बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
मुक्ति, हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का पुनर्गठन एवं बन्दी जीवन उपसंहार
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आदर्शों का संघर्ष
कामरेड एम० एन० राय के जो व्यक्ति देहली में मुझसे मिले थे उनसे मैं
कलकत्ते में फिर मिला। श्री कुतुबुद्दीन अहमद का नाम मैं पहले ही बता चुका हूँ।
कलकत्ता में उनके मकानात थे। मैं यह आशा करता था कि उनसे मुझे पैसे की
सहायता मिलेगी। इनकी सहायता से मैं चाहता था कि विदेश में मैं अपना आदमी
और अपना सन्देश भेजूँ। सन् 1914 के क्रान्तिकारी आन्दोलन की अभिज्ञता से
मुझे मालूम था कि बड़े पैमाने में अस्त्र-शस्त्र आदि के मँगाने की व्यवस्था किए
बिना क्रान्तिकारी आन्दोलन सफल नहीं हो सकता। एवं यह भी मैंने देखा था कि
पिछले आन्दोलन में हम लोगों ने विदेश में स्थित क्रान्तिकारी दलों के साथ कोई
सम्बन्ध स्थापित न करने से बहुत धोखा खाया। इन सब पिछली त्रुटियों को
दृष्टिकोण में रखते हुए अबकी बार विदेश में आदमी भेजने की मैंने यथेष्ठ चेष्टा
की, लेकिन कुतुबुद्दीनजी की सहायता से कोई सफलता प्राप्त नहीं हुई।
जिस रीति से क्रान्तिकारी दल के आदमी विदेश आया-जाया करते थे वह
आज पुलिस को मालूम हो गई है। उस रीति का अवलम्बन करके विदेश आना-
जाना बहुत कठिन हो गया है। जो बात पुलिस को मालूम है उसे जनता के सामने
रखने में कोई हानि नहीं है।
श्री कुतुबुद्दीन से पता चला कि वे अपने आदमी खलासी अथवा जहाज़ के
अन्य कर्मचारियों के रूप में भर्ती कराते थे, और विदेश आकर ये व्यक्ति जहाज़ से
उतरकर लापता हो जाते थे। मैंने भी सन् 1911 में एक बार अमेरिका भाग जाने
की निष्फल चेष्टा की थी।
सन् 1924 ई० के प्रारम्भ में थोड़े-से व्यक्ति रेगुलेशन 3 में नज़रबन्द कर
दिये गए थे। लेकिन मेरे कलकत्ता पहुँचने के बाद सरकार ने एक नये क़ानून के
अनुसार बड़ी संख्या में नौजवानों को गिरफ्तार कर लिया और अदालत में बिना
पेश किये ही उन्हें जेल में बन्द कर दिया। इसी सिलसिले में सुभाषबाबू भी
गिरफ्तार हो गए।
इसके पहले ही मैं देशबन्धुजी से मिल चुका था। उन्होंने हम लोगों को निय-
मित रूप से सहायता देने का वचन भी दिया था लेकिन अत्यन्त दुर्भाग्यवश यह
सहायता मिलने के पहले ही दासजी मुझसे अत्यन्त असन्तुष्ट हो गए थे। देश-
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वासियों से निवेदन नामक मेरे नाम से प्रकाशित एक पर्चे में देशबन्धुदास के क्रान्ति-
कारी-विरोधी सिद्धान्त का मैंने स्पष्ट शब्दों में युक्तिपूर्ण रीति से खंडन किया था।
इसी बात से वे मुझसे अत्यन्त रुष्ट हो गए थे। इस पर्चे के प्रकाशित होने के बाद
जब मैं उनसे मिलने के लिए उनके मकान पर गया तो उन्होंने मुझसे मिलने से
इनकार कर दिया। मैं समझ गया कि राजनीतिक-चालों से मैं नितान्त अनभिज्ञ
हूँ। कांग्रेसी नेतागण जब जी चाहे प्रकाश्य रूप से वक्तृता-मंच पर अथवा संवाद-
पत्रों में क्रान्तिकारी आन्दोलन की यथेष्ठ निन्दा करते हैं। उन्हें यह भलीभाँति
मालूम है कि क्रान्तिकारियों के लिए प्रकाश्य रूप में अपने पक्ष का समर्थन करने
का कांग्रेस नेताओं की तरह अवसर अथवा सुयोग प्राप्त नहीं है।
देशबन्धु सी० आर० दासजी ने गया कांग्रेस के सभापति के आसन से क्रान्ति-
कारी आन्दोलन के प्रति कुछ कटाक्ष किए थे। उन्होंने यह कहा था कि क्रान्तिकारी
आन्दोलन सफल नही हो सकता, इसलिए मैं क्रान्तिकारी आन्दोलन में योगदान नहीं
करता हूँ। उन्होंने यह भी कहा था कि यदि मेरी समझ में यह बात आ जाय कि
