक रिसाले मे भेजा गया । कुछ साथियों को कृपालसिंह पर सन्देह हो जाने के
कारण उसके पीछे एक लड़का उसकी निगरानी के लिए रवाना किया गया । इस
लड़के ने तुरन्त आकर खबर दी कि कृपालसिंह मकान से सीधा लाहौर स्टेशन की
खुफिया पुलिस के दफ्तर मे गया है। वहाँ रिपोर्ट देकर वह छावनी गया और
उसी मकान पर लौट आया । उसके वापस आने से पहले मैं भी उस मकान पर
पहुँच चुका था और उसकी जासूसी की बात सुन ली थी । जब वह लौटकर आया
हम तीन आदमी वहाँ मौजूद थे । वह जाकर बेफिक्री से एक कुर्सी पर बैठ गया ।
हम तीनों मे उसे क़त्ल कर देने के लिए इशारे होने लगे । मकान में कुछ बम
और दो-चार रिवाल्वर मौजूद थे, लेकिन उनके चलाने से बाज़ार में धड़ाके का
डर था । हमने उसे गले में फन्दा डालकर मार डालने का निश्चय किया । इस
काम के लिए सिर्फ एक ही हाथ होने की वजह से मैं पहल नहीं कर सकता था ।
दूसरे साथी लाला रामसरनदास शारीरिक रूप से कमज़ोर थे । उनका हाथ
डालना ठीक भी न था । हमने तीसरे साथी भाई अमरसिंह राजपूत को पहल
करने का इशारा किया और हम दोनों मदद को तैयार थे । अमरसिंह तेईस-
चौबीस वर्ष का हट्टा-कट्टा जवान था। लेकिन कृपालसिंह पर हाथ डालने का
साहस उसे न हुआ । हम अंग्रेजी मे बातचीत नही कर सकते थे, क्योंकि कृपाल-
सिंह भी थोड़ी-बहुत अंग्रेजी समझता था। हमारे इशारों से वह चौकन्ना हो गया
और मेरे हाथ तथा अमरसिंह के भय ने उसकी जान बचा दी...।"
"जब अमरसिंह को फाँसी सामने लटकती नज़र आई तो उसने पुलिस की
शरण ले सरकारी गवाह बनकर जान बचाने की कोशिश की । उसने अपने बयान
में अमेरिका के शुरू के काम से लेकर आखिर तक की सारी कहानी पुलिस को
सुना दी । अमरसिंह अमेरिका में पार्टी का सरगर्म मेम्बर था। गदर केस में वह
मेरे साथ ही काम करता था। हिन्दुस्तान लौटते समय उसने भी बाकी मेम्बरों
की तरह आजादी या मौत का प्रण किया था। इसके अतिरिक्त उसका चाल-
चलन भी वहाँ बहुत अच्छा था, लेकिन प्राणों के भय से उसने अपने साथियों को
मौत के मुंह में धकेलकर अपनी जान बचाने की सोची ।"

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करतारसिंह आदि की गिरफ्तारी
इस भेद के खुल जाने पर सरगरम साथियों ने कोई उपाय न देखकर जल्दी
से 21 फरवरी के बजाए, क्रान्ति के लिए, 19 फरवरी का दिन निश्चित कर
दिया। लेकिन पुलिस ने 18 फरवरी को ही लाहौर के दो-तीन मकानों से कुछ
आदमियों को गिरफ्तार कर लिया। बाबू रासबिहारी बोस के मकान का पता
मुखबिर को न था, इसलिए वे बच गए । 18 फरवरी को ही तमाम छावनियों
में हिन्दुस्तानी सिपाहियों की जगह गोरे सिपाहियों का पहरा हथियारखानो पर
लगा दिया गया और हमारी योजना बीच में ही रह गई। 19 फरवरी की रात को
ही बनारस का टिकट खरीदकर बाबू रासबिहारी को रेलगाड़ी पर सवार कराया
गया। पंजाबी कपड़े पहनकर वे बनारस पहुँचकर बच निकले। दूसरे दिन दो
साथियों करतारसिंह सराबां और जगतसिंह के साथ मैं लाहौर से चला गया।
हम तीनों ज्यों-ज्यों पेशावर पहुँचे। पेशावर से दस मील आगे निकलकर फिर
पीछे लौटने का निश्चय किया। फैसला यह किया कि कुछ हथियार इकट्ठे कर
अपने साथियों को लाहौर और अमृतसर की हवालातों से छुड़ाया जाए। हथियार
लेने के लिए हम लोग सरगोधा के सरकारी फार्म में गए और वहाँ के सिख
रिसालदार की मुखबिरी पर गिरफ्तार हो गए। ***गिरफ्तारी 28 मार्च सन् 1915
को हुई थी।
कृपालसिंह की हत्या
"मुखबिर कृपालसिंह उस समय तो बच गया किन्तु क्रान्तिकारी उनके पीछे
लगे ही रहे। वह इतनी सावधानी से रहता था कि उसको ठिकाने लगाना आसान
बात नहीं थी। फिर भी सन् 1931 में, जब एक दिन वह अपने घर पर सो रहा
था, कुछ लोगों ने उसे ठिकाने लगा दिया और आज तक यह पता नही लग सका
कि उसकी हत्या करनेवाले कौन थे।
गदर पार्टी का जन्म और अन्त
शचीन्द्र बाबू ने अपनी पुस्तक में अमेरिका की गदर पार्टी के सम्बन्ध में बहुत-
कुछ लिखा है। पंजाब में फ़ौजों को उभारने आदि का सम्पूर्ण कार्य गदर पार्टी के
ही सदस्यों ने किया था। इनमें से पचासों फाँसी पर चढ़ गए, सैकड़ों को काला
पानी हुआ और कुछ सरकार की आँखों में धूल झोंककर विदेशों को भी चले गए।
किन्तु फिर इसके पश्चात् गदर पार्टी का क्या हुआ ? क्या वह समाप्त हो गई ?
जैसाकि बहुत-से व्यक्ति समझते हैं। इस सम्बन्ध में वास्तविकता यह है कि गदर
पार्टी भारत की स्वाधीनता तक बराबर अमेरिका में और जहाँ भी उसके सदस्य
थे, कार्य करती रही। यह ठीक है कि प्रथम विश्वयुद्ध में उसके सैकड़ों-हज़ारों
सदस्य भारत में आकर अपनी जन्मभूमि की स्वाधीनता के लिए संघर्षरत हुए, किंतु

कुछ पूरक तथ्य / 377
फिर भी अमेरिका में उसका संगठन ज्यों-का-त्यों चलता रहा । अभी कुछ दिन
पूर्व अमेरिका की सरकार द्वारा नियुक्त एक समिति ने इस बात की जाँच की थी
कि अमेरिका की गदर पार्टी के कुछ सदस्य चूंकि रूम और साम्यवाद से सहानु-
भूति और सम्पर्क रखते हैं, अतः क्या वे अमेरिका में भी संकट उत्पन्न तो नहीं कर
सकते ? इस कमेटी की रिपोर्ट गोपनीय थी, किन्तु वह किसी प्रकार गदर पार्टी
के एक सदस्य के हाथ लग गई और स्वयं इन पंक्तियों के लेखक ने भी उसे देखा
और पढ़ा है । इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में एक बात तो यह बताई है कि गदर-
पार्टी की स्थापना सन् 1907 में लाहौर में हुई थी । अभी तक यही समझा जाता
रहा है कि लाला हरदयालजी ने नवम्बर, 1913 में अमेरिका के कैलीफोर्निया में
इसकी स्थापना की थी । इसके सम्बन्ध में एक प्रसिद्ध क्रान्तिकारी श्री खानखोजे,
जिन्होंने विदेशों में बहुत काम किया, इस प्रकार बताते हैं, "लगभग 1907 के
प्रारम्भ में अमेरिका के कैलीफोर्निया में जो भारतीय छात्र थे, उनमें खगेन्द्र चन्द्र-
दास, पाण्डुरंग खानखोजे, तारकनाथदास, अधरचन्द्र लसगर आदि ने भारतीय-
स्वाधीनता-संघ की स्थापना की ।...1908 में कैलीफोर्निया के संक्रामेंटों और
आरगिल स्टेटों के पोर्टलैंड नामक स्थान में संघ का केन्द्र स्थापित किया गया ।
...1913 में लाला हरदयाल और भाई परमानन्द कैलीफोर्निया आएँ । परमानन्द
दल में शामिल नहीं हुए पर हरदयाल शामिल हुए और उन्होंने सलाह दी कि दल
का नाम बदलकर 'गदरपार्टी' कर दिया जाय ।"
अमेरिका सरकार की समिति की रिपोर्ट में और इस प्रामाणिक बयान में
जो अन्तर है, उसका कारण यह प्रतीत होता है कि समिति को गदरपार्टी के किसी
पुराने सदस्य से ही यह ज्ञात हुआ होगा कि सन् 1907 में लाहौर के क्रान्तिकारियों
के बीच ही अमेरिका में इस प्रकार का एक संगठन बनाने का निश्चय हुआ होगा ।
यह स्मरणीय है कि सन् 1906-07 में पंजाब में क्रान्तिकारी बहुत ही सक्रिय थे ।
सरदार भगतसिंह के चाचा सरदार अजीतसिंह, ला० पिंडीदास, अम्बाप्रसाद सूफी
तथा अन्य अनेक हिन्दू, सिख, मुस्लिम क्रान्तिकारी अपने संगठन को दृढ़ करने में लगे
हुए थे । पंजाब की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह थी कि बंगाल की भाँति पंजाब में
क्रान्तिकारी आन्दोलन केवल मध्यमवर्ग तक ही सीमित नहीं था और न आतंकवाद
तक ही उसकी परिधि समाप्त हो जाती थी । इसके विपरीत सरदार अजीतसिंह
इत्यादि वहाँ किसानो का आन्दोलन चला रहे थे और हजारों किसान उनके प्रभाव
में आ चुके थे । सन् 1907 की पंजाब के क्रान्तिकारियों में से सरदार अजीतसिंह,
अम्बाप्रसाद सूफी, ठाकुरदास इत्यादि गोपनीय रूप से विदेश जाने में सफल हो गए ।
सम्भव है अमेरिका सरकार की समिति ने इसी आधार पर गदर पार्टी की स्थापना
का यह विवरण दिया है ।
समिति की रिपोर्ट यह भी बताती है कि 1917 तक तो गदर पार्टी का संग-
ठन सर्वथा अनौपचारिक था । रिपोर्ट के अनुसार विधिवत् संगठन 22 जनवरी,
1917 को हुआ । इससे लगभग दस महीने पूर्व अर्थात् 31 मार्च, 1916 को गदर

