बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकुछ पूरक तथ्य / 387
रेशमी पत्र
मुस्लिम क्रान्तिकारी दल के सम्बन्ध मे अब केवल उन 'रेशमी पत्रों' की बात
कहनी शेष रह जाती है, जिनके नाम से सिडीसन कमेटी ने इस संगठन की अपनी
रिपोर्ट में चर्चा की है। रिपोर्ट में कहा गया है, कि अगस्त सन् 1916 में यह षड्यन्त्र
उद्घाटित हुआ, जो सरकारी कागजात में 'सिल्क लैटर्स केस' कहा गया है। यह
पत्र पीले रेशमी कपड़ों पर बहुत साफ और सुन्दर अक्षरों मे लिखे गए थे। इनके
साथ मौलाना महमूद उलहसन के नाम मुहम्मद मियाँ अंसारी का भी एक पत्र
था, जिसमे उन्होने अपनी कारगुजारियों का पूरा विवरण दिया था। आजाद हिन्द
सरकार के खतों में, मरकार के संगठन की संपूर्ण म्थिति और उसके पदाधिकारिगियों
के नाम थे। इसके अतिरिक्त एक 'ईश्वरीय सेना' बनाने की योजना थी, जिसमे
भारतीय मुस्लिम नौजवान भरती किये जाने थे। मौलाना महमूद उलहसन उमके
प्रधान सेनापति नियुक्त किये गए थे।
मौलवी उबेदुल्ला साहब ने यह 'रेशमी पत्र' अब्दुलहक नामक व्यक्ति को
दिये थे कि वह इनको शेख अब्दुर्रहीम (आचार्य कृपलानी के बड़े भाई) तक पहुँचा
दे । यह अब्दुलहक साहब एक नव मुस्लिम थे और जिहाद के जोश मे लाहौर
से भागकर काबुल पहुँचे थे। उन्होंने भारत आकर यह पत्र अपने एक मित्र हक-
नवाज खा को दे दिए और हकनवाज खां ने इन पत्रो को अपने पिता खानबहा-
दुर अल्लाहवाज खा के सुपुर्द कर दिया। राजभक्ति के जोश मे अल्लाहवाज खां
इन खतों को पंजाब के गवर्नर सरमाईकेल ओडायर के पास ले गए और इस प्रकार
सरकार को यह सम्पूर्ण योजना ज्ञात हो गई। इसके पश्चात शेख अब्दुर्रहीम भाग-
कर टर्की पहुँच गए और बहुत दिनों तक भारतीय स्वाधीनता के निग कार्य कग्ने
हुए वही उनका देहान्त हो गया ।
आजाद हिन्द सरकार द्वाग भारत पर आक्रमण
काबुल की आज़ाद हिन्द मरकार ने इमके बाद भारत पर आक्रमण कग्ने की
योजना बनाई और सरहद के आज़ाद कबीलों मे से इमके लिए लगभग छः हजार
सैनिक एकत्रित किए। जर्मनी और टर्की की मरकार का भी इस आक्रमण-योजना
की सूचना दी गई और बताया तो यह जाता है कि जर्मन सैनिकों की एक टुकड़ी
भी इनकी सहायता को काबुल भेजी गई। किन्तु जब आजाद हिन्द सरकार के छः
हजार सैनिक सरहद पर अंग्रेज सरकार से मोर्चा जमाये हुए थे, तभी फ्रांस के
रणक्षेत्र में जर्मनी का पतन हो गया और उसे सन्धि के लिए विवश होना पड़ा।
अंग्रेजों के हाथ इससे बहुत मजबूत हो गए और आजाद हिन्द मरकार के सैनिकों
की स्थिति बहुत कमज़ोर हो गई। इन सैनिकों में से बहुत-से व्यक्ति गोलियों से
मारे गए। कुछ पकड़कर फांसी पर चढ़ा दिये गए और कुछ विदेशों में ही भटक
भटककर मर गए। इसके बाद आज़ाद हिन्द सरकार और फ़ौज तोड़ दी गई और