क्रान्तिकारी आन्दोलन सफल होगा तो मैं उसी क्षण इस आन्दोलन में शामिल हो
जाऊंगा। लेकिन उन्होंने अहिंसा नीति के आधार पर क्रान्तिकारी आन्दोलन का
विरोध नही किया। इसके प्रत्युत्तर में मैंने लिखा था कि जिस दिन सबको यह
प्रतीत हो जाएगा कि क्रान्तिकारी आन्दोलन सफल होने जा रहा है उस दिन तो
लाखो की संख्या में मनुष्य इस आन्दोलन में भाग लेने लगेंगे। उस दिन देशबन्धु
जैसे व्यक्ति इस आन्दोलन में भाग लेंगे या नही इसका विशेष महत्त्व नही रह
जाएगा। जिस देश मे विदेशी सरकार जब जैसा चाहे वैसा ही क़ानून बना सकती
है उस देश मे क़ानूनी लड़ाई लड़ना अथवा जिस देश में विदेशी सरकार पाशविक
बल से शासन करती है उस देश में बल का प्रयोग न करके स्वाधीनता के लिए
लड़ाई करना बातुलतामात्र है ऐसा मैंने उस पर्चे में लिखा था। मैंने यह भी बताने
की चेष्टा की थी कि क्रान्तिकारी आन्दोलन आतंकवाद नही है कारण यह कि
भारत मे किसी भी क्रान्तिकारी का यह विश्वास नहीं है कि केवल आतंकवाद से
ही स्वाधीनता प्राप्त हो सकती है। यदि सरकारी अत्याचारों के विरुद्ध इक्का-
दुक्का व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल का प्रयोग भी करते हैं तो उसका अर्थ नही हुआ
कि क्रान्तिकारीगण निरे आतंकवाद से ही स्वाधीनता की लड़ाई लड़ना चाहते हैं।
इसी प्रकार क्रान्तिकारी आन्दोलन के विरुद्ध आक्षेपों का उत्तर इस लेख में था।
मैंने अपने नाम से इस 'देशवासी के प्रति निवेदन' शीर्षक के पर्चे को छपवाया
था। कलकत्ता में प्रकाश्य सभाओं के अवसरों पर ये पर्चे बंटवाए थे। इस पर्चे ने
कलकत्ता में बड़ी खलबली मचा दी थी। यह पहला अवसर था कि भारतवर्ष में
किसी क्रान्तिकारी ने अपने नाम से प्रकाश्य गण्यमान्य नेता के विरुद्ध आन्दोलन के
समर्थन में आवाज़ उठाई थी।
इस पर्चे के कारण अनुशीलन समिति के दूसरे नेतागण मुझसे असन्तुष्ट हो
गए थे। मेरा अपना यह विश्वास था और अब भी है कि यदि क्रान्तिकारीगण
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जन-साधारण के सामने अपने मनोभावों को व्यक्त करते रहें, और देश की विभिन्न
परिस्थितियों में अपने स्वतन्त्र विचारों को दृढ़तापूर्वक जनता के सामने रखें तो
यह सम्भव हो सकता है कि क्रान्तिकारीगण भी जनता के हृदय पर अधिकार
स्थापन कर लें। अनुशीलन समिति के नेताओं में यह प्रवृत्ति नहीं थी।
मैं अनुशीलन समिति के जितने नेताओं के संस्पर्श में आया उससे मेरे मन
में यह धारणा हो गई थी कि उनके मानसिक उत्कर्ष उस प्रकार के न थे जिस
प्रकार यूरोप के क्रान्तिकारी नेताओं में पाये जाते हैं। लेकिन उनके अनुयायियों
में से ऐसे बहुत-से प्रतिभाशाली युवक थे जिनमें उपर्युक्त नेतृत्व गुणों का उन्मेष
था, किन्तु अनुशीलन समिति की कार्य-प्रणाली के कारण इन प्रतिभाशाली युवकों
को अपनी प्रतिभा के प्रयोग का अवसर नहीं मिल रहा है। क्रान्तिकारी आन्दोलन
की प्रथम अवस्था में थोड़ी आयु के बहुत-से नवयुवकों ने स्कूल कालेजों से पड़ना
छोड़कर योगदान किया था। रूस, आयरलैण्ड अथवा इटली में भी ऐसा ही
हुआ था। लेकिन उन देशों में एवं विशेष रूप से रूस देश में क्रान्तिकारियों ने अपनी
कार्य-प्रणाली, उद्यम एवं अध्यवसाय से अद्भुत मानसिक उत्कर्ष को प्राप्त कर
लिया था। रूस के क्रान्तिकारीगण जब तक पकड़े नहीं जाते थे तब तक राज-
नीतिक कार्यों में प्रचंड रूप से लगे रहते थे। उस समय उन्हें अपना मानसिक
उत्कर्ष प्राप्त करने का अवसर नहीं मिलता था। लेकिन पकड़े जाने पर जेलों में
उन्होंने अपने समय का अपने मानसिक उत्कर्ष साधन में अच्छा सदुपयोग किया।
हमारे देश में भी ऐसा ही हुआ है।