378 / बन्दी जीवन
पार्टी ने अपने आफिस आदि के लिए सानफ्रांसिस्को में दो प्लाट खरीदे और वहाँ
आफिस आदि के लिए इमारत बनवाई। समिति की रिपोर्ट के अनुसार पार्टी का
विधान सन् 1928 में बना और फिर वह भारत के स्वतन्त्र होने तक सरगर्मी के
साथ काम करती रही और उसके सदस्य बराबर एक देश से दूसरे देश तक दौड़-
धूप करते रहे। भारत की स्वतन्त्रता के पश्चात् गदर पार्टी ने अपनी सम्पूर्ण चल-
अचल सम्पत्ति भारत सरकार के अमेरिका स्थित प्रतिनिधि के सुपुर्द कर दी और
इस प्रकार भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इस अत्यन्त जुझारू संगठन ने अपने लक्ष्य
को प्राप्त करके स्वयं को भंग कर लिया।
मुस्लिम क्रान्तिकारी दल का इतिहास
'गदर पार्टी' की ही भाँति उस मुस्लिम क्रान्तिकारी दल पर भी कुछ प्रकाश
डालना आवश्यक है, जिससे दिल्ली में अपने सम्पर्क होने का उल्लेख शचीन्द्र बाबू
ने किया है। शचीन्द्र बाबू ने इस दल के उद्भव का समय और कारण सन् 1912
में होनेवाली बाल्कन वार और उसमें डा० अंसारी के नेतृत्व में जानेवाले भार-
तीय मुसलमानों के मैडिकल मिशन को बताया है। श्री शचीन्द्र के लेखानुसार
मैडिकल मिशन में जो भारतीय नौजवान गए थे, तुर्की की सरकार और जनता
ने उनका भारी सम्मान किया। इस राजकीय सम्मान ने उनका माथा गरम कर
दिया और उनमें से अनेक भारत आकर ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध सक्रिय हो गए।
कुछ अन्य महानुभावों ने भी इन मुस्लिम क्रान्तिकारियों के सम्बन्ध में कुछ इसी
प्रकार लिखा है। इसका कारण यह है कि सिडीसन कमेटी की रिपोर्ट में मुस्लिम
क्रान्तिकारी दल के उद्भव और विकास का इसी प्रकार उल्लेख किया गया है।
इसके विपरीत वास्तविकता यह है कि इस दल का इतिहास बहुत ही पुराना
और सम्भवतः उतना ही अद्भुत है। सन् 1720 अर्थात् गदर से भी लगभग एक
सौ सैंतीस वर्ष पहले दिल्ली में एक मुस्लिम सन्त हुए, जिनका नाम शाह वलीउल्ला
था। वे अत्यन्त उच्चकोटि के दार्शनिक, विद्वान् और तपस्वी व्यक्ति समझे जाते
थे और उनके परिवार की बहुत शानदार परम्परा थी। मुस्लिम दर्शन के अध्यापन
में वे निष्णात समझे जाते थे। अरबी और फारसी में उनके लिखे ग्रन्थ आज
भी अनेक मुस्लिम राष्ट्रों में पढ़ाए जाते हैं। भारत की तत्कालीन राजनीतिक
स्थिति बड़ी भयावह थी और अंग्रेज धीरे-धीरे भारत की राजनीति पर हावी होते
जा रहे थे। दिल्ली की मुस्लिम बादशाहत बहुत कमज़ोर हो चली थी। इस स्थिति
ने शाह वलीउल्ला को राजनीति की ओर खींच लिया और वे अपने अनुयायियों
को राजनीतिक शिक्षा देने लगे। भारत की हिन्दू-मुस्लिम समस्या और शासन-
नीति पर भी शाह वलीउल्ला ने भली प्रकार विचार किया था। जन-साधारण
की दिनों-दिन गिरती हुई आर्थिक स्थिति और शासकीय दल द्वारा जनता के
शोषण को देखकर वे तत्कालीन शासकों के विरोधी बन गए थे और इसके लिए
उन्होंने कष्ट भी उठाए थे। अपनी अरबी भाषा में लिखी एक प्रसिद्ध पुस्तक

कुछ पूरक तथ्य | 379
'हुज्जत-उल-बालिगा' में उन्होंने एक स्थान पर लिखा है, "यदि कोई जाति
सांस्कृतिक क्षेत्र में निरन्तर उन्नति करती रहे, तो उसका कला-कौशल श्रेष्ठता
की चरम सीमा को पहुँच जाता है। इसके पश्चात् यदि शासक वर्ग सुख और
विलास का जीवन व्यतीत करने लगता है तो उसका बोझ श्रमजीवी वर्ग पर इतना
बढ़ जाता है कि समाज का बहुसंख्यक भाग पशुओं-जैसा जीवन व्यतीत करने के
लिए विवश हो जाता है। ऐसी स्थिति में मानवता की सामूहिक संस्कृति नष्ट
हो जाती है और जब शक्ति के आधार पर उनको (श्रमजीवियों को) सामूहिक
संकट सहने के लिए विवश कर दिया जाता है, तो वे गधों और बैलों की भाँति केवल
पेट भरने के लिए श्रम करते हैं। जब मनुष्यता पर ऐसा संकट आता है, तो ईश्वर
मानवता को उससे मुक्ति दिलाने के लिए कोई-न-कोई मार्ग अवश्य खोल देता
है, यानी यह आवश्यक है कि ईश्वरीय शक्ति क्रान्ति के साधन उत्पन्न करके कौम
के सिर से ऐसे अवांछनीय शासन का बोझ उतार दे।"
"....तात्पर्य यह है कि मानव-समाज के सामूहिक जीवन के लिए आर्थिक
समानता अत्यन्त आवश्यक है। प्रत्येक मानव-समूह को एक ऐसी अर्थ-व्यवस्था
की आवश्यकता होती है, जो उसको जीवनोपयोगी वस्तुएँ देने के लिए ज़िम्मेदार
हो। जब मनुष्यो को अपनी आर्थिक आवश्यकताओं के प्रति सन्तोष होता है, तो
फिर वे अपने उस अवकाश के समय को, जो उनके पास जीविकोपार्जन से बच
जाता है, जीवन के अन्य भागों की उन्नति और सभ्यता तथा संस्कृति की दिशा में
लगाते हैं, जो मानवता के वास्तविक रूप हैं।"
भारत की हिन्दू-मुस्लिम जातियों के प्रति शासन की नीति की ओर संकेत
करते हुए शाह वलीउल्ला ने लिखा है, "राज्य की ओर से क़ानून एक प्रकार के
हों। उन क़ानूनों की पाबन्दी प्रत्येक जाति अपने-अपने आदर्शों के अनुसार करे।"
इसी प्रकार उन्होंने अपनी एक दूसरी पुस्तक में लिखा है कि भारत म छोटी-छोटी
प्रादेशिक सरकारें बन सकती हैं किन्तु उनका एक केन्द्र होना चाहिए, जो सम्पूर्ण
भारतवर्ष के हानि-लाभ को दृष्टि में रखकर नीति निर्धारित करे।
तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था और राजनीतिक स्थिति में यह विचार बहुत
ही मौलिक और क्रान्तिकारी थे, किन्तु कठिनाई यह थी कि उनका प्रचार केवल
मुसलमानों तक ही हुआ। उस समय अधिकांश शिक्षित व्यक्ति राजकीय सेवा में
थे, अथवा शिक्षण का कार्य करते थे। शेष व्यक्ति अनपढ़ और खेती के काम में
संलग्न थे। शाह वलीउल्ला एक मुस्लिम सन्त थे। अतः मुस्लिम जनता में ही
उनके विचारों का प्रचार प्रारम्भ हुआ। उनके शिष्यों में कुछ लोग इन विचारों
को कार्य रूप में परिणत करने के लिए अपना संगठन भी बनाने लगे। शाह
वलीउल्ला की मृत्यु के पश्चात उनके पुत्र शाह अब्दुल अजीज के समय इस संगठन
को अधिक मूर्त रूप मिला। धीरे-धीरे यह संगठन एक फ़ौजी संगठन-सा बन
गया। किन्तु इस फ़ौजी संगठन की पहली मुठभेड़ हुई, पंजाब के राजा रणजीत-
सिंह से, जो अंग्रेजों के हिमायती थे। शाह अब्दुल अजीज के एक शिष्य सय्यद-

