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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 383, कुल 408 में से

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पृष्ठ 383

कुछ पूरक तथ्य / 381
दल का प्रचार काबुल और आजाद कबीलो में किया। सरहद का एक प्रभावशाली
विद्वान् मोलवी तुरंग जई का हाजी इनका सहायक बना। एक दूसरा नव मुस्लिम
उबेदुल्ला सिन्धी, जिसने इस मदरसे से ही शिक्षा पाई थी, शेख महमूदउलहसन
का इस कार्य मे दाहिना हाथ था। उस समय इन मुस्लिम क्रान्तिकारियों को
अफगानिस्तान और सरहद पार बसे हुए आज़ाद पठान कबीले ही ऐसी सैनिक
शक्ति दिखाई देते थे जिनकी सहायता से वे अग्रेजो से भारत को मुक्त कर सकते
थे। मौलाना उबैदुल्ला सिन्धी ने अपनी एक पुस्तक मे लिखा है कि मदरसा
देवबन्द का एक गोपनीय नियम यह भी था कि वह अफगानिस्तान की सरकार
मे अपना प्रभाव उत्पन्न करे। इसलिए सिन्धु नदी के उस पार से आने वाले
विद्यार्थियो को यह शिक्षा दी जाती थी कि वे अपने कबीलो मे जाकर उनके
सगठन और व्यवस्था मे कोई हेर-फेर न करे और यदि वहाँ कोई ऐसी रूढि
तथा परम्परा हो, जो धर्म की दृष्टि से उचित न हो, तो उसके विरुद्ध होने वाले
आन्दोलनो मे भाग न ले।
अफ़गानिस्तान की स्थिति
मुस्लिम क्रान्तिकारी दल की हलचलो और कार्य-नीति को समझने के लिए
अफगानिस्तान की तत्कालीन स्थिति को भी सक्षेप मे समझ लेना आवश्यक है।
आधुनिक अफगानिस्तान के पिता अमीर अब्दुर्रहमान थे, जिन्होने सबसे पहले
अफगानिस्तान मे एक दृढ केन्द्रीय सरकार की स्थापना की। अमीर अब्दुर्रहमान
सन् 1880 मे अग्रेजो की सहायता से काबुल की गद्दी पर बैठे थे किन्तु मन ही
मन वे अंग्रेजो से सशकित रहते थे। अंग्रेज राजदूत को काबुल मे रखने से उन्होने
यह कहकर इन्कार कर दिया था कि उसकी रक्षा की जिम्मेदारी लेने मे वे असमर्थ
हैं। अंग्रेजों ने उनसे यह इकरार करा लिया था कि काबुल की वैदेशिक नीति का
निर्धारण सदैव ब्रिटिश सरकार करेगी। अमीर अब्दुर्रहमान के एक सहयोगी
मुस्तफा फ़हमी साहब थे, जो उस समय भी अब्दुर्रहमान के साथ थे। जब वे रूस
मे निर्वासन का जीवन व्यतीत कर रहे थे। अफगानिस्तान का सम्पूर्ण राज-काज
फ़हमी साहब के परामर्श से ही चलता था। अमीर अब्दुर्रहमान ने अपनी सैनिक
शक्ति अत्यन्त दृढ कर ली थी।
'जमायते सियासिया'
सन् 1882 मे मुस्तफा फ़हमी साहब ने काबुल मे 'जमायते सियासिया' नामक
एक सगठन बनाया और स्वय इस संगठन के प्रधान मंत्री बने। साधारण जनता
में राजनीतिक जागृति उत्पन्न करना इस सगठन का उद्देश्य था। अमीर अब्दु-
र्रहमान इस संगठन के सहायक और समर्थक थे और उनके सबसे बड़े पुत्र हबी-
बुल्ला खां भी, जो अपने पिता के समय से ही राज-काज में भाग लेने लगे थे,
'जमायते सियासिया' को बहुत महत्त्व देते थे। यह तथ्य उल्लेखनीय है कि