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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 395, कुल 408 में से

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पृष्ठ 395

कुछ पूरक तथ्य / 393
श्री रासबिहारी जापान के नागरिक बन गए ।
द्वितीय विश्वयुद्ध के समय श्री रासबिहारी पुनः कार्यक्षेत्र मे उतरे । जैसे ही
जापान ने अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध घोषणा की, श्री रासबिहारी ने जापान स्थित
भारतीयों का एक संगठन बनाकर भारत की स्वाधीनता के लिए प्रयास प्रारम्भ
किया । गदर पार्टी के कुछ कार्यकर्ता और बंगाल क्रान्तिकारी दल के कुछ सदस्यों
ने इस कार्य में श्री रासबिहारी की सहायता की । आजाद हिन्द फौज के प्रारम्भिक
संगठन मे उन्होंने महत्त्वपूर्ण भाग लिया था। इसके पश्चात् जब श्री सुभाष बोस
जापान जा पहुँचे, तो रासबिहारी ने नेतृत्व उनके हाथों में सौंप दिया । जनवरी
सन् 1945 मे श्री रासबिहारी का टोकियो में देहान्त हो गया ।
विदेशों में भारतीय विप्लववादी
श्री शचीन्द्र ने विदेशों मे भारतीय विप्लववादियो के कार्यों का वर्णन भी
अपनी पुस्तक के द्वितीय भाग के अन्तर्गत किया है । इस अध्याय मे उनके कार्य
की एक अति संक्षिप्त झाँकी ही आ सकती थी और फिर ऐसी बातें न लिखने की
विवशता भी थी जो उस समय तक प्रकट नहीं हुई थी और जिनकी सूचना से
अंग्रेज शासकों को लाभ पहुँच सकता था । वास्तव मे, जो भारतीय देशभक्त
विदेशों मे कार्य करते रहे, उनका लेखा-जोखा तैयार करना अतिदुस्तर कार्य है ।
उनका सम्पूर्ण कार्य अत्यन्त गोपनीय होता था । किसी भी सरकार की प्रामा-
निकता उनके पास थी नही। अपने परिवार और साथियों से दूर रहकर नितान्त
अभाव-ग्रस्त अवस्था मे इनको कार्य करना पड़ता था । अनेक भारतीय और
विदेशी गुप्तचर इनको घेरे रहते थे और सबसे बडी कठिनाई यह थी कि एक दिन
जिस राष्ट्र को वह अंग्रेजो का शत्रु समझकर वहाँ आश्रय ग्रहण करते थे तथा
अपना केन्द्र बनाते थे, वही किसी दिन भी आन्तरिक अथवा विदेशी राजनीतिक
उलट से विवश होकर अंग्रेजो का मित्र और इनका शत्रु बन जाता था । ये लोग
हजारों की संख्या मे थे, जिनमें से अधिकतर वही, अपनी मातृभूमि से दूर, काल
कवलित हो गए। अनेकों को विदेशों के कारावास मे भी भयानक यंत्रणाएँ सहन
करनी पड़ीं । फिर भी इनमे से अधिकांश ब्रिटिश सरकार द्वारा उत्पन्न की गई
बाधाओं और उसके द्वारा दिए गए प्रलोभनों को जीतकर अपने मार्ग पर आरूढ़
रहे । न जाने कब वह समय आएगा, जब इन लोगों के कार्यों का ब्योरा उनके
सम्मुख आ सकेगा, जिनकी स्वतन्त्रता के लिए उन्होने ऐसे कष्ट सहन किए थे ।
अभी कुछ दिन पहले हमारी सरकार इस कार्य में प्रवृत्त होती दिखाई दी थी ।
केन्द्र और राज्यो में इसके लिए कमेटियाँ भी बनीं । बजट भी मंजूर हुए । कुछ
कार्य आगे बढ़ा भी किन्तु फिर पता नहीं लगा कि क्या हुआ ? इलाहाबाद की
हिन्दुस्तानी कल्चर सोसाइटी ने भी एक बार इस काम को हाथ मे लिया था,
जिसका एक कार्यकर्ता इन पंक्तियों का लेखक भी था । यह तो काम में हाथ
डालने के बाद मालूम हुआ कि सरकार के अतिरिक्त, करोड़ों रुपया व्यय किए