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अहमद बरेलवी अपने कई हजार साथियों को साथ लेकर कराची के रास्ते
अफगानिस्तान पहुंचे और फिर वहां से पेशावर की सरहद पर आकर राजा
रणजीतसिंह की सेनाओं से मोर्चा लेने लगे । सरहद पार बसे हुए पठानों से उनको
भारी सहायता मिली । किन्तु सय्यद अहमद को सफलता नही मिली । सन् 1831
में सिख फ़ौजों से लड़ते हुए वे मारे गए । इसके पश्चात् उनके साथी वही बस गए
और समय-समय पर सदैव, 1947 तक, ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध छुटपुट लड़ाई
लड़ते रहे ।
भारत में सन् 1857 के विद्रोह के समय इस दल ने अंग्रेजों के विरुद्ध बड़ा
सक्रिय भाग लिया था । किन्तु विद्रोह असफल हो गया और इस दल के कुछ नेता
अंग्रेजों के दमन से बचने के लिए मक्का चले गए । फिर भी दल का संगठन बना
रहा और उन्होंने स्थान-स्थान पर छोटे-छोटे मदरसे क़ायम करके अपना प्रचार
कार्य प्रारम्भ कर दिया । इसी प्रकार का एक मदरसा सहारनपुर जिले के देवबन्द
स्थान पर क़ायम किया गया और उसके प्रधानाचार्य ऐसे महानुभाव बनाये गए,
जो ग़दर में सक्रिय भाग ले चुके थे । उधर पठान इलाकों में बसे हुए इस दल के
विद्रोही बार-बार अंग्रेज़ी सीमा पर आक्रमण करते रहे और भारत-भर से उनके
लिए धन-जन की सहायता जाती रही । सन् 1860, 1862, 1865 में इस अपराध
में बहुत-से मुसलमान पकड़े गए और उनको फांसी तथा कालेपानी का दंड मिला ।
इस मुस्लिम क्रान्तिकारी दल मे निस्सन्देह धार्मिक उन्माद था क्योंकि इसकी
प्रेरणा का स्रोत मुस्लिम दर्शन और परम्पराएं थी । किन्तु उनमें हिन्दुओ के
विरुद्ध द्वेष नहीं था । तत्कालीन राजनीति धर्म पर ही आश्रित थी । बंगाल के
क्रान्तिकारी जिस प्रकार गीता से मातृभूमि के लिए बलिदान हो जाने की प्रेरणा
पाते थे और महाराष्ट्र के चापेकर बन्धु गो-भक्षकों से देश को मुक्त करने का
नारा लगाते थे, उसी प्रकार यह मुस्लिम क्रान्तिकारी भी 'जिहाद' के प्रचारक
थे । यह लोग हिन्दुस्तान को 'दार-उल-हर्ब' मानते थे, जिसके अनुसार प्रत्येक
मुसलमान का यह धार्मिक कर्तव्य हो जाता है कि या तो वह शासन के विरुद्ध
विद्रोह करे या देश का परित्याग कर दे ।
प्रथम विश्वयुद्ध और मुस्लिम क्रान्तिकारी
सन् 1884 मे मदरसा देवबन्द के प्रधान आचार्य शेख महमूदउलहसन बनाये
गए, जो 1857 के विद्रोह मे भाग लेने वाले श्री रसीद अहमद गंगोही के शिष्य
थे । इस समय देवबन्द का मदरसा इस्लाम के दर्शन की शिक्षा के लिए अन्तर्राष्ट्रीय
ख्याति प्राप्त कर चुका था और दूसरे मुस्लिम राष्ट्रों के बहुत-से युवक भी
देवबन्द में शिक्षा प्राप्त करने के लिए आने लगे थे । इन विदेशों से आनेवाले
विद्यार्थियों में अफ़गानिस्तान के विद्यार्थियों की संख्या अधिक होती थी । सरहद
पार बसे हुए पठान कबीलों के भी अनेक युवक देवबन्द में शिक्षा पाते थे । इन
अफगान और पठान युवकों के द्वारा शेख महमूदउलहसन ने अपने क्रान्तिकारी

कुछ पूरक तथ्य / 381
दल का प्रचार काबुल और आजाद कबीलो में किया। सरहद का एक प्रभावशाली
विद्वान् मोलवी तुरंग जई का हाजी इनका सहायक बना। एक दूसरा नव मुस्लिम
उबेदुल्ला सिन्धी, जिसने इस मदरसे से ही शिक्षा पाई थी, शेख महमूदउलहसन
का इस कार्य मे दाहिना हाथ था। उस समय इन मुस्लिम क्रान्तिकारियों को
अफगानिस्तान और सरहद पार बसे हुए आज़ाद पठान कबीले ही ऐसी सैनिक
शक्ति दिखाई देते थे जिनकी सहायता से वे अग्रेजो से भारत को मुक्त कर सकते
थे। मौलाना उबैदुल्ला सिन्धी ने अपनी एक पुस्तक मे लिखा है कि मदरसा
देवबन्द का एक गोपनीय नियम यह भी था कि वह अफगानिस्तान की सरकार
मे अपना प्रभाव उत्पन्न करे। इसलिए सिन्धु नदी के उस पार से आने वाले
विद्यार्थियो को यह शिक्षा दी जाती थी कि वे अपने कबीलो मे जाकर उनके
सगठन और व्यवस्था मे कोई हेर-फेर न करे और यदि वहाँ कोई ऐसी रूढि
तथा परम्परा हो, जो धर्म की दृष्टि से उचित न हो, तो उसके विरुद्ध होने वाले
आन्दोलनो मे भाग न ले।
अफ़गानिस्तान की स्थिति
मुस्लिम क्रान्तिकारी दल की हलचलो और कार्य-नीति को समझने के लिए
अफगानिस्तान की तत्कालीन स्थिति को भी सक्षेप मे समझ लेना आवश्यक है।
आधुनिक अफगानिस्तान के पिता अमीर अब्दुर्रहमान थे, जिन्होने सबसे पहले
अफगानिस्तान मे एक दृढ केन्द्रीय सरकार की स्थापना की। अमीर अब्दुर्रहमान
सन् 1880 मे अग्रेजो की सहायता से काबुल की गद्दी पर बैठे थे किन्तु मन ही
मन वे अंग्रेजो से सशकित रहते थे। अंग्रेज राजदूत को काबुल मे रखने से उन्होने
यह कहकर इन्कार कर दिया था कि उसकी रक्षा की जिम्मेदारी लेने मे वे असमर्थ
हैं। अंग्रेजों ने उनसे यह इकरार करा लिया था कि काबुल की वैदेशिक नीति का
निर्धारण सदैव ब्रिटिश सरकार करेगी। अमीर अब्दुर्रहमान के एक सहयोगी
मुस्तफा फ़हमी साहब थे, जो उस समय भी अब्दुर्रहमान के साथ थे। जब वे रूस
मे निर्वासन का जीवन व्यतीत कर रहे थे। अफगानिस्तान का सम्पूर्ण राज-काज
फ़हमी साहब के परामर्श से ही चलता था। अमीर अब्दुर्रहमान ने अपनी सैनिक
शक्ति अत्यन्त दृढ कर ली थी।
'जमायते सियासिया'
सन् 1882 मे मुस्तफा फ़हमी साहब ने काबुल मे 'जमायते सियासिया' नामक
एक सगठन बनाया और स्वय इस संगठन के प्रधान मंत्री बने। साधारण जनता
में राजनीतिक जागृति उत्पन्न करना इस सगठन का उद्देश्य था। अमीर अब्दु-
र्रहमान इस संगठन के सहायक और समर्थक थे और उनके सबसे बड़े पुत्र हबी-
बुल्ला खां भी, जो अपने पिता के समय से ही राज-काज में भाग लेने लगे थे,
'जमायते सियासिया' को बहुत महत्त्व देते थे। यह तथ्य उल्लेखनीय है कि

382 / बन्दी जीवन
'जमायते सियासिया' के अन्य कार्यकर्ता वे लोग रहे थे, जो मदरसा देवबन्द में
तालीम पा चुके थे।
'जमायते सियासिया' ने सबसे पहले यह माँग रक्खी कि काबुल की वैदेशिक
नीति से अंग्रेजों का नियन्त्रण उठा लिया जाय। सन् 1898 मे अमीर अब्दुर्रहमान
खां के द्वितीय पुत्र नसरुल्ला खां लन्दन गए और उन्होंने ब्रिटिश सरकार के सम्मुख
यह मांग बड़े जोरदार ढंग से पेश की। उनकी यह माग ब्रिटिश सरकार ने अस्वी-
कार कर दी । इसके पश्चात् 1 अक्तूबर, 1901 को अब्दुर्रहमान खां का देहान्त
हो गया और हबीबुल्ला खां अफगानिस्तान के अमीर बने । सन् 1907 तक हबी-
बुल्ला खां बराबर जमायते सियासिया के सहायक रहे और अंग्रेजो से काबुल की
वैदेशिक नीति पर से अपना नियन्त्रण हटा लेने का आग्रह करते रहे, जिस पर
अंग्रेजों ने कोई ध्यान नही दिया ।
सन् 1905 मे बंग-भंग आन्दोलन प्रारम्भ हुआ और इसी के आसपास पंजाब
मे किसानों का सरगर्म आन्दोलन फूट पड़ा, जिसने गदर पार्टी को जन्म दिया।
अब अंग्रेजो को यह फिक्र हुई कि काबुल के अमीर को सन्तुष्ट किया जाय।
परिणामस्वरूप अमीर हबीबुल्ला खां को सन् 1907 मे भारत बुलाया गया। तत्का-
लीन लार्ड मिण्टो से अमीर की लम्बी-लम्बी मुलाकाते हुई और उन मुलाकातो
का परिणाम यह हुआ कि अफगानिस्तान वापस पहुंचते ही अमीर ने जमायते
सियासिया का विरोध करना प्रारम्भ कर दिया। उस समय तक मुस्तफा फहमी
की मृत्यु हो चुकी थी और उनके पुत्र अली फहमी जमायत के मन्त्रि-पद पर थे।
अली फहमी और उनके दो सहायको को अमीर ने गिरफ्तार करके निर्वासित कर
दिया। बहुत दिनों तक ये लोग अन्य मुस्लिम राष्ट्रों में पड़े रहे। इसके पश्चात्
अमीर के छोटे भाई और तत्कालीन प्रधानमन्त्री नसरुल्ला खां ने, जो जमायते
सियासिया से हमदर्दी रखते थे, बड़ी कठिनाई से उनको काबुल आने की आज्ञा
दिलवाई। वापस आते ही उन लोगों ने जमायते सियासिया का गुप्त संगठन
प्रारम्भ कर दिया और इस प्रकार जमायते सियासिया एक अंग्रेज विरोधी गोप-
नीय क्रान्तिकारी संगठन के रूप मे परिवर्तित हो गई।
सरहदी क़बीले
देवबन्द के क्रान्तिकारी आचार्य महमूदउलहसन का इन सभी घटनाओ से
बराबर सम्पर्क रहा। उनके अनेक शिष्य और सहपाठी इस संगठन के कर्ता-धर्ता
थे। सरहद के आज़ाद क़बीलो मे मदरसा देवबन्द के क्रान्तिकारियों का वह संगठन
मौजूद था, जो सन् 1825 मे भारत से हिजरत कर गया था। उन विद्रोहियों की
नई पीढ़ी ने भी इसी पथ को अपना लिया था। इसी समय तुरंगजई के हाजी ने
धार्मिक मदरसों के रूप मे पठान इलाके के अनेक स्थानो मे अपने संगठन का जाल
बिछाना शुरू किया। खान अब्दुलगफ्फार खां, जो बाद को कांग्रेस के बहुत बड़े
नेता हुए और 'सरहदी गांधी' कहलाए, हाजी तुरंगजई के प्रधान शिष्य के रूप में

