बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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बिना कोई दूसरा संगठन यह कार्य प्रामाणिक रूप से नहीं कर सकता।
यह बात ध्यान में रखने की है कि विदेशों में कार्य करनेवाले भारतीय
विप्लववादियों में अनेक असाधारण बौद्धिक क्षमता के व्यक्ति थे। इनमें से कुछ
तो अन्य राष्ट्रों में उच्च सरकारी पदों पर पहुँच गए। ये लोग यदि चाहते और
इस क्रान्ति मार्ग पर आरूढ़ न होते तो अपने देश में भी पर्याप्त यश, मान और
धन अर्जित कर सकते थे। फिर भी मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए उन्होंने
कष्टों और यातनाओं से भरे हुए मार्ग को ही चुना और अपने लक्ष्य के लिए
शहीद हो गए। हमारे देश के लिए यह कितनी वेदनात्मक स्थिति है कि आज
उनमें से अधिकांश का नाम भी हम नहीं जानते। यही नहीं, बल्कि जिन लोगों ने
विदेशों में रहते समय साहित्य रचना की, उनका प्रकाशित साहित्य भी हमारे
पास उपलब्ध नहीं है। अब पता लगा है कि श्री रासबिहारी बोस ने जापानी
भाषा में सात ग्रन्थ लिखे हैं। मौलवी बर्कतुल्ला, श्री वीरेन्द्र चट्टोपाध्याय, मैडम
कामा, श्यामजी कृष्ण वर्मा, ला० हरदयाल इत्यादि अनेकों ने भी समय-समय
पर ग्रन्थ, पुस्तिकाएं, लेख इत्यादि लिखे, इन लोगों ने अनेक पत्र भी निकाले,
पर आज भारतीयों के लिए उनमें से एक भी तो उपलब्ध नहीं है। भारत
सरकार चाहे तो अपने दूतावासों के द्वारा यह कार्य करा सकती है। अनेक
विदेशी राजनीतिक महानुभावों ने अपनी पुस्तकों में इन भारतीय क्रान्तिकारियों
का प्रसंगवश जो विवरण दिया है, हमारे दूतावास उनका संग्रह भी कर सकते
हैं, पर यह सब नहीं हो रहा और न इसकी मांग ही की जा रही है। शायद किसी
देश के लिए अपने देशभक्तों के प्रति कृतघ्नता की यह चरम सीमा है। इतिहास
की क्षति तो है ही।
विदेशों में भारतीय जासूस
अंग्रेज सरकार इन लोगों पर कितनी कड़ी नजर रखती थी, इसका एक
उदाहरण उर्दू के प्रसिद्ध लेखक काजी अब्दुल गफ्फार खां ने मुझे सुनाया था।
उन्होंने बताया कि एक बार वे डा० अंसारी और हकीम अजमल खां के साथ पेरिस
में थे। वहाँ किसी के द्वारा इन लोगों को सन्देश मिला कि श्री एम० एन० राय
की पत्नी एलेनराय इनसे भेंट करना चाहती हैं। भेंट सर्वथा गुप्त होनी थी, अतः
पेरिस के एक भारतीय मुस्लिम व्यापारी का घर इसके लिए निश्चित किया गया।
उस व्यापारी की क्रौकरी की एक बड़ी दूकान थी। भारत की स्वाधीनता और
राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रति उसकी निष्ठा देखकर ही उसका स्थान विश्वासपात्र
समझा गया। फिर भी सावधानी के लिए न तो उसे एलेनराय का नाम बताया
गया और न उसे वार्ता में सम्मिलित ही किया गया। इतना ही नहीं, बल्कि वार्ता
के समय उसके परिवार का कोई भी व्यक्ति मकान में नहीं था। निश्चित समय
पर एलेनराय आईं और वार्ता करके चली गईं। इसके पश्चात् ये लोग, (डा०
अंसारी, हकीम अजमल खां, काजी अब्दुलगफ्फार) टर्की गए। टर्की देखने की