बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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लोगों पर कड़ी नज़र रख रही थी और उसको कुछ सूचनाएं मिल रही थीं, अतः
मौलाना मसूद बम्बई में गिरफ्तार कर लिये गए। पुलिस ने उनको इतना सताया
कि वे बहुत-सी बातें उगल गए। उधर मक्का का हाकिम शरीफ हुसैन तुर्की सरकार
से विद्रोह करके अंग्रेज़ों से मिल गया। अंग्रेज़ों ने तुरन्त उसके द्वारा मौलाना महमूद
उलहसन और उनके साथियों को गिरफ्तार करवा लिया। युद्ध की समाप्ति तक
यह सभी लोग माल्टा में नजरबन्द रखे गए। इसके पश्चात् मौलाना महमूद उल-
हसन ने अनुभव किया कि गोपनीय कार्यों द्वारा राज्य क्रान्ति असम्भव है, अतः वे
कांग्रेस में सम्मिलित हो गए। इसी के अनुसार खान अब्दुलगफ्फार खां भी कांग्रेस
में आ गए। मुस्लिम विद्वानो की प्रमुख धार्मिक संस्था जमय्यत उल उलेमा जो
सदैव मुस्लिम लीग का विरोध करती रही और कांग्रेस के साथ रही, मौलाना
महमूद उल हसन के अनुयायियों द्वारा स्थापित हुई। प्रसिद्ध राष्ट्रीय मुस्लिम
शिक्षण संस्था जामिया मिल्लिया इस्लामिया की नीव भी मौलाना महमूद उल-
हसन ने ही रखी थी। मौलाना महमूद उलहसन का देहावसान 30 नवम्बर, 1920
को डा० अंसारी की कोठी पर दिल्ली म हुआ।
आज़ाद हिन्द सरकार के मिशन
काबुल की अस्थायी आजाद हिन्द सरकार उधर अपने काम मे लगी रही।
उसकी ओर से रूस सरकार के पास एक मिशन भेजा गया, जिससे उसका सहयोग
आजाद हिन्द सरकार को मिल सके। रूस के ज़ार के नाम जो पत्र भेजा गया था,
वह एक सोने की प्लेट पर था, जिसे गदर पार्टी के एक सदस्य डा० मथुरासिंह और
खुशीमुहम्मद लेकर गए थे। इस समय रूस के ज़ार की सरकार अंग्रेजो की सह-
योगी थी, अतः उसने मिशन को गिरफ्तार कर लिया, किन्तु ताशकन्द के गवर्नर
के हस्तक्षेप करने पर इन दोनों सदस्यों को वापस काबुल भेज दिया गया।
कुछ दिन पश्चात् आज़ाद हिन्द सरकार की ओर से फिर एक मिशन जापान
को और दूसरी टर्की भेजा गया। जापान जानेवाले मिशन में शेख अब्दुलक़ादिर
और डा० मथुरासिंह थे। और टर्की जानेवाले मिशन में अब्दुलबारी तथा डा०
शुजाउल्ला थे। ये दोनों ही मिशन गिरफ्तार करके अंग्रेज़ों के सुपुर्द कर दिये गए।
अंग्रेज़ इन चारों क्रान्तिकारियों को भारत ले आए। इन क्रान्तिकारियों में एक
अब्दुलबारी सर मुहम्मद शफी के रिश्तेदार थे। सरकार ने सर मुहम्मद शफी के
द्वारा इन लोगों पर यह जोर डलवाया कि अगर वे तमाम रहस्य लिखित रूप में
सरकार को प्रकट कर दें, तो उनको क्षमा प्रदान की जा सकती है। डा० मथुरा-
सिंह ने इसे अस्वीकार कर दिया तो वे 27 मार्च, 1917 को लाहौर जेल में फांसी
पर चढ़ा दिये गए। शेष व्यक्तियों ने सरकार की शर्त स्वीकार कर ली और सभी
विवरण अंग्रेज़ अधिकारियों को लिखकर दे दिया। सरकार ने इनको न केवल
क्षमा प्रदान की बल्कि इस देश-द्रोह के पुरस्कार में उनको उच्च पद पर नौकरियाँ
भी दे दीं।