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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 382, कुल 408 में से

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पृष्ठ 382

380 / बन्दी जीवन
अहमद बरेलवी अपने कई हजार साथियों को साथ लेकर कराची के रास्ते
अफगानिस्तान पहुंचे और फिर वहां से पेशावर की सरहद पर आकर राजा
रणजीतसिंह की सेनाओं से मोर्चा लेने लगे । सरहद पार बसे हुए पठानों से उनको
भारी सहायता मिली । किन्तु सय्यद अहमद को सफलता नही मिली । सन् 1831
में सिख फ़ौजों से लड़ते हुए वे मारे गए । इसके पश्चात् उनके साथी वही बस गए
और समय-समय पर सदैव, 1947 तक, ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध छुटपुट लड़ाई
लड़ते रहे ।
भारत में सन् 1857 के विद्रोह के समय इस दल ने अंग्रेजों के विरुद्ध बड़ा
सक्रिय भाग लिया था । किन्तु विद्रोह असफल हो गया और इस दल के कुछ नेता
अंग्रेजों के दमन से बचने के लिए मक्का चले गए । फिर भी दल का संगठन बना
रहा और उन्होंने स्थान-स्थान पर छोटे-छोटे मदरसे क़ायम करके अपना प्रचार
कार्य प्रारम्भ कर दिया । इसी प्रकार का एक मदरसा सहारनपुर जिले के देवबन्द
स्थान पर क़ायम किया गया और उसके प्रधानाचार्य ऐसे महानुभाव बनाये गए,
जो ग़दर में सक्रिय भाग ले चुके थे । उधर पठान इलाकों में बसे हुए इस दल के
विद्रोही बार-बार अंग्रेज़ी सीमा पर आक्रमण करते रहे और भारत-भर से उनके
लिए धन-जन की सहायता जाती रही । सन् 1860, 1862, 1865 में इस अपराध
में बहुत-से मुसलमान पकड़े गए और उनको फांसी तथा कालेपानी का दंड मिला ।
इस मुस्लिम क्रान्तिकारी दल मे निस्सन्देह धार्मिक उन्माद था क्योंकि इसकी
प्रेरणा का स्रोत मुस्लिम दर्शन और परम्पराएं थी । किन्तु उनमें हिन्दुओ के
विरुद्ध द्वेष नहीं था । तत्कालीन राजनीति धर्म पर ही आश्रित थी । बंगाल के
क्रान्तिकारी जिस प्रकार गीता से मातृभूमि के लिए बलिदान हो जाने की प्रेरणा
पाते थे और महाराष्ट्र के चापेकर बन्धु गो-भक्षकों से देश को मुक्त करने का
नारा लगाते थे, उसी प्रकार यह मुस्लिम क्रान्तिकारी भी 'जिहाद' के प्रचारक
थे । यह लोग हिन्दुस्तान को 'दार-उल-हर्ब' मानते थे, जिसके अनुसार प्रत्येक
मुसलमान का यह धार्मिक कर्तव्य हो जाता है कि या तो वह शासन के विरुद्ध
विद्रोह करे या देश का परित्याग कर दे ।
प्रथम विश्वयुद्ध और मुस्लिम क्रान्तिकारी
सन् 1884 मे मदरसा देवबन्द के प्रधान आचार्य शेख महमूदउलहसन बनाये
गए, जो 1857 के विद्रोह मे भाग लेने वाले श्री रसीद अहमद गंगोही के शिष्य
थे । इस समय देवबन्द का मदरसा इस्लाम के दर्शन की शिक्षा के लिए अन्तर्राष्ट्रीय
ख्याति प्राप्त कर चुका था और दूसरे मुस्लिम राष्ट्रों के बहुत-से युवक भी
देवबन्द में शिक्षा प्राप्त करने के लिए आने लगे थे । इन विदेशों से आनेवाले
विद्यार्थियों में अफ़गानिस्तान के विद्यार्थियों की संख्या अधिक होती थी । सरहद
पार बसे हुए पठान कबीलों के भी अनेक युवक देवबन्द में शिक्षा पाते थे । इन
अफगान और पठान युवकों के द्वारा शेख महमूदउलहसन ने अपने क्रान्तिकारी