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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 391, कुल 408 में से

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पृष्ठ 391

कुछ पूरक तथ्य / 389
में अफ़गानिस्तान की मदद करते हुए पाते हैं, तो हम समझ सकते हैं कि काबुल-
स्थित भारत के क्रान्तिकारी अभी तक अपने कार्य मे लगे हुए थे और इस आक्र-
मण की योजना में उनका महत्त्वपूर्ण हाथ था।
सन्धि
इस अवसर पर अंग्रेजो ने भारी कूटनीतिज्ञता दिखाई और अफगानिस्तान
सरकार की महत्त्वपूर्ण शर्तें स्वीकार करके समझौता कर लिया। इस आक्रमण के
समय अफ़गान फ़ौजों की कमान स्वयं जनरल नादिर खां कर रहे थे। यह आक्रमण
29 मई सन् 1919 को हुआ और 8 अगस्त, 1919 को अंग्रेजो की अफ़गानिस्तान
से सन्धि हो गई। इस सन्धि के सम्बन्ध मे ब्रिटेन के राजनीतिज्ञ आर्नल्ड टायनबी
ने कहा था, “अमीर ने अपनी पराजय के पुरस्कार मे, जो कुछ वह चाहता था,
पा लिया और भारत सरकार को अफ़गानिस्तान की परराष्ट्र नीति पर से, जिस
पर उसका चालीस वर्ष से अधिकार था, अपना हाथ हटाना पडा।” अंग्रेजो ने
अपनी ओर से इस सन्धि के समय एक यह शर्त भी अफगानिस्तान से स्वीकार
करा ली थी कि मौलवी उबेदुल्ला आदि को काबुल मे राजनीतिक कार्य नही करने
दिया जायगा। इस प्रतिबन्ध से विवश मौलवी उबेदुल्ला काबुल मे सभी प्रकार की
सुविधाएं होते हुए भी 22 अक्तूबर, 1922 को रूस चले गए। इस आक्रमण और
सन्धि ने उनके सम्मुख यह तथ्य प्रकट कर दिया था कि अफगानिस्तान जैसा छोटा
देश अंग्रेज सरकार के सम्मुख अधिक दिनो तक नही ठहर सकता।
बलूच और क्रान्तिकारी
श्री शचीन्द्र ने अपनी पुस्तक के द्वितीय भाग मे 'बर्मा की कहानी' शीर्षक
अध्याय के अन्तर्गत बलूच सेना के विद्रोह की झांकी दी है, जिसमें सैकड़ों बलूच
सैनिकों और उनके अफसरों को भारी दण्ड सहना पड़ा। इस संदर्भ में कई बातें
ध्यान मे रखने योग्य हैं। प्रथम तो यह कि बलूचिस्तान की सीमाएँ सरहदी पठानों
के प्रदेश की सीमाओं से लगी हुई हैं, जिनकी अंग्रेज विरोधी परम्पराओं और
भावनाओं पर हम ऊपर प्रकाश डाल चुके हैं। इसके अतिरिक्त मदरसा देवबन्द
के क्रान्तिकारियों का संगठन सिन्ध में भी था और वहाँ अनेक छोटे-छोटे मदरसे
इन लोगों ने स्थापित कर रखे थे, जिनके द्वारा निरन्तर अंग्रेज विरोधी प्रचार
होता रहता था। यह भी अब प्रकट हो गया है कि बर्मा में बलूच सेना ने जिस गदर
पार्टी के कार्यकर्ताओं के प्रोत्साहन पर विद्रोह किया था, उसी गदर पार्टी के अनेक
कार्यकर्ता ईरान के रास्ते बलूच प्रदेश की सीमा पर जा पहुंचे थे और उन्होंने
एक बड़े बलूच सरदार जिहान खां को अपनी ओर मिला लिया था। इन लोगों
ने इस बलूच प्रदेश में आजाद हिन्द सरकारी बनाई थी और बलूचियों की एक
सेना भी संगठित कर ली थी, जिससे अंग्रेज सेनाओं की अनेक झड़पें हुई थीं। इसके