कुछ पूरक तथ्य / 383
इस काम मे हाथ बँटा रहे थे। खान अब्दुलगफ्फारखा ने एक बार मौलाना हुसैन
अहमद मदनी को बताया था कि इस जमाने मे, अर्थात् 1910-11 मे अनेक बार
मुझे गोपनीय सन्देशो को लेकर हाजी तुरगजई देवबन्द भेजते थे। आशय यह कि
जिस इटली-तुर्की युद्ध मे मैडिकल मिशन गया, उससे बहुत पहले ही मुस्लिम
क्रान्तिकारी दल का सगठन भारत से काबुल तक फैल चुका था। यह भी उल्लेख-
नीय है कि जो मैडिकल मिशन तुर्की गया था, उसका नेतृत्व डा० मुख्तार अहमद
अन्सारी ने किया था, जो बाद मे काग्रेस के प्रमुख नेता बने। डा० अन्सारी साहब
भी शेख महमूद उलहसन के निकट सम्पर्क मे थे। और उनको पूजनीय दृष्टि से
देखते थे। सन् 1914-15 मे शेख महमूदउलहसन जब मक्का गए और उनकी
क्रान्तिकारी हलचलो का पता अग्रेज सरकार को लगा तो डा० अन्सारी साहब से
तत्कालीन अगरेज अधिकारियो ने काफी पूछताछ की थी। एक बार तो डाक्टर
अन्सारी साहब की गिरफ्तारी की सम्भावना भी उत्पन्न हो गई थी। इस प्रकार
वास्तविकता यह प्रतीत होती है कि यह मैडिकल मिशन देवबन्द के क्रान्तिकारी
दल ने ही तुर्की की सरकार से सम्बन्ध स्थापित करने के लिए भेजा था। इस
मिशन मे सरहद के कुछ शिक्षित पठान युवक भी थे, जिनमे से कुछ भारत वापस
नही लौटे और आजीवन विदेशो मे भारतीय स्वाधीनता के लिए कार्य करते रहे।
इन युवको मे अब्दुर्रहमान बेग का नाम उल्लेखनीय है, जिनके सम्बन्ध मे यह समझा
जाता है कि अग्रेजो के इशारे पर उनकी हत्या कर दी गई। उनके एक भाई
बहुत दिनो तक खान अब्दुलगफ्फार खा के प्राइवेट सैक्रेटरी रहे और अब भारत
के वैदेशिक विभाग मे किसी सम्माननीय पद पर है।

मौलाना उबेदुल्ला सिन्धी

शचीन्द्र बाबू जब दिल्ली मे क्रान्तिकारी कार्यों मे सलग्न थे, उन दिनो ही
दिल्ली मे यह मुस्लिम क्रान्तिकारी दल भी अत्यन्त सक्रिय था। दिल्ली का महत्त्व
समझते हुए सन् 1913 मे ही मौलाना महमूदउलहसन ने एक मदरसा दिल्ली मे
भी कायम कर दिया था, जिसका नाम नजारतुल मआरिफ था। मौलाना उबेदुल्ला
सिन्धी उनके प्रधान आचार्य थे। डा० अन्सारी और हकीम अजमल खा इसके
सहायको मे थे। इसमे पहले मौलाना सिन्धी ने देवबन्द मे 'जमय्यत-उल-अन्सार'
नामक संस्था बनाई थी, जिसका उद्देश्य क्रान्तिकारी सगठन के प्रचार के हेतु एक
प्रकट सगठन बनाना था, किन्तु यह संस्था पारस्परिक मतभेदो के कारण शीघ्र
ही भंग कर दी गई। इसी बीच अलीगढ की मुस्लिम यूनिवर्सिटी से विद्यार्थियो का
एक दल देवबन्द मे तालीम पाने के लिए भेजा गया। इस दल मे अनीस अहमद
नामक विद्यार्थी अग्रेजो का जासूस था। मौलाना महमूदउलहसन और उबेदुल्ला
सिन्धी बडी सतर्कता से अपना कार्य कर रहे थे, अत. अग्रेज़ों को केवल देवबन्द
आने-जानेवाले व्यक्तियो का पता ही अनीस अहमद द्वारा लगता रहा। बाद में
अनीस अहमद सी० आई० डी० विभाग मे बहुत ऊँचे पद पर पहुँचा और विदेशी

384 / बन्दी जीवन
सरकार की सहायता का उसे पर्याप्त पुरस्कार मिला। कहा जाता है कि अनीस
अहमद द्वारा सरकार को भेजी गई रिपोर्टें सिडीसन कमेटी के सम्मुख भी प्रस्तुत
की गई थीं और सिडीसन कमेटी की रिपोर्ट का सिल्क लैटर कान्सप्रेसी (रेशमी
पत्रों का षड्यन्त्र) शीर्षक परिच्छेद में इन रिपोर्टों से बहुत सहायता ली गई है।
काबुल में आजाद हिन्द सरकार
प्रथम विश्वयुद्ध की घोषणा होने के पश्चात् गदर पार्टी और बंगाल के
क्रान्तिकारी दलों की ही भाँति मुस्लिम क्रान्तिकारी दल ने स्वतंत्रता संग्राम की
एक योजना बनाई। इस योजना के अनुसार मौलाना उबैदुल्ला सिन्धी को काबुल
भेजा गया। उबैदुल्ला साहब ने लिखा है कि एक दिन उस्ताद (मौलाना महमूद-
उलहसन) अकस्मात् बोले, 'उबैदुल्ला ! काबुल जाओ।' मैंने पूछा, 'क्यों ?'
इस पर उस्ताद कुछ रंजीदा से होकर चुप हो गए। दूसरे दिन भी ऐसा ही हुआ।
उस्ताद ने कहा, 'उबैदुल्ला । काबुल जाओ।' उन्होंने पूछा, क्यों ? और उस्ताद
फिर चुप। तीसरे दिन उस्ताद ने जब फिर काबुल जाने की बात कही, तो उबै-
दुल्ला साहब ने उत्तर दिया, 'बहुत अच्छा,' और काबुल जाने की तैयारी शुरू कर
दी। उबैदुल्ला साहब के पास कुछ रुपया-पैसा था नहीं, अतः अपने एक शिष्य,
शेख अब्दुर्रहीम ने जो आचार्य कृपलानी के सगे बड़े भाई थे और मुसलमान होकर
इस क्रान्तिकारी कार्य में उबैदुल्ला के प्रमुख सहायक बन गए थे, अपनी लड़की
और बीबी का जेवर बेचकर रुपया जुटाया। 15 अक्तूबर, 1915 को उबैदुल्ला
काबुल पहुंचे, तो उनके पास केवल एक पौंड था। भारत से काबुल वे सिन्ध के
रास्ते से गए थे और इस यात्रा में लगभग दो मास उनको लगे थे। उबैदुल्ला
साहब के दो भतीजे भी उनके साथ थे। मौलाना महमूद उलहसन इतने अच्छे
संगठनकर्ता थे कि उबैदुल्ला के लेखानुसार काबुल के अनेक प्रतिष्ठित राज्या-
धिकारियों को यह मालूम था कि वे किस काम के लिए भारत से भेजे गए हैं।
'जमायते सियासिया', का संगठन जिसकी चर्चा हम ऊपर कर आए हैं, उनकी
मदद के लिए तैयार था। इस योजना में धोखा केवल यह हुआ कि अफगानिस्तान
के अमीर हबीबुल्ला खां अन्दर ही अन्दर अंग्रेज़ो से मिल चुके थे। उबैदुल्ला
साहब तो इस आशा से भेजे गए थे कि अमीर उनकी पूरी तरह सहायता करेंगे।
इसी आशा से एक 'एंग्लो-जर्मन-टर्किश' मिशन भी इन दिनों ही काबुल पहुंचा।
इस मिशन में राजा महेन्द्रप्रताप, मौलवी बर्कतुल्ला आदि कुछ भारतीय, कुछ जर्मन
और कुछ तुर्की के लोग थे। यह बात याद रखनी चाहिए कि मोलवी बर्कतुल्ला
गदर पार्टी के सदस्य थे और इस मिशन को टर्की तथा जर्मन सरकार की ओर से
काबुल के साथ मिलकर भारत पर आक्रमण करने की योजना बनाने का अधिकार
दिया गया था। मौलाना उबैदुल्ला और उनके साथी या तो पूर्व योजना के अनुसार
या वहीं की स्थिति के अनुसार इस मिशन के साथ मिलकर कार्य करने लगे। कहा
जाता है कि जर्मन और टर्की सरकार से अमीर हबीबुल्ला खां को इस अवसर पर

