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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 386, कुल 408 में से

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पृष्ठ 386

384 / बन्दी जीवन
सरकार की सहायता का उसे पर्याप्त पुरस्कार मिला। कहा जाता है कि अनीस
अहमद द्वारा सरकार को भेजी गई रिपोर्टें सिडीसन कमेटी के सम्मुख भी प्रस्तुत
की गई थीं और सिडीसन कमेटी की रिपोर्ट का सिल्क लैटर कान्सप्रेसी (रेशमी
पत्रों का षड्यन्त्र) शीर्षक परिच्छेद में इन रिपोर्टों से बहुत सहायता ली गई है।
काबुल में आजाद हिन्द सरकार
प्रथम विश्वयुद्ध की घोषणा होने के पश्चात् गदर पार्टी और बंगाल के
क्रान्तिकारी दलों की ही भाँति मुस्लिम क्रान्तिकारी दल ने स्वतंत्रता संग्राम की
एक योजना बनाई। इस योजना के अनुसार मौलाना उबैदुल्ला सिन्धी को काबुल
भेजा गया। उबैदुल्ला साहब ने लिखा है कि एक दिन उस्ताद (मौलाना महमूद-
उलहसन) अकस्मात् बोले, 'उबैदुल्ला ! काबुल जाओ।' मैंने पूछा, 'क्यों ?'
इस पर उस्ताद कुछ रंजीदा से होकर चुप हो गए। दूसरे दिन भी ऐसा ही हुआ।
उस्ताद ने कहा, 'उबैदुल्ला । काबुल जाओ।' उन्होंने पूछा, क्यों ? और उस्ताद
फिर चुप। तीसरे दिन उस्ताद ने जब फिर काबुल जाने की बात कही, तो उबै-
दुल्ला साहब ने उत्तर दिया, 'बहुत अच्छा,' और काबुल जाने की तैयारी शुरू कर
दी। उबैदुल्ला साहब के पास कुछ रुपया-पैसा था नहीं, अतः अपने एक शिष्य,
शेख अब्दुर्रहीम ने जो आचार्य कृपलानी के सगे बड़े भाई थे और मुसलमान होकर
इस क्रान्तिकारी कार्य में उबैदुल्ला के प्रमुख सहायक बन गए थे, अपनी लड़की
और बीबी का जेवर बेचकर रुपया जुटाया। 15 अक्तूबर, 1915 को उबैदुल्ला
काबुल पहुंचे, तो उनके पास केवल एक पौंड था। भारत से काबुल वे सिन्ध के
रास्ते से गए थे और इस यात्रा में लगभग दो मास उनको लगे थे। उबैदुल्ला
साहब के दो भतीजे भी उनके साथ थे। मौलाना महमूद उलहसन इतने अच्छे
संगठनकर्ता थे कि उबैदुल्ला के लेखानुसार काबुल के अनेक प्रतिष्ठित राज्या-
धिकारियों को यह मालूम था कि वे किस काम के लिए भारत से भेजे गए हैं।
'जमायते सियासिया', का संगठन जिसकी चर्चा हम ऊपर कर आए हैं, उनकी
मदद के लिए तैयार था। इस योजना में धोखा केवल यह हुआ कि अफगानिस्तान
के अमीर हबीबुल्ला खां अन्दर ही अन्दर अंग्रेज़ो से मिल चुके थे। उबैदुल्ला
साहब तो इस आशा से भेजे गए थे कि अमीर उनकी पूरी तरह सहायता करेंगे।
इसी आशा से एक 'एंग्लो-जर्मन-टर्किश' मिशन भी इन दिनों ही काबुल पहुंचा।
इस मिशन में राजा महेन्द्रप्रताप, मौलवी बर्कतुल्ला आदि कुछ भारतीय, कुछ जर्मन
और कुछ तुर्की के लोग थे। यह बात याद रखनी चाहिए कि मोलवी बर्कतुल्ला
गदर पार्टी के सदस्य थे और इस मिशन को टर्की तथा जर्मन सरकार की ओर से
काबुल के साथ मिलकर भारत पर आक्रमण करने की योजना बनाने का अधिकार
दिया गया था। मौलाना उबैदुल्ला और उनके साथी या तो पूर्व योजना के अनुसार
या वहीं की स्थिति के अनुसार इस मिशन के साथ मिलकर कार्य करने लगे। कहा
जाता है कि जर्मन और टर्की सरकार से अमीर हबीबुल्ला खां को इस अवसर पर