सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 392, कुल 408 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 392

390 / बन्दी जीवन
बाद अंग्रेजों ने बलोचों के अमीर को अपनी ओर मिला लिया और फिर उसी ने
क्रान्तिकारी बलूच सेना पर आक्रमण किया । परिणामस्वरूप बलूच सेना भंग हो
गई और क्रान्तिकारियों को वहाँ से बड़ी कठिन स्थिति में भागना पड़ा । कुछ
क्रान्तिकारी अंग्रेजों के हाथों में भी पड़ गए, जो वहीं गोलियों से उड़ा दिये गए ।
इतिहासकारों के लिए यह अन्वेषण का विषय है कि ईरान-बलूचिस्तान की सीमा
पर होनेवाली इन हलचलों का बर्मा के बलूच-विद्रोह से कुछ सम्बन्ध था या नहीं।
अली अहमद सिद्दीक़ी
'बर्मा की कहानी' शीर्षक अध्याय में ही श्री शचीन्द्र ने अलीअहमद सिद्दीक़ी
के सम्बन्ध में भी कुछ पंक्तियां लिखी हैं। इन श्री अलीअहमद सिद्दीक़ी से सन्
1950-51 में इन पंक्तियों का लेखक भी मिला था। श्री सिद्दीक़ी उस समय इला-
हाबाद म्यूनिसिपैलिटी के वाटरवर्क्स विभाग में थे। उनसे बात करने पर मालूम
हुआ कि वे मैडिकल मिशन के साथ टर्की पहुँचते ही क्रान्तिकारी दल में दीक्षित
हो गए थे । श्री शुएब क़ुरैशी जो भोपाल के और बाद में बड़े प्रतिष्ठित राष्ट्रीय
मुस्लिम नेता बने, उसके सहयोगी थे । एक मजेदार बात उन्होंने यह बताई कि जब
वे कुछ ज़रूरी और गोपनीय काग़ज़ात लेकर मिस्र से भारत को चले, तो जर्मन
सरकार के एक गुप्तचर ने उनको चेतावनी दी कि भारत पहुँचते ही आप गिरफ़्तार
कर लिए जाएँगे । श्री सिद्दीक़ी इससे बड़े परेशान हुए, क्योंकि जो काग़ज़ात उनको
भारत पहुँचाने थे, उनको वे किसी भी प्रकार नष्ट नहीं करना चाहते थे और न
अंग्रेजों के हाथों में पड़ने देना चाहते थे । तभी जहाज़ में उनको एक मुस्लिम फ़क़ीर
मिला, जो प्रतिवर्ष भीख माँगने के लिए मलाया आदि देशों में घूमा करता था ।
श्री सिद्दीक़ी ने उस फ़क़ीर को समझाया कि यदि वह भारत में घूमे तो उसे अधिक
धन मिल सकता है । श्री सिद्दीक़ी ने उस फ़क़ीर को यह भी बताया कि ये एक
ज़रूरी काम से तुरन्त मलाया पहुँचना चाहते हैं, अतः फ़क़ीर यदि उनसे टिकट
परिवर्तन कर ले और उनका सामान भारत में उनके घर पहुँचा देने का वायदा
करे, तो वह उसके टिकट से मलाया चले जाएं और फ़क़ीर हिन्दुस्तान चला जाय ।
उन दिनों पासपोर्ट इत्यादि की कठिनाई थी नहीं, अतः फ़क़ीर शायद सामान के
लालच से तैयार हो गया और उसने टिकट बदल लिया । सिद्दीक़ी साहब ने काग-
ज़ात तो अपने पास रख लिए और अपना तमाम सामान फ़क़ीर के सुपुर्द कर दिया ।
इसके बाद वह मलाया जा पहुँचे । फकीर बम्बई पहुँचते ही गिरफ़्तार हो गया
और वर्षों पश्चात् जब सिद्दीक़ी साहब भारत के किसी जेल में थे, वह फ़क़ीर एक
राजनीतिक क़ैदी के रूप में ही सिद्दीक़ी साहब से मिला । क्रान्तिकारी आन्दोलन
के इतिहास में ऐसी मनोरंजक घटनाएँ भी अनेकों हुई हैं ।
श्री सिद्दीक़ी साहब ने बताया कि उनके दल में हिन्दू-मुस्लिम प्रश्न को कोई
स्थान नहीं था । सभी देश की स्वाधीनता के दीवाने थे और टर्की सरकार की राज्य
-शक्ति का सहारा पाकर भारतीय फ़ौजों के विद्रोह द्वारा अंग्रेजों से मुक्ति का स्वप्न

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित) · पृष्ठ 392, कुल 408 में से · SarvaKosh