कुछ पूरक तथ्य / 385
सहयोग देने के लिए पर्याप्त धन भी दिया गया। परिणामस्वरूप काबुल में
अस्थायी आजाद हिन्द सरकार बनी, जिसके अध्यक्ष राजा महेन्द्रप्रताप, प्रधान
मंत्री मोलबी बर्कतुल्ला और उबेदुल्ला सिन्धी होम मिनिस्टर बनाये गए। इसी
समय लाहौर के कुछ मुसलमान विद्यार्थी इसी उद्देश्य से काबुल जा पहुंचे। इन
विद्यार्थियों को अस्थायी आजाद हिन्द सरकार में विभिन्न पद दिए गए। इन
विद्यार्थियों में से ही एक सज्जन जफ़रुलहसन उस समय (सन् 1919 में) जनरल
नादिर खां के प्राइवेट सेक्रेट्री थे, जब उन्होंने अफगानिस्तान सरकार की ओर से
भारत पर आक्रमण किया था और जिसके फलस्वरूप होने वाली सन्धि में काबुल
की वैदेशिक नीति पर से अंग्रेजों का नियंत्रण समाप्त हो गया था।
अमीर हबीबुल्ला खां का विश्वासघात
अमीर हबीबुल्ला खां ने वायदा किया था कि अस्थायी आजाद हिन्द सरकार
द्वारा भारत पर आक्रमण करने के साथ ही वे भी भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध की
घोषणा कर देंगे । किन्तु यह सब उनका छल था। उबेदुल्ला साहब के कथना-
नुसार भारतीय क्रान्तिकारियों के साथ मिलकर वे जितनी योजनाएं बनाते थे,
उन सबकी सूचनाएं अंग्रेज सरकार को भेजते रहते थे । अमीर के छोटे भाई नस-
रुल्ला खां और उनके लड़के अमानुल्ला खां तथा जमायते सियासिया के नेता
अवश्य हृदय से इनके साथ थे। काबुल के कमाण्डर इनचीफ जनरल नादिर खां की
सहानुभूति इनके साथ थी। इसी का यह नतीजा था कि अमीर हबीबुल्ला इनको
गिरफ्तार करने या इनका खुला विरोध करने का साहस नहीं कर सकते थे ।
टर्की सरकार से सम्पर्क
उबेदुल्ला काबुल में जब अस्थायी आजाद हिन्द सरकार का काम चला रहे
थे उस समय मौलाना महमूद उलहसन मक्का पहुंचकर टर्की सरकार से साजबाज
कर रहे थे। इसमे उनको बहुत कुछ सफलता भी मिली थी। उनको हेजाज के
तत्कालीन गवर्नर गालिबपाशा से एक पत्र प्राप्त हो गया, जिसका उल्लेख सिडीसन
कमेटी की रिपोर्ट में 'गालिबनामा' के नाम से किया गया है। गालिबपाशा का
यह पत्र संसार-भर के मुसलमानों के नाम था जिसमें उनको अंग्रेजों के विरुद्ध
हथियार उठाने के लिए उभारा गया था और मौलाना महमूद उलहसन को अपना
विश्वासपात्र बताते हुए उनके कार्य में धन-जन से सहायता करने की अपील की
गई थी। इस खत को मौलाना के एक साथी मुहम्मद मियां मन्सूर अंसारी मक्का
से हिन्दुस्तान लाए और उसकी नकलें हिन्दुस्तान व सरहदी कबीलों में बांटते हुए
काबुल जाकर उबेदुल्ला से जा मिले। इसी बीच मौलाना महमूद उलहसन को
रुपए की आवश्यकता हुई, तो हिन्दुस्तान से मौलाना मसूद नामक सज्जन कुछ
रुपया लेकर मक्का पहुंचे। मौलाना महमूद उलहसन उस समय मदीना चले गए
थे, अतः

386 / बन्दी जीवन
लोगों पर कड़ी नज़र रख रही थी और उसको कुछ सूचनाएं मिल रही थीं, अतः
मौलाना मसूद बम्बई में गिरफ्तार कर लिये गए। पुलिस ने उनको इतना सताया
कि वे बहुत-सी बातें उगल गए। उधर मक्का का हाकिम शरीफ हुसैन तुर्की सरकार
से विद्रोह करके अंग्रेज़ों से मिल गया। अंग्रेज़ों ने तुरन्त उसके द्वारा मौलाना महमूद
उलहसन और उनके साथियों को गिरफ्तार करवा लिया। युद्ध की समाप्ति तक
यह सभी लोग माल्टा में नजरबन्द रखे गए। इसके पश्चात् मौलाना महमूद उल-
हसन ने अनुभव किया कि गोपनीय कार्यों द्वारा राज्य क्रान्ति असम्भव है, अतः वे
कांग्रेस में सम्मिलित हो गए। इसी के अनुसार खान अब्दुलगफ्फार खां भी कांग्रेस
में आ गए। मुस्लिम विद्वानो की प्रमुख धार्मिक संस्था जमय्यत उल उलेमा जो
सदैव मुस्लिम लीग का विरोध करती रही और कांग्रेस के साथ रही, मौलाना
महमूद उल हसन के अनुयायियों द्वारा स्थापित हुई। प्रसिद्ध राष्ट्रीय मुस्लिम
शिक्षण संस्था जामिया मिल्लिया इस्लामिया की नीव भी मौलाना महमूद उल-
हसन ने ही रखी थी। मौलाना महमूद उलहसन का देहावसान 30 नवम्बर, 1920
को डा० अंसारी की कोठी पर दिल्ली म हुआ।
आज़ाद हिन्द सरकार के मिशन
काबुल की अस्थायी आजाद हिन्द सरकार उधर अपने काम मे लगी रही।
उसकी ओर से रूस सरकार के पास एक मिशन भेजा गया, जिससे उसका सहयोग
आजाद हिन्द सरकार को मिल सके। रूस के ज़ार के नाम जो पत्र भेजा गया था,
वह एक सोने की प्लेट पर था, जिसे गदर पार्टी के एक सदस्य डा० मथुरासिंह और
खुशीमुहम्मद लेकर गए थे। इस समय रूस के ज़ार की सरकार अंग्रेजो की सह-
योगी थी, अतः उसने मिशन को गिरफ्तार कर लिया, किन्तु ताशकन्द के गवर्नर
के हस्तक्षेप करने पर इन दोनों सदस्यों को वापस काबुल भेज दिया गया।
कुछ दिन पश्चात् आज़ाद हिन्द सरकार की ओर से फिर एक मिशन जापान
को और दूसरी टर्की भेजा गया। जापान जानेवाले मिशन में शेख अब्दुलक़ादिर
और डा० मथुरासिंह थे। और टर्की जानेवाले मिशन में अब्दुलबारी तथा डा०
शुजाउल्ला थे। ये दोनों ही मिशन गिरफ्तार करके अंग्रेज़ों के सुपुर्द कर दिये गए।
अंग्रेज़ इन चारों क्रान्तिकारियों को भारत ले आए। इन क्रान्तिकारियों में एक
अब्दुलबारी सर मुहम्मद शफी के रिश्तेदार थे। सरकार ने सर मुहम्मद शफी के
द्वारा इन लोगों पर यह जोर डलवाया कि अगर वे तमाम रहस्य लिखित रूप में
सरकार को प्रकट कर दें, तो उनको क्षमा प्रदान की जा सकती है। डा० मथुरा-
सिंह ने इसे अस्वीकार कर दिया तो वे 27 मार्च, 1917 को लाहौर जेल में फांसी
पर चढ़ा दिये गए। शेष व्यक्तियों ने सरकार की शर्त स्वीकार कर ली और सभी
विवरण अंग्रेज़ अधिकारियों को लिखकर दे दिया। सरकार ने इनको न केवल
क्षमा प्रदान की बल्कि इस देश-द्रोह के पुरस्कार में उनको उच्च पद पर नौकरियाँ
भी दे दीं।

कुछ पूरक तथ्य / 387
रेशमी पत्र
मुस्लिम क्रान्तिकारी दल के सम्बन्ध मे अब केवल उन 'रेशमी पत्रों' की बात
कहनी शेष रह जाती है, जिनके नाम से सिडीसन कमेटी ने इस संगठन की अपनी
रिपोर्ट में चर्चा की है। रिपोर्ट में कहा गया है, कि अगस्त सन् 1916 में यह षड्यन्त्र
उद्घाटित हुआ, जो सरकारी कागजात में 'सिल्क लैटर्स केस' कहा गया है। यह
पत्र पीले रेशमी कपड़ों पर बहुत साफ और सुन्दर अक्षरों मे लिखे गए थे। इनके
साथ मौलाना महमूद उलहसन के नाम मुहम्मद मियाँ अंसारी का भी एक पत्र
था, जिसमे उन्होने अपनी कारगुजारियों का पूरा विवरण दिया था। आजाद हिन्द
सरकार के खतों में, मरकार के संगठन की संपूर्ण म्थिति और उसके पदाधिकारिगियों
के नाम थे। इसके अतिरिक्त एक 'ईश्वरीय सेना' बनाने की योजना थी, जिसमे
भारतीय मुस्लिम नौजवान भरती किये जाने थे। मौलाना महमूद उलहसन उमके
प्रधान सेनापति नियुक्त किये गए थे।
मौलवी उबेदुल्ला साहब ने यह 'रेशमी पत्र' अब्दुलहक नामक व्यक्ति को
दिये थे कि वह इनको शेख अब्दुर्रहीम (आचार्य कृपलानी के बड़े भाई) तक पहुँचा
दे । यह अब्दुलहक साहब एक नव मुस्लिम थे और जिहाद के जोश मे लाहौर
से भागकर काबुल पहुँचे थे। उन्होंने भारत आकर यह पत्र अपने एक मित्र हक-
नवाज खा को दे दिए और हकनवाज खां ने इन पत्रो को अपने पिता खानबहा-
दुर अल्लाहवाज खा के सुपुर्द कर दिया। राजभक्ति के जोश मे अल्लाहवाज खां
इन खतों को पंजाब के गवर्नर सरमाईकेल ओडायर के पास ले गए और इस प्रकार
सरकार को यह सम्पूर्ण योजना ज्ञात हो गई। इसके पश्चात शेख अब्दुर्रहीम भाग-
कर टर्की पहुँच गए और बहुत दिनों तक भारतीय स्वाधीनता के निग कार्य कग्ने
हुए वही उनका देहान्त हो गया ।
आजाद हिन्द सरकार द्वाग भारत पर आक्रमण
काबुल की आज़ाद हिन्द मरकार ने इमके बाद भारत पर आक्रमण कग्ने की
योजना बनाई और सरहद के आज़ाद कबीलों मे से इमके लिए लगभग छः हजार
सैनिक एकत्रित किए। जर्मनी और टर्की की मरकार का भी इस आक्रमण-योजना
की सूचना दी गई और बताया तो यह जाता है कि जर्मन सैनिकों की एक टुकड़ी
भी इनकी सहायता को काबुल भेजी गई। किन्तु जब आजाद हिन्द सरकार के छः
हजार सैनिक सरहद पर अंग्रेज सरकार से मोर्चा जमाये हुए थे, तभी फ्रांस के
रणक्षेत्र में जर्मनी का पतन हो गया और उसे सन्धि के लिए विवश होना पड़ा।
अंग्रेजों के हाथ इससे बहुत मजबूत हो गए और आजाद हिन्द मरकार के सैनिकों
की स्थिति बहुत कमज़ोर हो गई। इन सैनिकों में से बहुत-से व्यक्ति गोलियों से
मारे गए। कुछ पकड़कर फांसी पर चढ़ा दिये गए और कुछ विदेशों में ही भटक
भटककर मर गए। इसके बाद आज़ाद हिन्द सरकार और फ़ौज तोड़ दी गई और

