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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 387, कुल 408 में से

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पृष्ठ 387

कुछ पूरक तथ्य / 385
सहयोग देने के लिए पर्याप्त धन भी दिया गया। परिणामस्वरूप काबुल में
अस्थायी आजाद हिन्द सरकार बनी, जिसके अध्यक्ष राजा महेन्द्रप्रताप, प्रधान
मंत्री मोलबी बर्कतुल्ला और उबेदुल्ला सिन्धी होम मिनिस्टर बनाये गए। इसी
समय लाहौर के कुछ मुसलमान विद्यार्थी इसी उद्देश्य से काबुल जा पहुंचे। इन
विद्यार्थियों को अस्थायी आजाद हिन्द सरकार में विभिन्न पद दिए गए। इन
विद्यार्थियों में से ही एक सज्जन जफ़रुलहसन उस समय (सन् 1919 में) जनरल
नादिर खां के प्राइवेट सेक्रेट्री थे, जब उन्होंने अफगानिस्तान सरकार की ओर से
भारत पर आक्रमण किया था और जिसके फलस्वरूप होने वाली सन्धि में काबुल
की वैदेशिक नीति पर से अंग्रेजों का नियंत्रण समाप्त हो गया था।
अमीर हबीबुल्ला खां का विश्वासघात
अमीर हबीबुल्ला खां ने वायदा किया था कि अस्थायी आजाद हिन्द सरकार
द्वारा भारत पर आक्रमण करने के साथ ही वे भी भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध की
घोषणा कर देंगे । किन्तु यह सब उनका छल था। उबेदुल्ला साहब के कथना-
नुसार भारतीय क्रान्तिकारियों के साथ मिलकर वे जितनी योजनाएं बनाते थे,
उन सबकी सूचनाएं अंग्रेज सरकार को भेजते रहते थे । अमीर के छोटे भाई नस-
रुल्ला खां और उनके लड़के अमानुल्ला खां तथा जमायते सियासिया के नेता
अवश्य हृदय से इनके साथ थे। काबुल के कमाण्डर इनचीफ जनरल नादिर खां की
सहानुभूति इनके साथ थी। इसी का यह नतीजा था कि अमीर हबीबुल्ला इनको
गिरफ्तार करने या इनका खुला विरोध करने का साहस नहीं कर सकते थे ।
टर्की सरकार से सम्पर्क
उबेदुल्ला काबुल में जब अस्थायी आजाद हिन्द सरकार का काम चला रहे
थे उस समय मौलाना महमूद उलहसन मक्का पहुंचकर टर्की सरकार से साजबाज
कर रहे थे। इसमे उनको बहुत कुछ सफलता भी मिली थी। उनको हेजाज के
तत्कालीन गवर्नर गालिबपाशा से एक पत्र प्राप्त हो गया, जिसका उल्लेख सिडीसन
कमेटी की रिपोर्ट में 'गालिबनामा' के नाम से किया गया है। गालिबपाशा का
यह पत्र संसार-भर के मुसलमानों के नाम था जिसमें उनको अंग्रेजों के विरुद्ध
हथियार उठाने के लिए उभारा गया था और मौलाना महमूद उलहसन को अपना
विश्वासपात्र बताते हुए उनके कार्य में धन-जन से सहायता करने की अपील की
गई थी। इस खत को मौलाना के एक साथी मुहम्मद मियां मन्सूर अंसारी मक्का
से हिन्दुस्तान लाए और उसकी नकलें हिन्दुस्तान व सरहदी कबीलों में बांटते हुए
काबुल जाकर उबेदुल्ला से जा मिले। इसी बीच मौलाना महमूद उलहसन को
रुपए की आवश्यकता हुई, तो हिन्दुस्तान से मौलाना मसूद नामक सज्जन कुछ
रुपया लेकर मक्का पहुंचे। मौलाना महमूद उलहसन उस समय मदीना चले गए
थे, अतः