बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
पृष्ठ 377, कुल 408 में से
संदर्भ में पढ़ेंकुछ पूरक तथ्य / 375
भारत में विद्रोह करने के लिए अपने अन्य साथियों सहित भारत आ गए ।
रासबिहारी बोस तथा शचीन्द्रजी के साथ काम किया और फिर गिरफ्तार होकर
पहले फाँसी की सजा पाई जो अपील मे आजीवन कालापानी हो गई । अमेरिका में
ही एक दुर्घटनावश उनका बायाँ हाथ कट गया, इसीलिए वे 'टुण्डालाट' के नाम '
मे भी प्रसिद्ध थे । अभी कुछ दिन पूर्व बाबा हरनामसिंह का स्वर्गवास हुआ है ।
बाबाजी ने अपने लेख मे लिखा है, "....पंजाब और बंगाल मे क्रान्ति प्रारम्भ
करने के लिए 21 फरवरी सन् 1915 की तारीख निश्चित हुई थी । बाबू रास-
बिहारी बोस लाहौर मे पंजाब पार्टी का नेतृत्व कर रहे थे । सरकारी मुखबिर
कृपालसिंह ने इस बात की खबर पुलिस को दे दी थी ।
लाहौर के एक मकान मे कृपालसिंह को किसी काम के लिए लाहौर छावनी
के एक रिसाले मे भेजा गया । कुछ साथियों को कृपालसिंह पर सन्देह हो जाने के
कारण उसके पीछे एक लड़का उसकी निगरानी के लिए रवाना किया गया । इस
लड़के ने तुरन्त आकर खबर दी कि कृपालसिंह मकान से सीधा लाहौर स्टेशन की
खुफिया पुलिस के दफ्तर मे गया है। वहाँ रिपोर्ट देकर वह छावनी गया और
उसी मकान पर लौट आया । उसके वापस आने से पहले मैं भी उस मकान पर
पहुँच चुका था और उसकी जासूसी की बात सुन ली थी । जब वह लौटकर आया
हम तीन आदमी वहाँ मौजूद थे । वह जाकर बेफिक्री से एक कुर्सी पर बैठ गया ।
हम तीनों मे उसे क़त्ल कर देने के लिए इशारे होने लगे । मकान में कुछ बम
और दो-चार रिवाल्वर मौजूद थे, लेकिन उनके चलाने से बाज़ार में धड़ाके का
डर था । हमने उसे गले में फन्दा डालकर मार डालने का निश्चय किया । इस
काम के लिए सिर्फ एक ही हाथ होने की वजह से मैं पहल नहीं कर सकता था ।
दूसरे साथी लाला रामसरनदास शारीरिक रूप से कमज़ोर थे । उनका हाथ
डालना ठीक भी न था । हमने तीसरे साथी भाई अमरसिंह राजपूत को पहल
करने का इशारा किया और हम दोनों मदद को तैयार थे । अमरसिंह तेईस-
चौबीस वर्ष का हट्टा-कट्टा जवान था। लेकिन कृपालसिंह पर हाथ डालने का
साहस उसे न हुआ । हम अंग्रेजी मे बातचीत नही कर सकते थे, क्योंकि कृपाल-
सिंह भी थोड़ी-बहुत अंग्रेजी समझता था। हमारे इशारों से वह चौकन्ना हो गया
और मेरे हाथ तथा अमरसिंह के भय ने उसकी जान बचा दी...।"
"जब अमरसिंह को फाँसी सामने लटकती नज़र आई तो उसने पुलिस की
शरण ले सरकारी गवाह बनकर जान बचाने की कोशिश की । उसने अपने बयान
में अमेरिका के शुरू के काम से लेकर आखिर तक की सारी कहानी पुलिस को
सुना दी । अमरसिंह अमेरिका में पार्टी का सरगर्म मेम्बर था। गदर केस में वह
मेरे साथ ही काम करता था। हिन्दुस्तान लौटते समय उसने भी बाकी मेम्बरों
की तरह आजादी या मौत का प्रण किया था। इसके अतिरिक्त उसका चाल-
चलन भी वहाँ बहुत अच्छा था, लेकिन प्राणों के भय से उसने अपने साथियों को
मौत के मुंह में धकेलकर अपनी जान बचाने की सोची ।"