388 / बन्दी जीवन
यह विराट् प्रयास सहस्रों देशभक्तों, की आहुतियों की कहानी मात्र बनकर समाप्त
हो गया ।
हबीबुल्ला खां की हत्या
क़ाबुल में भारतीय क्रान्तिकारियों की इस असफलता का मुख्य कारण
मौलाना उबेदुल्ला सिन्धी ने तत्कालीन अमीर हबीबुल्ला खां को बताया है । डा०
भूपेन्द्रनाथ दत्त आदि क्रान्तिकारियों ने जो उस समय बर्लिन में काम कर रहे थे,
इसका कारण यह बताया कि जर्मनों ने अमीर को जितनी सहायता करने का
आश्वासन दिया था, वह पूरा नहीं हुआ । किन्तु हमें मौलाना उबेदुल्ला की बात
अधिक प्रामाणिक जान पड़ती है । इन सब घटनाओं के कुछ ही दिन पश्चात्
'जमायते सियासिया' के एक सदस्य द्वारा अमीर हबीबुल्ला की राजनीतिक हत्या
भी इस बात को प्रमाणित करती है कि अमीर अंग्रेजों से मिले हुए थे ।
अफ़गानिस्तान का भारत पर आक्रमण
काबुल के अंग्रेज-अमीर विरोधी राजनीतिक संगठन में भारत से गये हुए
मुस्लिम क्रान्तिकारियों का भारी प्रभाव था, यह तो स्पष्ट ही है । अमीर हबीबुल्ला
के छोटे भाई नसरुल्ला खां और पुत्र अमानुल्ला खां भी अमीर के विरोधी थे । यह
इसी से प्रकट है कि काबुल की आजाद हिन्द सरकार के भंग होने के पश्चात् उसके
जो सदस्य काबुल सरकार द्वारा गिरफ्तार कर लिये गए या निर्वासित कर दिये
गए, अमीर की हत्या के पश्चात् वे सभी न केवल मुक्त हो गए, बल्कि उनमें से
अनेक को उच्च सरकारी पद भी दिये गए । सम्भवतः अमीर की हत्या की योजना
में भारतीय क्रान्तिकारियों का भी हाथ था ।
अमीर हबीबुल्ला खां की हत्या के संदेह में जनरल नादिर खां भी गिरफ्तार
किये गए थे, जो उस समय अफगानिस्तान की सेना के उप-सेनापति थे । मौलाना
उबेदुल्ला सिन्धी के जनरल नादिर खां से बहुत अच्छे सम्बन्ध थे किन्तु वे प्रकट
रूप से जनरल नादिर खां से बहुत कम मिलते थे । अमीर हबीबुल्ला खां के पश्चात्
जब उनके पुत्र अमानुल्ला खां गद्दी पर बैठे, तो जनरल नादिर खां को रिहा कर
दिया गया और उनके एक भाई हाशिम खान को एक उच्च सरकारी पद पर
प्रतिष्ठित कर दिया गया ।
भारत की आज़ाद हिन्द सरकार के प्रधान राजा महेन्द्रप्रताप अमानुल्ला खां
के प्रगाढ़ मित्र थे । मौलवी उबेदुल्ला सिन्धी को भी अमानुल्ला खां बहुत मानते
थे । उधर जनरल नादिर खां के प्राइवेट सेक्रेटरी मौलाना जफर हुसैन थे, जो
आज़ाद हिन्द सरकार के एक महत्त्वपूर्ण पद पर थे । इस पृष्ठभूमि में जब हम
गद्दी पर बैठते ही अमानुल्ला खां को भारत पर चढ़ाई करते देखते हैं और साथ
ही सरहद पर बसे हुए आजाद कबीलों और तुरंगजई के हाजी साहब को इस युद्ध

कुछ पूरक तथ्य / 389
में अफ़गानिस्तान की मदद करते हुए पाते हैं, तो हम समझ सकते हैं कि काबुल-
स्थित भारत के क्रान्तिकारी अभी तक अपने कार्य मे लगे हुए थे और इस आक्र-
मण की योजना में उनका महत्त्वपूर्ण हाथ था।
सन्धि
इस अवसर पर अंग्रेजो ने भारी कूटनीतिज्ञता दिखाई और अफगानिस्तान
सरकार की महत्त्वपूर्ण शर्तें स्वीकार करके समझौता कर लिया। इस आक्रमण के
समय अफ़गान फ़ौजों की कमान स्वयं जनरल नादिर खां कर रहे थे। यह आक्रमण
29 मई सन् 1919 को हुआ और 8 अगस्त, 1919 को अंग्रेजो की अफ़गानिस्तान
से सन्धि हो गई। इस सन्धि के सम्बन्ध मे ब्रिटेन के राजनीतिज्ञ आर्नल्ड टायनबी
ने कहा था, “अमीर ने अपनी पराजय के पुरस्कार मे, जो कुछ वह चाहता था,
पा लिया और भारत सरकार को अफ़गानिस्तान की परराष्ट्र नीति पर से, जिस
पर उसका चालीस वर्ष से अधिकार था, अपना हाथ हटाना पडा।” अंग्रेजो ने
अपनी ओर से इस सन्धि के समय एक यह शर्त भी अफगानिस्तान से स्वीकार
करा ली थी कि मौलवी उबेदुल्ला आदि को काबुल मे राजनीतिक कार्य नही करने
दिया जायगा। इस प्रतिबन्ध से विवश मौलवी उबेदुल्ला काबुल मे सभी प्रकार की
सुविधाएं होते हुए भी 22 अक्तूबर, 1922 को रूस चले गए। इस आक्रमण और
सन्धि ने उनके सम्मुख यह तथ्य प्रकट कर दिया था कि अफगानिस्तान जैसा छोटा
देश अंग्रेज सरकार के सम्मुख अधिक दिनो तक नही ठहर सकता।
बलूच और क्रान्तिकारी
श्री शचीन्द्र ने अपनी पुस्तक के द्वितीय भाग मे 'बर्मा की कहानी' शीर्षक
अध्याय के अन्तर्गत बलूच सेना के विद्रोह की झांकी दी है, जिसमें सैकड़ों बलूच
सैनिकों और उनके अफसरों को भारी दण्ड सहना पड़ा। इस संदर्भ में कई बातें
ध्यान मे रखने योग्य हैं। प्रथम तो यह कि बलूचिस्तान की सीमाएँ सरहदी पठानों
के प्रदेश की सीमाओं से लगी हुई हैं, जिनकी अंग्रेज विरोधी परम्पराओं और
भावनाओं पर हम ऊपर प्रकाश डाल चुके हैं। इसके अतिरिक्त मदरसा देवबन्द
के क्रान्तिकारियों का संगठन सिन्ध में भी था और वहाँ अनेक छोटे-छोटे मदरसे
इन लोगों ने स्थापित कर रखे थे, जिनके द्वारा निरन्तर अंग्रेज विरोधी प्रचार
होता रहता था। यह भी अब प्रकट हो गया है कि बर्मा में बलूच सेना ने जिस गदर
पार्टी के कार्यकर्ताओं के प्रोत्साहन पर विद्रोह किया था, उसी गदर पार्टी के अनेक
कार्यकर्ता ईरान के रास्ते बलूच प्रदेश की सीमा पर जा पहुंचे थे और उन्होंने
एक बड़े बलूच सरदार जिहान खां को अपनी ओर मिला लिया था। इन लोगों
ने इस बलूच प्रदेश में आजाद हिन्द सरकारी बनाई थी और बलूचियों की एक
सेना भी संगठित कर ली थी, जिससे अंग्रेज सेनाओं की अनेक झड़पें हुई थीं। इसके