अनुशीलन समिति की कार्य-प्रणाली से बहुत-से उग्र मत वाले सदस्य असन्तुष्ट
थे। ये सदस्यगण ऐसे कार्यक्रम के पक्षपाती थे जिसमे जनता पर क्रान्तिकारी
आन्दोलन का यथेष्ट प्रभाव पड़े। इन लोगों ने अनुशीलन समिति के पुराने नेतृत्व
के विरुद्ध विद्रोह करके एक अलग कार्यक्रम बना लिया था। ये केवल गुप्त रीति
से षड्यन्त्र करके ही तृप्त नहीं होते थे। वे ऐसा काम करना चाहते थे जिससे
जनता मे क्रान्तिकारी भावना तीव्र रूप मे फैल जाए और उसे प्रतीत हो जाय कि
क्रान्तिकारी मार्ग से भारत को स्वतन्त्र करना सम्भव है। चिटागाँव के स्वर्गीय
सूर्यकान्त सेन इस दल के अग्रणी थे। चिटागाँव अथवा चटगांव में इनका पूरा
अधिकार था। परन्तु दूसरे बहुत-से जिलो मे भी इनके पक्ष के आदमी कई थे।
मैं भी अनुशीलन समिति के नेताओं की नीति से सन्तुष्ट नहीं था। पिछले
क्रान्तिकारी आन्दोलन के अनुभव से मैं यह समझ गया कि किसी आन्दोलन की
सहायता के लिए पर्याप्त रूप से उसके पक्ष में उपयुक्त साहित्य की सृष्टि करना
अत्यन्त आवश्यक है। हम लोगों ने क्रान्तिकारी आन्दोलन के पक्ष में साहित्य की
सृष्टि कहने योग्य कुछ भी नहीं की थी। इसके अतिरिक्त हमारी कार्य-प्रणाली
ऐसी नहीं होती थी कि जिससे जनसाधारण को हम क्रान्तिकारी मार्ग पर चलने
के लिए प्रोत्साहित कर सकते। गुप्त रीति से दो-चार पिस्तौल इकट्ठे किये या
कुछ बम बना लिए तो केवल इसी से देश को कैसे स्वाधीन किया जा सकता है !
आदर्शों का संघर्ष | 347
इटली के प्रसिद्ध क्रान्तिकारी नेता जोसेफ मेजिनी ने एक स्थान पर ऐसा भी कहा
है कि सैकड़ों सभाएँ अथवा पर्चे बाँटने की अपेक्षा एक क्रान्तिकारी बलवे से हज़ारों
गुना अधिक काम होता है। सम्भव है अंग्रेज़ी शब्दों के आधार पर जो उद्धरण
ऊपर दिया गया है उसमें मूल से कुछ थोड़ा-बहुत अन्तर हो, लेकिन उसके तात्पर्य
में कोई अन्तर नही है। इसके साथ-साथ यह भी निश्चित है कि मेजिनी 'यंग-
इटली' नामक जो पर्चा निकाला करते थे उसका साहित्यिक एवं क्रान्तिकारी
प्रभाव इटली के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा है। दूसरे देशों से ये पर्चे इटली
में आते थे। विदेशों में रहकर ही मेजिनी 'यंग इटली' का सम्पादन कार्य करते
थे। इटली में किसी व्यक्ति के पास इस पर्चे से निकलने पर उसे फाँसी का दण्ड
दिया जाता था। 'यंग इटली' के लेखों का संग्रह करके ग्रथित आज भी अंग्रेज़ी में
एक ग्रन्थ उपलब्ध है और उसे प्रत्येक शिक्षित व्यक्ति बड़े उत्साह के साथ पढ़ता
है और उससे लाभ उठाता है। उसकी नैतिक एवं साहित्यिक मर्यादा आज भी
पूर्ववत अक्षुण्ण है। इसकी तुलना में भारतवर्ष में राष्ट्रीय आन्दोलन या क्रान्ति-
कारी आन्दोलन के सम्पर्क में हम कुछ भी नहीं दिखला सकते। रूस के क्रान्तिकारी
आन्दोलन के प्रति दृष्टिपात करने पर भी हमें विदित हो जाएगा कि उपयुक्त
साहित्य की सृष्टि की दृष्टि से हमारा आन्दोलन कितना पिछड़ा हुआ था और अब
भी है। चीन में भी राष्ट्रीय क्रान्तिकारी आन्दोलन के सम्पर्क में लाखों की संख्या
में पर्चे एवं पुस्तिकाएँ बाँटी गई हैं। उस देश में भी नवीन आन्दोलन के सम्पर्क में
एक नवीन साहित्य की सृष्टि हुई है। केवल इतना ही नहीं, अपितु डाक्टर सन-
यातसेन आदि प्रमुख नेताओं ने चीन के दार्शनिक विचारों में भी महान् परिवर्तन
लाने की चेष्टा की थी। इसी प्रकार रूस के विप्लवी नेताओं ने भी विचार जगत्
में विप्लव मचा दिया था। भारत में भी श्री अरविन्द एवं स्वर्गीय स्वामी
विवेकानन्द, रामतीर्थ, दयानन्द, लोकमान्य तिलक जैसे महानुभाव नेताओं ने
दार्शनिक दृष्टिकोण से तीव्र जागृति पैदा की थी, एक नवीन दार्शनिक आन्दोलन
