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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 380, कुल 408 में से

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पृष्ठ 380

378 / बन्दी जीवन
पार्टी ने अपने आफिस आदि के लिए सानफ्रांसिस्को में दो प्लाट खरीदे और वहाँ
आफिस आदि के लिए इमारत बनवाई। समिति की रिपोर्ट के अनुसार पार्टी का
विधान सन् 1928 में बना और फिर वह भारत के स्वतन्त्र होने तक सरगर्मी के
साथ काम करती रही और उसके सदस्य बराबर एक देश से दूसरे देश तक दौड़-
धूप करते रहे। भारत की स्वतन्त्रता के पश्चात् गदर पार्टी ने अपनी सम्पूर्ण चल-
अचल सम्पत्ति भारत सरकार के अमेरिका स्थित प्रतिनिधि के सुपुर्द कर दी और
इस प्रकार भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इस अत्यन्त जुझारू संगठन ने अपने लक्ष्य
को प्राप्त करके स्वयं को भंग कर लिया।
मुस्लिम क्रान्तिकारी दल का इतिहास
'गदर पार्टी' की ही भाँति उस मुस्लिम क्रान्तिकारी दल पर भी कुछ प्रकाश
डालना आवश्यक है, जिससे दिल्ली में अपने सम्पर्क होने का उल्लेख शचीन्द्र बाबू
ने किया है। शचीन्द्र बाबू ने इस दल के उद्भव का समय और कारण सन् 1912
में होनेवाली बाल्कन वार और उसमें डा० अंसारी के नेतृत्व में जानेवाले भार-
तीय मुसलमानों के मैडिकल मिशन को बताया है। श्री शचीन्द्र के लेखानुसार
मैडिकल मिशन में जो भारतीय नौजवान गए थे, तुर्की की सरकार और जनता
ने उनका भारी सम्मान किया। इस राजकीय सम्मान ने उनका माथा गरम कर
दिया और उनमें से अनेक भारत आकर ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध सक्रिय हो गए।
कुछ अन्य महानुभावों ने भी इन मुस्लिम क्रान्तिकारियों के सम्बन्ध में कुछ इसी
प्रकार लिखा है। इसका कारण यह है कि सिडीसन कमेटी की रिपोर्ट में मुस्लिम
क्रान्तिकारी दल के उद्भव और विकास का इसी प्रकार उल्लेख किया गया है।
इसके विपरीत वास्तविकता यह है कि इस दल का इतिहास बहुत ही पुराना
और सम्भवतः उतना ही अद्भुत है। सन् 1720 अर्थात् गदर से भी लगभग एक
सौ सैंतीस वर्ष पहले दिल्ली में एक मुस्लिम सन्त हुए, जिनका नाम शाह वलीउल्ला
था। वे अत्यन्त उच्चकोटि के दार्शनिक, विद्वान् और तपस्वी व्यक्ति समझे जाते
थे और उनके परिवार की बहुत शानदार परम्परा थी। मुस्लिम दर्शन के अध्यापन
में वे निष्णात समझे जाते थे। अरबी और फारसी में उनके लिखे ग्रन्थ आज
भी अनेक मुस्लिम राष्ट्रों में पढ़ाए जाते हैं। भारत की तत्कालीन राजनीतिक
स्थिति बड़ी भयावह थी और अंग्रेज धीरे-धीरे भारत की राजनीति पर हावी होते
जा रहे थे। दिल्ली की मुस्लिम बादशाहत बहुत कमज़ोर हो चली थी। इस स्थिति
ने शाह वलीउल्ला को राजनीति की ओर खींच लिया और वे अपने अनुयायियों
को राजनीतिक शिक्षा देने लगे। भारत की हिन्दू-मुस्लिम समस्या और शासन-
नीति पर भी शाह वलीउल्ला ने भली प्रकार विचार किया था। जन-साधारण
की दिनों-दिन गिरती हुई आर्थिक स्थिति और शासकीय दल द्वारा जनता के
शोषण को देखकर वे तत्कालीन शासकों के विरोधी बन गए थे और इसके लिए
उन्होंने कष्ट भी उठाए थे। अपनी अरबी भाषा में लिखी एक प्रसिद्ध पुस्तक