390 / बन्दी जीवन
बाद अंग्रेजों ने बलोचों के अमीर को अपनी ओर मिला लिया और फिर उसी ने
क्रान्तिकारी बलूच सेना पर आक्रमण किया । परिणामस्वरूप बलूच सेना भंग हो
गई और क्रान्तिकारियों को वहाँ से बड़ी कठिन स्थिति में भागना पड़ा । कुछ
क्रान्तिकारी अंग्रेजों के हाथों में भी पड़ गए, जो वहीं गोलियों से उड़ा दिये गए ।
इतिहासकारों के लिए यह अन्वेषण का विषय है कि ईरान-बलूचिस्तान की सीमा
पर होनेवाली इन हलचलों का बर्मा के बलूच-विद्रोह से कुछ सम्बन्ध था या नहीं।
अली अहमद सिद्दीक़ी
'बर्मा की कहानी' शीर्षक अध्याय में ही श्री शचीन्द्र ने अलीअहमद सिद्दीक़ी
के सम्बन्ध में भी कुछ पंक्तियां लिखी हैं। इन श्री अलीअहमद सिद्दीक़ी से सन्
1950-51 में इन पंक्तियों का लेखक भी मिला था। श्री सिद्दीक़ी उस समय इला-
हाबाद म्यूनिसिपैलिटी के वाटरवर्क्स विभाग में थे। उनसे बात करने पर मालूम
हुआ कि वे मैडिकल मिशन के साथ टर्की पहुँचते ही क्रान्तिकारी दल में दीक्षित
हो गए थे । श्री शुएब क़ुरैशी जो भोपाल के और बाद में बड़े प्रतिष्ठित राष्ट्रीय
मुस्लिम नेता बने, उसके सहयोगी थे । एक मजेदार बात उन्होंने यह बताई कि जब
वे कुछ ज़रूरी और गोपनीय काग़ज़ात लेकर मिस्र से भारत को चले, तो जर्मन
सरकार के एक गुप्तचर ने उनको चेतावनी दी कि भारत पहुँचते ही आप गिरफ़्तार
कर लिए जाएँगे । श्री सिद्दीक़ी इससे बड़े परेशान हुए, क्योंकि जो काग़ज़ात उनको
भारत पहुँचाने थे, उनको वे किसी भी प्रकार नष्ट नहीं करना चाहते थे और न
अंग्रेजों के हाथों में पड़ने देना चाहते थे । तभी जहाज़ में उनको एक मुस्लिम फ़क़ीर
मिला, जो प्रतिवर्ष भीख माँगने के लिए मलाया आदि देशों में घूमा करता था ।
श्री सिद्दीक़ी ने उस फ़क़ीर को समझाया कि यदि वह भारत में घूमे तो उसे अधिक
धन मिल सकता है । श्री सिद्दीक़ी ने उस फ़क़ीर को यह भी बताया कि ये एक
ज़रूरी काम से तुरन्त मलाया पहुँचना चाहते हैं, अतः फ़क़ीर यदि उनसे टिकट
परिवर्तन कर ले और उनका सामान भारत में उनके घर पहुँचा देने का वायदा
करे, तो वह उसके टिकट से मलाया चले जाएं और फ़क़ीर हिन्दुस्तान चला जाय ।
उन दिनों पासपोर्ट इत्यादि की कठिनाई थी नहीं, अतः फ़क़ीर शायद सामान के
लालच से तैयार हो गया और उसने टिकट बदल लिया । सिद्दीक़ी साहब ने काग-
ज़ात तो अपने पास रख लिए और अपना तमाम सामान फ़क़ीर के सुपुर्द कर दिया ।
इसके बाद वह मलाया जा पहुँचे । फकीर बम्बई पहुँचते ही गिरफ़्तार हो गया
और वर्षों पश्चात् जब सिद्दीक़ी साहब भारत के किसी जेल में थे, वह फ़क़ीर एक
राजनीतिक क़ैदी के रूप में ही सिद्दीक़ी साहब से मिला । क्रान्तिकारी आन्दोलन
के इतिहास में ऐसी मनोरंजक घटनाएँ भी अनेकों हुई हैं ।
श्री सिद्दीक़ी साहब ने बताया कि उनके दल में हिन्दू-मुस्लिम प्रश्न को कोई
स्थान नहीं था । सभी देश की स्वाधीनता के दीवाने थे और टर्की सरकार की राज्य
-शक्ति का सहारा पाकर भारतीय फ़ौजों के विद्रोह द्वारा अंग्रेजों से मुक्ति का स्वप्न

कुछ पूरक तथ्य / 391
देखते थे । मलाया और बर्मा में उनके संगठन का पर्याप्त विस्तार हो गया था किंतु
कुछ भारतीयो ने गद्दारी करके सम्पूर्ण भेद अंग्रेज़ो को बता दिया और भारतीय
क्रान्तिकारी समय से पूर्व ही गिरफ्तार कर लिये गए । सेनाओं पर भी भारी दमन
किया गया, जो सर्वथा गोपनीय रखा गया । सैकड़ो सिपाही और अफ़सर चुप-
चाप मौत के घाट उतार दिये गए, जिससे उनकी छूत दूसरी फ़ौजों को भी न लग
जाय ।
मुखबिर कुमुदनाथ मुखर्जी
श्री शचीन्द्र ने इन गद्दारों में बैकोक के एक बगाली वकील साहब का उल्लेख
किया है किन्तु उनका नाम नही दिया है । पता लगता है कि इन बंगाली वकील
साहब का नाम कुमुदनाथ मुखर्जी था । यह वकील साहब जो किसी समय गदर पार्टी
के कार्यकर्ताओ से बडी देशभक्ति की डीगे हाँकते थे, उस रुपये को हजम कर जाने
की खातिर जो बैकोक के जर्मन कौसिल ने इनके द्वारा बगाल के क्रान्तिकारियों
को भेजा था, अंग्रेजों से जा मिले । उनके द्वारा शघाई, स्याम और बर्मा में होने-
वाली क्रान्तिकारी योजनाओं का आभास भारत सरकार को मिल गया और इसी-
लिए वह सब कुछ नही हो सका, जिसे श्री सिद्दीकी इत्यादि करना चाहते थे ।
पंजाब के कृपालसिंह की भाँति इन मुखर्जी ने सब गुड़गोबर कर दिया ।
बंगाल मे विद्रोह की तैयारी
रहस्योद्घाटन के भय से श्री शचीन्द्र यह बात भी बचा गए हैं कि जब उत्तर
भारत में श्री रासबिहारी और गदर पार्टी के सदस्य इतने विराट् विद्रोह की
तैयारी मे जुटे हुए थे, तब बगाल के क्रान्तिकारी क्या कर रहे थे ? श्री मन्मथनाथ
गुप्त ने अपनी पुस्तक 'भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का इतिहास' में एक अन्य
क्रान्तिकारी श्री पाकड़ासी की एक पुस्तक का निम्न उद्धरण दिया है, जो इस
सम्बन्ध मे पर्याप्त प्रकाश डालता है और यह प्रकट करता है कि बगाल मे उन
दिनों किस प्रकार की तैयारी चल रही थी। श्री पाकड़ासी लिखते हैं, 'नेतागण
ढाका से लेकर लाहौर तक विद्रोह की तैयारी में लगे हुए थे । ढाका मे उन दिनों
सिख सेना थी । लाहौर के षड्यन्त्रकारी सिख सैनिको ने ढाका के सिखों के साथ
सम्पर्क स्थापित करने के लिए परिचय पत्र भेज दिए । ढाका के क्रान्तिकारी नेता
अनुकूल चक्रवर्ती उन पत्रों को लेकर ढाका के सिख सैनिको से मिले ।... सिख
सैनिक विद्रोह की बात सुनकर शिरकत करने के लिए उत्सुक हो गए ।' ...
"मैमनसिंह और राजशाही के सुस्ल नामक जंगल में क्रान्तिकारी संध्या के
बाद क़वायद करते थे । आक्रमण और रणकौशल सीखने के लिए सब लोग प्रयास
करने लगे । जिलों में बंदूकें चुराने की होड़ मच गई । चारों तरफ़ अफ़वाह फैला
दी गई कि अब की बार मैट्रिक्यूलेशन और विश्वविद्यालय की दूसरी परीक्षाएँ

392 / बन्दी जीवन
नहीं होंगी।"
श्री गुप्त ने अपने ग्रन्थ में एक अन्य स्थान पर लिखा है, "बंगाल के क्रान्ति-
कारी समझते थे कि संख्या की दृष्टि से उनके साथ इतने काफ़ी आदमी हैं, जो
बंगाल की फ़ौजों को समझ ले सकते हैं, किंतु वे बाहर से आनेवाली फ़ौजों से डरते
थे। इसी उद्देश्य को दृष्टि में रखकर क्रान्तिकारियों ने यह निश्चय किया कि
बंगाल में आनेवाली तीन मुख्य रेलों को, उनके पुलों को उड़ाकर बेकार कर दिया
जाय। यतीन्द्रनाथ के ऊपर मद्रास से आनेवाली रेल का भार दिया गया, वे
बालासोर से इस काम को अंजाम देने वाले थे। भोलानाथ चटर्जी बी० एन०
आर० का भार लेकर चक्रधरपुर चले गए। सतीश चक्रवर्ती ई० आई० आर०
का पुल उड़ाने के लिए गए। नरेन चौधरी और फणीन्द्र चक्रवर्ती को यह काम
सौंपा गया कि वे हटिया जाएं। वहां एक जत्था इकट्ठा होनेवाला था। हटिया मे
वे इस जत्थे की सहायता से पूर्व बंगाल के जिलों पर क़ब्ज़ा करने वाले थे, और
वहां से वे कलकत्ता पर चढ़ आनेवाले थे। नरेन भट्टाचार्य और विपिन गागुली
के नेतृत्व में कलकत्ता दल पहले तो कलकत्ता के आस-पास अस्त्र-शस्त्र तथा
अस्त्रागारों पर क़ब्ज़ा करनेवाला था, फिर फोर्ट विलियम पर धावा बोलने
वाला था तथा कलकत्ता पर अधिकार जमानेवाला था। 'मावेरिक' जहाज़ पर
आनेवाले जर्मन अफ़सरों पर यह भार था कि वे पूर्व बंगाल मे रहें, वहां फ़ौजें
इकट्ठी करें, फिर बाकायदा उन्हें सैनिक शिक्षा दें।"
रासबिहारी का भारत-त्याग
देश-विदेशों में होने वाली यह विराट् तैयारियां असफल हो गईं और
श्री रासबिहारी बोस को भारत छोड़कर बाहर जाना पड़ा। श्री शचीन्द्र ने
लिखा है कि अप्रैल, 1915 में श्री रासबिहारी ने भारत से प्रस्थान किया। यहाँ कुछ
स्मृतिभ्रम मालूम होता है क्योंकि श्री रासबिहारी ने अपने एक लेख में भारत
छोड़ने की तिथि 12 मई, 1915 बताई है। श्री रासबिहारी ने एक जापानी
जहाज पर पी० एन० टैगोर के नाम से यह यात्रा की। उन दिनों श्री रवीन्द्रनाथ
टैगोर के जापान जाने की सूचनाएं अखबार में निकली थीं, अतः श्री रासबिहारी
ने कुछ ऐसा प्रदर्शित किया कि वे श्री रवीन्द्रनाथ के ही परिवार के हैं और उनकी
यात्रा का प्रबन्ध करने के लिए जापान जा रहे हैं। उस समय श्री रासबिहारी के
सिर पर एक लाख का इनाम था। वे पकड़े जाते तो अवश्य ही अंग्रेज उनको
फांसी पर चढ़ा देते। पर वे सकुशल जापान जा पहुंचे। उनके जापान पहुंच जाने
पर अंग्रेजों को जब यह सब ज्ञात हुआ तो उसने जापान सरकार पर यह दबाव
डाला कि वह श्री रासबिहारी को गिरफ्तार करके अंग्रेजों के हवाले कर दे।
जापान सरकार इसके लिए तैयार भी हो गई किन्तु रासबिहारी के जापानी मित्रों
ने ऐसा नहीं होने दिया। अनेक दिनों तक जापान में भी रासबिहारी को भारत से
भी अधिक छिपकर रहना पड़ा। कुछ दिनों पश्चात् यह बाधाएं दूर हो गईं और