प्रबल रूप से प्रारम्भ कर दिया था।
इस स्थान पर मेरे कहने का इतना ही तात्पर्य है कि अनुशीलन समिति के
नेताओं में मैंने आधुनिक युगपयोगी मानसिक उत्कर्षता को नहीं पाया था।
और उनकी कार्य-प्रणाली मुझे पसन्द न थी, इसलिए उनके माथ मेरी पटती नहीं
थी।
उत्तर भारत में मैंने जो अपना कार्यक्रम और नियमावली छपवाई थी अनु-
शीलन समिति के नेताओं ने उसको कोई महत्त्व नहीं दिया। वे सब ऐसे कागज़ी
नियम क़ानून को देखकर हँसा करते थे। उन नेताओं में से अधिकांश आधुनिक
विचारधारा से नितान्त अनभिज्ञ थे। मैंने उन्हें बहुत समझाना चाहा कि मान
लीजिए पण्डित जवाहरलाल जैसे विचारवान व्यक्ति के पास हमें अपना कार्यक्रम
लेकर जाना पड़े तो हमारे पास युक्ति एवं शृंखलाबद्ध ऐसा कौन-सा कार्यक्रम है
जिसको लेकर हम उनके सामने सगौरव खड़े हो सकते हैं। 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन
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एसोसिएशन' ऐसा ही एक युक्तियुक्त प्रोग्राम है जिसे हम किसी भी चिन्तनशील
व्यक्ति के सामने सगौरव रख सकते हैं। लेकिन अनुशीलन समिति के नेताओं ने
उपेक्षा की हंसी हंसकर हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की नियमावली एवं
कार्यक्रम को एक तरफ उठाकर रख दिया। मैंने समझ लिया कि उनकी समझ
उक्त एसोसिएशन के आदर्श तक नहीं पहुंच पाई है।
इसके अतिरिक्त उन नेताओं के पास जनता के सामने रखने योग्य कोई
कार्यक्रम नहीं था। मैं चाहता था कि अब की बार इस प्रकार से कार्य किया जाय
जिससे जन-साधारण पर क्रान्तिकारी आन्दोलन का अमोघ प्रभाव परिलक्षित
हो। अनुशीलन समिति के नेतागण विरोधी थे। वे ऐसा कोई काम नहीं करना
चाहते थे जिससे जनता की दृष्टि क्रान्तिकारी आन्दोलन के प्रति आकृष्ट होती।
इसका कारण यह था कि वे पुलिस की दृष्टि को बचाना चाहते थे। वे ऐसा
समझते थे कि अभी ऐसा कोई काम करना उचित नहीं है जिससे पुलिस की
दृष्टि क्रान्तिकारी आन्दोलन के प्रति आकृष्ट हो जाय। वे चाहते थे कि तैरना
भी सीख जाएं और पानी भी न छूना पड़े। वे भूल गए थे कि राजनीतिक क्षेत्र
में ऐसा सम्भव नहीं है।
जैसाकि मैं पहले उल्लेख कर चुका हूँ देशबन्धुदासजी से मेरी बातचीत के
परिणामतः उन्हें यह प्रतीत हो गया था कि क्रान्तिकारी आन्दोलन समग्र उत्तर
भारत में प्रबल और विस्तृत रूप से बढ़ रहा है। और उसी समय एक भाषण में
दासजी ने सरकार को यह चेतावनी दी थी कि भारतवासियों की मांग को
अविलम्ब पूरा न करने से भारत में एक भीषण परिस्थिति उत्पन्न होगी क्योंकि
कांग्रेस के अतिरिक्त भारत के क्रान्तिकारीगण भी भीषण रूप से काम कर रहे
हैं। यदि गवर्नमेंट यह सोचती है कि क्रान्तिकारी आन्दोलन दब गया है तो यह
उसकी भारी भूल है। भारत में क्रान्तिकारी आन्दोलन दबा नहीं है। सरकार
को पता नहीं है कि यह आन्दोलन कितना उग्र रूप धारण करने जा रहा है।
यह भी मैं पहले ही बतला चुका हूँ कि इस व्याख्यान के बाद सरकार की ओर से
खुफिया विभाग के सुपरिटेण्डेण्ट श्री भूपेन्द्र चटर्जी को दासजी के पास भेजा गया
था। इस घटना के बाद दासजी से मेरी बातचीत हुई थी । दासजी के व्याख्यान
से सरकार को यह शंका हो गई थी कि कहीं महायुद्ध के समय की तरह फिर
क्रान्तिकारी आन्दोलन उग्र रूप धारण न कर ले। भूपेन्द्र चटर्जी दासजी से
यह जानना चाहते थे कि क्या उनकी धारणा में शीघ्र ही विप्लव मच सकता है।
दासजी क्यों ऐसा समझते हैं कि भारत में क्रान्तिकारी आन्दोलन उग्र रूप धारण
कर रहा है ? क्रान्तिकारियों के साथ दासजी का क्या और कहाँ तक सम्बन्ध है ?
