बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
पृष्ठ 393, कुल 408 में से
संदर्भ में पढ़ेंकुछ पूरक तथ्य / 391
देखते थे । मलाया और बर्मा में उनके संगठन का पर्याप्त विस्तार हो गया था किंतु
कुछ भारतीयो ने गद्दारी करके सम्पूर्ण भेद अंग्रेज़ो को बता दिया और भारतीय
क्रान्तिकारी समय से पूर्व ही गिरफ्तार कर लिये गए । सेनाओं पर भी भारी दमन
किया गया, जो सर्वथा गोपनीय रखा गया । सैकड़ो सिपाही और अफ़सर चुप-
चाप मौत के घाट उतार दिये गए, जिससे उनकी छूत दूसरी फ़ौजों को भी न लग
जाय ।
मुखबिर कुमुदनाथ मुखर्जी
श्री शचीन्द्र ने इन गद्दारों में बैकोक के एक बगाली वकील साहब का उल्लेख
किया है किन्तु उनका नाम नही दिया है । पता लगता है कि इन बंगाली वकील
साहब का नाम कुमुदनाथ मुखर्जी था । यह वकील साहब जो किसी समय गदर पार्टी
के कार्यकर्ताओ से बडी देशभक्ति की डीगे हाँकते थे, उस रुपये को हजम कर जाने
की खातिर जो बैकोक के जर्मन कौसिल ने इनके द्वारा बगाल के क्रान्तिकारियों
को भेजा था, अंग्रेजों से जा मिले । उनके द्वारा शघाई, स्याम और बर्मा में होने-
वाली क्रान्तिकारी योजनाओं का आभास भारत सरकार को मिल गया और इसी-
लिए वह सब कुछ नही हो सका, जिसे श्री सिद्दीकी इत्यादि करना चाहते थे ।
पंजाब के कृपालसिंह की भाँति इन मुखर्जी ने सब गुड़गोबर कर दिया ।
बंगाल मे विद्रोह की तैयारी
रहस्योद्घाटन के भय से श्री शचीन्द्र यह बात भी बचा गए हैं कि जब उत्तर
भारत में श्री रासबिहारी और गदर पार्टी के सदस्य इतने विराट् विद्रोह की
तैयारी मे जुटे हुए थे, तब बगाल के क्रान्तिकारी क्या कर रहे थे ? श्री मन्मथनाथ
गुप्त ने अपनी पुस्तक 'भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का इतिहास' में एक अन्य
क्रान्तिकारी श्री पाकड़ासी की एक पुस्तक का निम्न उद्धरण दिया है, जो इस
सम्बन्ध मे पर्याप्त प्रकाश डालता है और यह प्रकट करता है कि बगाल मे उन
दिनों किस प्रकार की तैयारी चल रही थी। श्री पाकड़ासी लिखते हैं, 'नेतागण
ढाका से लेकर लाहौर तक विद्रोह की तैयारी में लगे हुए थे । ढाका मे उन दिनों
सिख सेना थी । लाहौर के षड्यन्त्रकारी सिख सैनिको ने ढाका के सिखों के साथ
सम्पर्क स्थापित करने के लिए परिचय पत्र भेज दिए । ढाका के क्रान्तिकारी नेता
अनुकूल चक्रवर्ती उन पत्रों को लेकर ढाका के सिख सैनिको से मिले ।... सिख
सैनिक विद्रोह की बात सुनकर शिरकत करने के लिए उत्सुक हो गए ।' ...
"मैमनसिंह और राजशाही के सुस्ल नामक जंगल में क्रान्तिकारी संध्या के
बाद क़वायद करते थे । आक्रमण और रणकौशल सीखने के लिए सब लोग प्रयास
करने लगे । जिलों में बंदूकें चुराने की होड़ मच गई । चारों तरफ़ अफ़वाह फैला
दी गई कि अब की बार मैट्रिक्यूलेशन और विश्वविद्यालय की दूसरी परीक्षाएँ