बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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करतारसिंह आदि की गिरफ्तारी
इस भेद के खुल जाने पर सरगरम साथियों ने कोई उपाय न देखकर जल्दी
से 21 फरवरी के बजाए, क्रान्ति के लिए, 19 फरवरी का दिन निश्चित कर
दिया। लेकिन पुलिस ने 18 फरवरी को ही लाहौर के दो-तीन मकानों से कुछ
आदमियों को गिरफ्तार कर लिया। बाबू रासबिहारी बोस के मकान का पता
मुखबिर को न था, इसलिए वे बच गए । 18 फरवरी को ही तमाम छावनियों
में हिन्दुस्तानी सिपाहियों की जगह गोरे सिपाहियों का पहरा हथियारखानो पर
लगा दिया गया और हमारी योजना बीच में ही रह गई। 19 फरवरी की रात को
ही बनारस का टिकट खरीदकर बाबू रासबिहारी को रेलगाड़ी पर सवार कराया
गया। पंजाबी कपड़े पहनकर वे बनारस पहुँचकर बच निकले। दूसरे दिन दो
साथियों करतारसिंह सराबां और जगतसिंह के साथ मैं लाहौर से चला गया।
हम तीनों ज्यों-ज्यों पेशावर पहुँचे। पेशावर से दस मील आगे निकलकर फिर
पीछे लौटने का निश्चय किया। फैसला यह किया कि कुछ हथियार इकट्ठे कर
अपने साथियों को लाहौर और अमृतसर की हवालातों से छुड़ाया जाए। हथियार
लेने के लिए हम लोग सरगोधा के सरकारी फार्म में गए और वहाँ के सिख
रिसालदार की मुखबिरी पर गिरफ्तार हो गए। ***गिरफ्तारी 28 मार्च सन् 1915
को हुई थी।
कृपालसिंह की हत्या
"मुखबिर कृपालसिंह उस समय तो बच गया किन्तु क्रान्तिकारी उनके पीछे
लगे ही रहे। वह इतनी सावधानी से रहता था कि उसको ठिकाने लगाना आसान
बात नहीं थी। फिर भी सन् 1931 में, जब एक दिन वह अपने घर पर सो रहा
था, कुछ लोगों ने उसे ठिकाने लगा दिया और आज तक यह पता नही लग सका
कि उसकी हत्या करनेवाले कौन थे।
गदर पार्टी का जन्म और अन्त
शचीन्द्र बाबू ने अपनी पुस्तक में अमेरिका की गदर पार्टी के सम्बन्ध में बहुत-
कुछ लिखा है। पंजाब में फ़ौजों को उभारने आदि का सम्पूर्ण कार्य गदर पार्टी के
ही सदस्यों ने किया था। इनमें से पचासों फाँसी पर चढ़ गए, सैकड़ों को काला
पानी हुआ और कुछ सरकार की आँखों में धूल झोंककर विदेशों को भी चले गए।
किन्तु फिर इसके पश्चात् गदर पार्टी का क्या हुआ ? क्या वह समाप्त हो गई ?
जैसाकि बहुत-से व्यक्ति समझते हैं। इस सम्बन्ध में वास्तविकता यह है कि गदर
पार्टी भारत की स्वाधीनता तक बराबर अमेरिका में और जहाँ भी उसके सदस्य
थे, कार्य करती रही। यह ठीक है कि प्रथम विश्वयुद्ध में उसके सैकड़ों-हज़ारों
सदस्य भारत में आकर अपनी जन्मभूमि की स्वाधीनता के लिए संघर्षरत हुए, किंतु