दासजी के इस व्याख्यान से अनुशीलन समिति के नेतागण मुझसे असन्तुष्ट
हो गए थे। उनकी धारणा थी कि इस व्याख्यान से क्रान्तिकारी आन्दोलन को
विशेष धक्का पहुंचेगा। मैं समझता था कि इस व्याख्यान से क्रान्तिकारी भावनाओं
का खूब प्रचार होगा, इससे क्रान्तिकारी मार्ग पर कार्य करने के लिए विशेष
आदर्शों का संघर्ष / 345
सुविधा हो जाएगी ।
इस व्याख्यान के बहुत पहले ही देहली में कांग्रेस के विशेष अधिवेशन के
ठीक बाद ही कुछ व्यक्तियों को बंगाल में रेगुलेशन 3 के अनुसार गिरफ्तार कर
लिया गया था। मैं अपने साथियों से, अर्थात् अनुशीलन समिति के नेताओं से,
यही कहा करता था कि आप लोग सब यों ही विशेष क़ानून के अनुसार गिरफ्तार
हो जाएँगे काम कुछ होगा नही, मुफ्त में जेल काटेंगे और क्रान्तिकारी आन्दोलन
कम-से-कम कुछ दिनों के लिए तो दब ही जाएगा। इससे बेहतर है कि कुछ ऐसा
काम किया जाय जिससे जनता के सामने यह सिद्ध हो जाय कि अंग्रेजों की सामरिक
शक्ति के मुकाबले मे जनता में भी शक्ति-संचय करने की योग्यता है और
इससे भी बढ़कर एक और काम यह करना है कि जिससे भारतवासियों की विचार-
धारा में घोर क्रान्ति मच जाय । काग्रेस के नेतागण दिन-रात यही प्रचार किया
करते थे कि क्रान्ति के मार्ग से भारत को स्वाधीन करना सम्भव नही है । भारत
की जनता भी समझती है कि ब्रिटिश सरकार की सामरिक शक्ति के सामने
उसके पास कोई शक्ति नही है। यदि यह भावना सत्य है तो इसका अर्थ होत
है कि भारतवर्ष कभी भी अंग्रेजों की अधीनता से मुक्त नहीं हो सकता। इस
मानसिक अवस्था के रहते हुए क्रान्ति कैसे सम्भव है ? इस मानसिक दुर्बलता को
मिटाने के लिए हम लोगों को सर्वप्रथम आन्तरिक प्रयत्न करना पड़ेगा। ये सब
काम हम लोग करते नही । केवल गुप्त रीति से षड्यन्त्र करने से क्या बनेगा ।
लेकिन अनुशीलन समिति के नेतागणों को यह बात पसन्द नही थी। वे चाहते
थे संगठन फैल जाय, गुप्त रीति से बाहर से अस्त्र-शस्त्र मँगवाये जाएँ तब जाकर
दूसरे कामो में हाथ लगाया जाय । परन्तु संगठन का काम जारी रखना सरल
काम न था। स्थूल दृष्टि से किसी काम का सहारा न लेकर संगठन का कार्य
चलाना सम्भव नही है। सस्था के प्रत्येक व्यक्ति के लिए कुछ-न-कुछ काम होना
विशेष आवश्यक है। यदि किसी संस्था की ओर से प्रत्येक सदस्य के लिए उप-
युक्त काम नहीं दिया जा सकता तो वह संस्था उन्नति नहीं कर सकती। प्रत्येक
संस्था के यथारीति संचालन के लिए धन की विशेष आवश्यकता होती है। भारत
में क्रान्तिकारी संस्थाओं के लिए धन-संग्रह करना एक अत्यन्त कठिन समस्या थी
और बिना धन के कोई काम होना सम्भव न था। क्रान्ति के कार्य में पूर्ण समय
देनेवाले गृह-त्यागी सब प्रकार से निस्वार्थी एवं साहसी कार्यकर्ताओं के अलावा
दूसरों से विप्लव-कार्य चलाना सम्भव नही है। लेकिन प्रश्न यह है कि ऐसे
कार्यकर्ताओं का निर्वाह कैसे हो। फिर समग्र भारतवर्ष के प्रत्येक प्रान्त में ऐसे
कार्यकर्ताओं के सदा घूमते रहने का भी तो खर्च है। क्रान्तिकारी साहित्य का
प्रचार करना, पर्चे बाँटना, सामयिक पत्रादि का चलाना इन सब कामों के लिए
भी तो पैसे की आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त भारत के बाहर भी आना-जाना
है, विदेश से बडे पैमाने में अस्त्र-शस्त्र भी तो मँगाना है। इतना पैसा कहाँ से
आए ?
