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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 381, कुल 408 में से

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पृष्ठ 381

कुछ पूरक तथ्य | 379
'हुज्जत-उल-बालिगा' में उन्होंने एक स्थान पर लिखा है, "यदि कोई जाति
सांस्कृतिक क्षेत्र में निरन्तर उन्नति करती रहे, तो उसका कला-कौशल श्रेष्ठता
की चरम सीमा को पहुँच जाता है। इसके पश्चात् यदि शासक वर्ग सुख और
विलास का जीवन व्यतीत करने लगता है तो उसका बोझ श्रमजीवी वर्ग पर इतना
बढ़ जाता है कि समाज का बहुसंख्यक भाग पशुओं-जैसा जीवन व्यतीत करने के
लिए विवश हो जाता है। ऐसी स्थिति में मानवता की सामूहिक संस्कृति नष्ट
हो जाती है और जब शक्ति के आधार पर उनको (श्रमजीवियों को) सामूहिक
संकट सहने के लिए विवश कर दिया जाता है, तो वे गधों और बैलों की भाँति केवल
पेट भरने के लिए श्रम करते हैं। जब मनुष्यता पर ऐसा संकट आता है, तो ईश्वर
मानवता को उससे मुक्ति दिलाने के लिए कोई-न-कोई मार्ग अवश्य खोल देता
है, यानी यह आवश्यक है कि ईश्वरीय शक्ति क्रान्ति के साधन उत्पन्न करके कौम
के सिर से ऐसे अवांछनीय शासन का बोझ उतार दे।"
"....तात्पर्य यह है कि मानव-समाज के सामूहिक जीवन के लिए आर्थिक
समानता अत्यन्त आवश्यक है। प्रत्येक मानव-समूह को एक ऐसी अर्थ-व्यवस्था
की आवश्यकता होती है, जो उसको जीवनोपयोगी वस्तुएँ देने के लिए ज़िम्मेदार
हो। जब मनुष्यो को अपनी आर्थिक आवश्यकताओं के प्रति सन्तोष होता है, तो
फिर वे अपने उस अवकाश के समय को, जो उनके पास जीविकोपार्जन से बच
जाता है, जीवन के अन्य भागों की उन्नति और सभ्यता तथा संस्कृति की दिशा में
लगाते हैं, जो मानवता के वास्तविक रूप हैं।"
भारत की हिन्दू-मुस्लिम जातियों के प्रति शासन की नीति की ओर संकेत
करते हुए शाह वलीउल्ला ने लिखा है, "राज्य की ओर से क़ानून एक प्रकार के
हों। उन क़ानूनों की पाबन्दी प्रत्येक जाति अपने-अपने आदर्शों के अनुसार करे।"
इसी प्रकार उन्होंने अपनी एक दूसरी पुस्तक में लिखा है कि भारत म छोटी-छोटी
प्रादेशिक सरकारें बन सकती हैं किन्तु उनका एक केन्द्र होना चाहिए, जो सम्पूर्ण
भारतवर्ष के हानि-लाभ को दृष्टि में रखकर नीति निर्धारित करे।
तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था और राजनीतिक स्थिति में यह विचार बहुत
ही मौलिक और क्रान्तिकारी थे, किन्तु कठिनाई यह थी कि उनका प्रचार केवल
मुसलमानों तक ही हुआ। उस समय अधिकांश शिक्षित व्यक्ति राजकीय सेवा में
थे, अथवा शिक्षण का कार्य करते थे। शेष व्यक्ति अनपढ़ और खेती के काम में
संलग्न थे। शाह वलीउल्ला एक मुस्लिम सन्त थे। अतः मुस्लिम जनता में ही
उनके विचारों का प्रचार प्रारम्भ हुआ। उनके शिष्यों में कुछ लोग इन विचारों
को कार्य रूप में परिणत करने के लिए अपना संगठन भी बनाने लगे। शाह
वलीउल्ला की मृत्यु के पश्चात उनके पुत्र शाह अब्दुल अजीज के समय इस संगठन
को अधिक मूर्त रूप मिला। धीरे-धीरे यह संगठन एक फ़ौजी संगठन-सा बन
गया। किन्तु इस फ़ौजी संगठन की पहली मुठभेड़ हुई, पंजाब के राजा रणजीत-
सिंह से, जो अंग्रेजों के हिमायती थे। शाह अब्दुल अजीज के एक शिष्य सय्यद-