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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 384, कुल 408 में से

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पृष्ठ 384

382 / बन्दी जीवन
'जमायते सियासिया' के अन्य कार्यकर्ता वे लोग रहे थे, जो मदरसा देवबन्द में
तालीम पा चुके थे।
'जमायते सियासिया' ने सबसे पहले यह माँग रक्खी कि काबुल की वैदेशिक
नीति से अंग्रेजों का नियन्त्रण उठा लिया जाय। सन् 1898 मे अमीर अब्दुर्रहमान
खां के द्वितीय पुत्र नसरुल्ला खां लन्दन गए और उन्होंने ब्रिटिश सरकार के सम्मुख
यह मांग बड़े जोरदार ढंग से पेश की। उनकी यह माग ब्रिटिश सरकार ने अस्वी-
कार कर दी । इसके पश्चात् 1 अक्तूबर, 1901 को अब्दुर्रहमान खां का देहान्त
हो गया और हबीबुल्ला खां अफगानिस्तान के अमीर बने । सन् 1907 तक हबी-
बुल्ला खां बराबर जमायते सियासिया के सहायक रहे और अंग्रेजो से काबुल की
वैदेशिक नीति पर से अपना नियन्त्रण हटा लेने का आग्रह करते रहे, जिस पर
अंग्रेजों ने कोई ध्यान नही दिया ।
सन् 1905 मे बंग-भंग आन्दोलन प्रारम्भ हुआ और इसी के आसपास पंजाब
मे किसानों का सरगर्म आन्दोलन फूट पड़ा, जिसने गदर पार्टी को जन्म दिया।
अब अंग्रेजो को यह फिक्र हुई कि काबुल के अमीर को सन्तुष्ट किया जाय।
परिणामस्वरूप अमीर हबीबुल्ला खां को सन् 1907 मे भारत बुलाया गया। तत्का-
लीन लार्ड मिण्टो से अमीर की लम्बी-लम्बी मुलाकाते हुई और उन मुलाकातो
का परिणाम यह हुआ कि अफगानिस्तान वापस पहुंचते ही अमीर ने जमायते
सियासिया का विरोध करना प्रारम्भ कर दिया। उस समय तक मुस्तफा फहमी
की मृत्यु हो चुकी थी और उनके पुत्र अली फहमी जमायत के मन्त्रि-पद पर थे।
अली फहमी और उनके दो सहायको को अमीर ने गिरफ्तार करके निर्वासित कर
दिया। बहुत दिनों तक ये लोग अन्य मुस्लिम राष्ट्रों में पड़े रहे। इसके पश्चात्
अमीर के छोटे भाई और तत्कालीन प्रधानमन्त्री नसरुल्ला खां ने, जो जमायते
सियासिया से हमदर्दी रखते थे, बड़ी कठिनाई से उनको काबुल आने की आज्ञा
दिलवाई। वापस आते ही उन लोगों ने जमायते सियासिया का गुप्त संगठन
प्रारम्भ कर दिया और इस प्रकार जमायते सियासिया एक अंग्रेज विरोधी गोप-
नीय क्रान्तिकारी संगठन के रूप मे परिवर्तित हो गई।
सरहदी क़बीले
देवबन्द के क्रान्तिकारी आचार्य महमूदउलहसन का इन सभी घटनाओ से
बराबर सम्पर्क रहा। उनके अनेक शिष्य और सहपाठी इस संगठन के कर्ता-धर्ता
थे। सरहद के आज़ाद क़बीलो मे मदरसा देवबन्द के क्रान्तिकारियों का वह संगठन
मौजूद था, जो सन् 1825 मे भारत से हिजरत कर गया था। उन विद्रोहियों की
नई पीढ़ी ने भी इसी पथ को अपना लिया था। इसी समय तुरंगजई के हाजी ने
धार्मिक मदरसों के रूप मे पठान इलाके के अनेक स्थानो मे अपने संगठन का जाल
बिछाना शुरू किया। खान अब्दुलगफ्फार खां, जो बाद को कांग्रेस के बहुत बड़े
नेता हुए और 'सरहदी गांधी' कहलाए, हाजी तुरंगजई के प्रधान शिष्य के रूप में