350 / बन्दी जीवन
कांग्रेस अथवा अन्य संस्थाओं के लिए तो रास्ता खुला है, उनके लिए प्रकाश्य
रूप से अर्थ मांगा जा सकता है। उन संस्थाओं के लिए पैसा देने में भी कोई भय
की बात नही है। क्रान्तिकारी आन्दोलन के लिए तो एक पैसा देना भी खतरे
की बात है। इस संकट मे पडने के लिए भारतवासी आज भी प्रस्तुत नही है।
ऐसी परिस्थिति मे क्रान्तिकारी आन्दोलन को कैसे सफल किया जाय।
दूसरे देश के क्रान्तिकारी आन्दोलन के विस्तृत इतिहास को पढ़ने पर भी
ठीक प्रकार से यह पता नही चला कि उन देशों मे उक्त समस्या का समाधान
वहां के क्रान्तिकारी कैसे करते थे। मैट्सिनी के जीवन मे ऐसा भी समय आया
था कि प्रत्येक इटैलियन से एक-एक रुपया माँगने पर भी मैट्सिनी को कुछ भी
नही मिला था। रूस की बोल्शेविक पार्टी की नीति के अनुसार डाका डालकर
अर्थ संग्रह क रना उचित नही समझा गया था तथापि लेनिन की अनुमति एव
अनुमोदन से स्टालिन के दल को डकैती द्वारा अर्थ-संग्रह करना पड़ा था। लेकिन
यह भी बात सत्य है कि आयरलैंड मे शीनफीन पार्टी के लिए प्रत्येक सदस्य चन्दा
दिया करता था। प्रधानतया इसी चन्दे मे दल का काम चलता था।
यदि हम लोग किसान और मजदूर आन्दोलन मे यथारीति भाग लिए होते
तो सम्भव था कि कुछ सीमा तक हमारा आर्थिक संकट निवारित हो जाता लेकिन
मजदूर अथवा किसान आन्दोलन के लिए जैसे व्यक्तियो की आवश्यकता होती है
वैसे हमारे पास अधिक सख्या मे न थे। मामूली कार्यकर्ता तो हमारे पास बहुत
थे परन्तु जिनमे उपयुक्त सगठन शक्ति हो जिनमे कुछ नियन्त्रण शक्ति हो
ऐसे व्यक्ति हमारे पास अधिक न थे। जितने व्यक्ति थे भी उन्हें हम लोगो ने
क्रान्तिकारी सगठन मे कार्य मे लगा रक्खा था। यदि मै फरार हालत मे न होता
तो मै यथा-रीति मजदूर आन्दोलन मे काम कर सकता था जैसा कि मैने जमशेदपुर
मे प्रारम्भ किया था। लेकिन फरार हालत मे ऐसा करना सम्भव न था। इन
सब बातो के होते हुए भी मजदूरो मे काम करने के लिए मैने अपने आदमी भेजना
प्रारम्भ कर दिया था। श्री एम० एन० राय के दल के आदमी उन व्यक्ति-विशेष
की सहायता से जिनसे देहली मे मेरा परिचय हुआ था। मैने अपने आदमी
कलकत्ते के आस-पास के मिलो मे भेजना प्रारम्भ कर दिया था। यदि मै कुछ
दिन और न पकड़ा जाता तो सम्भव था थोडे ही दिनो मे हमारे आदमी
मजदूर-आन्दोलन मे भी भली प्रकार से काम करने लगते और क्रान्तिकारी
आन्दोलन के साथ-साथ मजदूर आन्दोलन मे भी हमारा दल निपुण और योग्य
हो जाता। कलकत्ते से काँचडा पाडा इत्यादि स्थानो के आने-जाने का खर्च
श्री एम० एन० राय के साथी श्री कुतुबुद्दीन अहमद दिया करते थे। उन लोगो
ने मजदूरो मे जागृति फैलाने के लिए एक साप्ताहिक पत्र भी निकाला था। हमारे
आदमी इन पत्रो को मजदूरो मे बेचने के लिए मिलो और कारखानो मे ले जाते
थे। लेकिन क्रान्तिकारी आन्दोलन के कार्य मे सहायता देने के लिए कुतुबुद्दीन
साहब तैयार न थे।
आदर्शों का संघर्ष / 351
क्रान्तिकारी आन्दोलन के लिए अर्थ-संग्रह करना एक अत्यन्त कठिन समस्या
थी। अनुशीलन समिति के नेतागण इस बार डाका डालकर अर्थ-संग्रह करने के
अत्यन्त विरोधी थे। कारण यह कि ऐसा करने से वे समझते थे कि क्रान्तिकारी
आन्दोलन को धक्का लगेगा, पुलिस सचेत हो जाएगी, और इस प्रकार संगठन-
कार्य पूरा होने के पहले ही इतनी बाधाएं उपस्थित होंगी कि शान्ति से काम
करना कठिन हो जाएगा। उस समय मैं इन लोगों की राय से सहमत नही हो
