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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 394, कुल 408 में से

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पृष्ठ 394

392 / बन्दी जीवन
नहीं होंगी।"
श्री गुप्त ने अपने ग्रन्थ में एक अन्य स्थान पर लिखा है, "बंगाल के क्रान्ति-
कारी समझते थे कि संख्या की दृष्टि से उनके साथ इतने काफ़ी आदमी हैं, जो
बंगाल की फ़ौजों को समझ ले सकते हैं, किंतु वे बाहर से आनेवाली फ़ौजों से डरते
थे। इसी उद्देश्य को दृष्टि में रखकर क्रान्तिकारियों ने यह निश्चय किया कि
बंगाल में आनेवाली तीन मुख्य रेलों को, उनके पुलों को उड़ाकर बेकार कर दिया
जाय। यतीन्द्रनाथ के ऊपर मद्रास से आनेवाली रेल का भार दिया गया, वे
बालासोर से इस काम को अंजाम देने वाले थे। भोलानाथ चटर्जी बी० एन०
आर० का भार लेकर चक्रधरपुर चले गए। सतीश चक्रवर्ती ई० आई० आर०
का पुल उड़ाने के लिए गए। नरेन चौधरी और फणीन्द्र चक्रवर्ती को यह काम
सौंपा गया कि वे हटिया जाएं। वहां एक जत्था इकट्ठा होनेवाला था। हटिया मे
वे इस जत्थे की सहायता से पूर्व बंगाल के जिलों पर क़ब्ज़ा करने वाले थे, और
वहां से वे कलकत्ता पर चढ़ आनेवाले थे। नरेन भट्टाचार्य और विपिन गागुली
के नेतृत्व में कलकत्ता दल पहले तो कलकत्ता के आस-पास अस्त्र-शस्त्र तथा
अस्त्रागारों पर क़ब्ज़ा करनेवाला था, फिर फोर्ट विलियम पर धावा बोलने
वाला था तथा कलकत्ता पर अधिकार जमानेवाला था। 'मावेरिक' जहाज़ पर
आनेवाले जर्मन अफ़सरों पर यह भार था कि वे पूर्व बंगाल मे रहें, वहां फ़ौजें
इकट्ठी करें, फिर बाकायदा उन्हें सैनिक शिक्षा दें।"
रासबिहारी का भारत-त्याग
देश-विदेशों में होने वाली यह विराट् तैयारियां असफल हो गईं और
श्री रासबिहारी बोस को भारत छोड़कर बाहर जाना पड़ा। श्री शचीन्द्र ने
लिखा है कि अप्रैल, 1915 में श्री रासबिहारी ने भारत से प्रस्थान किया। यहाँ कुछ
स्मृतिभ्रम मालूम होता है क्योंकि श्री रासबिहारी ने अपने एक लेख में भारत
छोड़ने की तिथि 12 मई, 1915 बताई है। श्री रासबिहारी ने एक जापानी
जहाज पर पी० एन० टैगोर के नाम से यह यात्रा की। उन दिनों श्री रवीन्द्रनाथ
टैगोर के जापान जाने की सूचनाएं अखबार में निकली थीं, अतः श्री रासबिहारी
ने कुछ ऐसा प्रदर्शित किया कि वे श्री रवीन्द्रनाथ के ही परिवार के हैं और उनकी
यात्रा का प्रबन्ध करने के लिए जापान जा रहे हैं। उस समय श्री रासबिहारी के
सिर पर एक लाख का इनाम था। वे पकड़े जाते तो अवश्य ही अंग्रेज उनको
फांसी पर चढ़ा देते। पर वे सकुशल जापान जा पहुंचे। उनके जापान पहुंच जाने
पर अंग्रेजों को जब यह सब ज्ञात हुआ तो उसने जापान सरकार पर यह दबाव
डाला कि वह श्री रासबिहारी को गिरफ्तार करके अंग्रेजों के हवाले कर दे।
जापान सरकार इसके लिए तैयार भी हो गई किन्तु रासबिहारी के जापानी मित्रों
ने ऐसा नहीं होने दिया। अनेक दिनों तक जापान में भी रासबिहारी को भारत से
भी अधिक छिपकर रहना पड़ा। कुछ दिनों पश्चात् यह बाधाएं दूर हो गईं और