कुछ पूरक तथ्य / 393
श्री रासबिहारी जापान के नागरिक बन गए ।
द्वितीय विश्वयुद्ध के समय श्री रासबिहारी पुनः कार्यक्षेत्र मे उतरे । जैसे ही
जापान ने अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध घोषणा की, श्री रासबिहारी ने जापान स्थित
भारतीयों का एक संगठन बनाकर भारत की स्वाधीनता के लिए प्रयास प्रारम्भ
किया । गदर पार्टी के कुछ कार्यकर्ता और बंगाल क्रान्तिकारी दल के कुछ सदस्यों
ने इस कार्य में श्री रासबिहारी की सहायता की । आजाद हिन्द फौज के प्रारम्भिक
संगठन मे उन्होंने महत्त्वपूर्ण भाग लिया था। इसके पश्चात् जब श्री सुभाष बोस
जापान जा पहुँचे, तो रासबिहारी ने नेतृत्व उनके हाथों में सौंप दिया । जनवरी
सन् 1945 मे श्री रासबिहारी का टोकियो में देहान्त हो गया ।
विदेशों में भारतीय विप्लववादी
श्री शचीन्द्र ने विदेशों मे भारतीय विप्लववादियो के कार्यों का वर्णन भी
अपनी पुस्तक के द्वितीय भाग के अन्तर्गत किया है । इस अध्याय मे उनके कार्य
की एक अति संक्षिप्त झाँकी ही आ सकती थी और फिर ऐसी बातें न लिखने की
विवशता भी थी जो उस समय तक प्रकट नहीं हुई थी और जिनकी सूचना से
अंग्रेज शासकों को लाभ पहुँच सकता था । वास्तव मे, जो भारतीय देशभक्त
विदेशों मे कार्य करते रहे, उनका लेखा-जोखा तैयार करना अतिदुस्तर कार्य है ।
उनका सम्पूर्ण कार्य अत्यन्त गोपनीय होता था । किसी भी सरकार की प्रामा-
निकता उनके पास थी नही। अपने परिवार और साथियों से दूर रहकर नितान्त
अभाव-ग्रस्त अवस्था मे इनको कार्य करना पड़ता था । अनेक भारतीय और
विदेशी गुप्तचर इनको घेरे रहते थे और सबसे बडी कठिनाई यह थी कि एक दिन
जिस राष्ट्र को वह अंग्रेजो का शत्रु समझकर वहाँ आश्रय ग्रहण करते थे तथा
अपना केन्द्र बनाते थे, वही किसी दिन भी आन्तरिक अथवा विदेशी राजनीतिक
उलट से विवश होकर अंग्रेजो का मित्र और इनका शत्रु बन जाता था । ये लोग
हजारों की संख्या मे थे, जिनमें से अधिकतर वही, अपनी मातृभूमि से दूर, काल
कवलित हो गए। अनेकों को विदेशों के कारावास मे भी भयानक यंत्रणाएँ सहन
करनी पड़ीं । फिर भी इनमे से अधिकांश ब्रिटिश सरकार द्वारा उत्पन्न की गई
बाधाओं और उसके द्वारा दिए गए प्रलोभनों को जीतकर अपने मार्ग पर आरूढ़
रहे । न जाने कब वह समय आएगा, जब इन लोगों के कार्यों का ब्योरा उनके
सम्मुख आ सकेगा, जिनकी स्वतन्त्रता के लिए उन्होने ऐसे कष्ट सहन किए थे ।
अभी कुछ दिन पहले हमारी सरकार इस कार्य में प्रवृत्त होती दिखाई दी थी ।
केन्द्र और राज्यो में इसके लिए कमेटियाँ भी बनीं । बजट भी मंजूर हुए । कुछ
कार्य आगे बढ़ा भी किन्तु फिर पता नहीं लगा कि क्या हुआ ? इलाहाबाद की
हिन्दुस्तानी कल्चर सोसाइटी ने भी एक बार इस काम को हाथ मे लिया था,
जिसका एक कार्यकर्ता इन पंक्तियों का लेखक भी था । यह तो काम में हाथ
डालने के बाद मालूम हुआ कि सरकार के अतिरिक्त, करोड़ों रुपया व्यय किए

394 / बन्दी जीवन
बिना कोई दूसरा संगठन यह कार्य प्रामाणिक रूप से नहीं कर सकता।
यह बात ध्यान में रखने की है कि विदेशों में कार्य करनेवाले भारतीय
विप्लववादियों में अनेक असाधारण बौद्धिक क्षमता के व्यक्ति थे। इनमें से कुछ
तो अन्य राष्ट्रों में उच्च सरकारी पदों पर पहुँच गए। ये लोग यदि चाहते और
इस क्रान्ति मार्ग पर आरूढ़ न होते तो अपने देश में भी पर्याप्त यश, मान और
धन अर्जित कर सकते थे। फिर भी मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए उन्होंने
कष्टों और यातनाओं से भरे हुए मार्ग को ही चुना और अपने लक्ष्य के लिए
शहीद हो गए। हमारे देश के लिए यह कितनी वेदनात्मक स्थिति है कि आज
उनमें से अधिकांश का नाम भी हम नहीं जानते। यही नहीं, बल्कि जिन लोगों ने
विदेशों में रहते समय साहित्य रचना की, उनका प्रकाशित साहित्य भी हमारे
पास उपलब्ध नहीं है। अब पता लगा है कि श्री रासबिहारी बोस ने जापानी
भाषा में सात ग्रन्थ लिखे हैं। मौलवी बर्कतुल्ला, श्री वीरेन्द्र चट्टोपाध्याय, मैडम
कामा, श्यामजी कृष्ण वर्मा, ला० हरदयाल इत्यादि अनेकों ने भी समय-समय
पर ग्रन्थ, पुस्तिकाएं, लेख इत्यादि लिखे, इन लोगों ने अनेक पत्र भी निकाले,
पर आज भारतीयों के लिए उनमें से एक भी तो उपलब्ध नहीं है। भारत
सरकार चाहे तो अपने दूतावासों के द्वारा यह कार्य करा सकती है। अनेक
विदेशी राजनीतिक महानुभावों ने अपनी पुस्तकों में इन भारतीय क्रान्तिकारियों
का प्रसंगवश जो विवरण दिया है, हमारे दूतावास उनका संग्रह भी कर सकते
हैं, पर यह सब नहीं हो रहा और न इसकी मांग ही की जा रही है। शायद किसी
देश के लिए अपने देशभक्तों के प्रति कृतघ्नता की यह चरम सीमा है। इतिहास
की क्षति तो है ही।
विदेशों में भारतीय जासूस
अंग्रेज सरकार इन लोगों पर कितनी कड़ी नजर रखती थी, इसका एक
उदाहरण उर्दू के प्रसिद्ध लेखक काजी अब्दुल गफ्फार खां ने मुझे सुनाया था।
उन्होंने बताया कि एक बार वे डा० अंसारी और हकीम अजमल खां के साथ पेरिस
में थे। वहाँ किसी के द्वारा इन लोगों को सन्देश मिला कि श्री एम० एन० राय
की पत्नी एलेनराय इनसे भेंट करना चाहती हैं। भेंट सर्वथा गुप्त होनी थी, अतः
पेरिस के एक भारतीय मुस्लिम व्यापारी का घर इसके लिए निश्चित किया गया।
उस व्यापारी की क्रौकरी की एक बड़ी दूकान थी। भारत की स्वाधीनता और
राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रति उसकी निष्ठा देखकर ही उसका स्थान विश्वासपात्र
समझा गया। फिर भी सावधानी के लिए न तो उसे एलेनराय का नाम बताया
गया और न उसे वार्ता में सम्मिलित ही किया गया। इतना ही नहीं, बल्कि वार्ता
के समय उसके परिवार का कोई भी व्यक्ति मकान में नहीं था। निश्चित समय
पर एलेनराय आईं और वार्ता करके चली गईं। इसके पश्चात् ये लोग, (डा०
अंसारी, हकीम अजमल खां, काजी अब्दुलगफ्फार) टर्की गए। टर्की देखने की