सका। मैं यह समझता था कि बलपूर्वक अर्थ सग्रह करने की नीति के कारण हम
लोगो मे छापामार युद्ध (गोरीलावार) चलाने की शक्ति उत्पन्न होती जाएगी
और अर्थ का सग्रह भी होगा तथा सगठित रूप से सकटपूर्ण कार्यं में हाथ बटाने
का अभ्यास भी होता जाएगा। अपने आदमियों मे कौन साहसी है, किसमें
कितनी त्याग की भावना है, सकट का सामना करने के लिए कितने व्यक्ति प्रस्तुत
हैं इन सब बातो का ठीक-ठीक पता चलता रहेगा। परन्तु मैं ग्रामीणों के घर मे
डाका डालने का पक्षपाती न था। अनुशीलन समिति के नेतागणों की नीति को
न मानकर मैं कलकत्ता के निकटस्थ बड़े-बड़े अंग्रेज़ मिल मालिको के रुपयों पर
हाथ डालने का प्रबन्ध करने लगा था। उनको भी यह बात मालूम थी। इसी
समय मै बम्बई और पजाब मेल ट्रेन के डाक के डिब्बे पर छापा मारने की तैयारी
कर रहा था। इसके अतिरिक्त क्रान्तिकारी नीति पर भी मैं एक लेख लिख रहा
था। मैं चाहता था कि अपने दल की ओर से जनता की जानकारी के लिए
क्रान्तिकारी आन्दोलन के कार्यक्रम को स्पष्ट शब्दों में खोलकर रख दिया जाय।
यदि प्रकाश्य रूप से कोई सामयिक पत्र चलाने का अवसर हमे प्राप्त नहीं है तो
कम-से-कम गुप्त रीति से पर्चे बँटवाने की व्यवस्था तो हमें अवश्य ही करनी
चाहिए। अनुशीलन समिति के नेतागण मेरी इन नीतियों के घोर विरोधी थे।
कलकत्ता मे आकर अनुशीलन समिति की सहायता न लेते हुए स्वतन्त्र रूप
मे मैं लोकसग्रह के कार्य मे जुट गया था। इसी प्रकार मैंने कुछ लोग इकट्ठे किए
जो कि यूनिवर्सिटी ट्रेनिंगकोर मे सामरिक शिक्षा पा रहे थे। ये सब कालेजों के
लड़के थे। इनमे दो एक इंजीनियरिंग कालेज के लड़के भी थे। इन लोगों की
सहायता से श्री सुशीलकुमार बैनर्जी नामक एक अच्छे कार्यकर्ता से मेरा परिचय
हो गया। ये पहले ही अनुशीलन समिति के सदस्य बन चुके थे। एक दिन मैंने
श्री सुशीलकुमार के साथ रास्ते पर चलते हुए कुछ नौजवानो को कांग्रेस-कार्य
करने मे तत्पर देखा। इनमे से एक के प्रति मेरी दृष्टि विशेष रूप से आकृष्ट,
हुई। ये साँवले रंग के थे। आयु लगभग बीस वर्ष की होगी। मैंने सुशील बाबू से
कहा कि मैं इस युवक से परिचित होना चाहता हूँ। सुशील बाबू ने कहा कि मेरी
भी निगाह इस पर लगी हुई है परन्तु इसके कुछ ऐसे मित्र है जो हमारी समिति
में नही है। मैने कहा कि अब देर करने की आवश्यकता नहीं है। सुशील बाबू कुछ
देर करना चाहते थे लेकिन मैंने कहा कि मैं आज ही उनसे मिलना चाहता हूँ।
उस दिन तो नही, परन्तु दो-एक दिन के अन्दर ही उनसे मेरा परिचय हो गया।
352 / बन्दी जीवन
इनका नाम था श्री यतीन्द्रनाथ दास। यह ही युवक बाद को सरदार भगतसिंह
के साथ लाहौर षड्यन्त्र के मामले में गिरफ्तार हुआ था और यही भारतवर्ष का
सबसे पहला व्यक्ति था जिसने भूख हड़ताल करके राजनैतिक बन्दियों की मांग
पूरी कराने में अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। प्रधान रूप से इन्हीं बलिदान के
परिणामस्वरूप भारतवर्ष में राजनैतिक बन्दियों के साथ विशेष करके क्रान्ति-
कारी आन्दोलन के सम्पर्क में कैद किए गए व्यक्तियों के साथ ब्रिटिश भारत के
जेलों में अच्छा बर्ताव होने लगा था। आज इस पुरानी बात का स्मरण करते
समय मुझे ऐसी इलाघा का अनुभव होता है कि मैंने उस दिन किसी आदमी को
ठीक-ठीक पहचाना था। राह चलते हुए जिस युवक के प्रति कोई एकाएक आकृष्ट
हो गया हो और वही युवक बाद को यतीन्द्रनाथदास हुआ हो इस बात से किसे
इलाघा का अनुभव न होगा ?
अर्थ-संग्रह करने के काम के लिए मुझे कुछ अस्त्रों की आवश्यकता थी।
युक्तप्रान्त और पंजाब मे मेरे पास कुछ अस्त्र थे लेकिन मैं उन्हें बंगाल मे नही
मँगाना चाहता था। इधर अनुशीलन समिति के नेतागण मुझे अस्त्र-शस्त्र की
सहायता देने के इच्छुक न थे। मैंने देखा कि अनुशीलन समिति के नेताओं से मेरी
पट नहीं रही है। अनुशीलन समिति के नेताओ ने भी देखा कि मैं भी अपनी नीति
से हटनेवाला व्यक्ति नही हूँ। अन्ततः ऐसा ठहरा कि मैं दो-एक महीने तक और
ठहर जाऊँ और अपनी नीति को कार्यरूप में परिणत न करूँ। इस बीच में वे
लोग जाली नोट बनाने का काम करेंगे क्योकि उन्हें आशा है कि उन्हें इस काम
में सफलता प्राप्त होगी। इस प्रस्ताव के अनुसार थोड़े दिनों के लिए शान्त
रहना मैंने स्वीकार कर लिया। लेकिन मैं यह अच्छी तरह से जानता था कि नोट
बनाने के कार्य में वे सफल नहीं होंगे। अब तक दो-तीन नोट मेरे पास आए परन्तु
वे बहुत ही खराब थे, वे नोट बाज़ार में चल नही सकते थे। मैंने शान्त रहना
तो स्वीकार कर लिया लेकिन अपने कार्य की तैयारी स्थगित नही की। जिस
मिल में डाका डालना था वहाँ की स्थिति को पूर्ण रूप से समझने के लिए मैंने
अपने आदमी भेजे एवं उनकी रिपोर्टों की जाँच करने के लिए मैं स्वयं उन स्थानों
पर गया। किस रास्ते से जाना है, कैसे लौटना है, किन मोकों पर किराए के
मकान लेना है, डकैती के बाद किस मौके पर अपने अस्त्र-शस्त्रादि को छोड़ देना
है, कहाँ पर मोटरकार जा सकती है, और कहाँ पर रुपयों को लाकर रखना है,
इन सब कामों के लिए कितने व्यक्तियों की आवश्यकता है, किस मिल में कितना
रुपया मिल सकता है, पंजाब अथवा बम्बई मेल को किस स्थान पर रोका जाएगा,
फिर वहाँ से कैसे हम लोग छापा मारने के बाद भागेंगे, इन सब बातों की जाँच
हुई और प्रबन्ध होने लगा।
इधर मुझे सन्तुष्ट करने के लिए एव मेरी नीति और अनुशीलन समिति के
दूसरे नेताओं की नीतियों में समझौता कराने के लिए एक मीटिंग हुई। बहरमपुर
बंगाल का एक प्रसिद्ध जिला है। मुसलमानों के समय में यह जिला मुर्शिदाबाद
आदर्शों का संघर्ष / 353
के नाम से प्रसिद्ध था। मुर्शिदाबाद और बहरमपुर पास-पास हैं जैसे कि पटना
और बाँकीपुर। मुझे कलकत्ते से बहरमपुर जाना था। हावड़ा और सियालदह के
स्टेशनों पर पुलिस की कड़ी निगरानी थी। लेकिन मेरा जाना तो आवश्यक था
ही। इसलिए कलकत्ते से बारह-चौदह मील दूर एक छोटे-से स्टेशन से ट्रेन पर
सवार हुआ और बहरमपुर न उतरकर उसके पहले ही एक अन्य स्टेशन पर उतर
गया। ऐसे आने-जाने के अवसरों पर थोड़ी-सी भूल के कारण गिरफ्तार हो जाना
सम्भव था। मेरे कई साथी इसी प्रकार गिरफ्तार हो चुके थे। एक सुप्रतिष्ठित
साम्राज्य के विरुद्ध लड़ाई लड़ने की तैयारी करना असाधारण कठिनाई और
संकट से पूर्ण है। इन्हीं सब बातों को देखते हुए हमारे देशवासी राष्ट्रीय षड्यन्त्रों
के मामलों में लिप्त होने में इतने हिचकिचाते हैं। इतिहास के दृष्टान्तों से उन्हें
कोई संकेत नहीं मिलता। कैसर के सुप्रतिष्ठित सुदृढ़ साम्राज्य के विरुद्ध जर्मनी
के क्रान्तिकारियों ने सफलतापूर्वक विद्रोह किया इस बात से उन्हें कोई प्रोत्साहन
नहीं मिलता, आयरलैंड ने ब्रिटेन के नितांत समीपवर्ती होने पर भी उनके विरुद्ध
विद्रोह किया, इससे भी हमारे देशवासियों को कोई शिक्षा नही मिलती। रूस में
भी राज्यक्रान्ति हो गई लेकिन फिर भी हमारे देशवासी समझते हैं कि ब्रिटिश
साम्राज्यशाही के विरुद्ध विद्रोह करने की कल्पना करना भी वाचालतामात्र है।
पता नही हम लोगों को यह सनक कैसे सवार हुई।
बहरमपुर की मीटिंग में हम लोगों का कोई समझौता नही हो पाया। बहुत
वितण्डावाद के बाद मैने अनुशीलन समिति के नेताओं को साफ-साफ बतला दिया
कि यदि वे लोग उग्र कार्यक्रम की नीति को स्वीकार नही कर सकते हैं तो मैं उत्तर
भारत में अर्थात् संयुक्त प्रांत और पंजाब में अपनी नीति के अनुसार कार्य करना
प्रारम्भ कर दूंगा। यदि उन लोगों को यह नीति स्वीकृत नही है तो मैं विवश हूँ।
आर्डिनेंस तो जारी होने ही वाला है। जेलो मे हम लोगों को सड़ना ही है। कुछ
काम करके क्यों न जाएँ। देशबन्धुदासजी की वक्तृता के पहले से ही कलकत्ते में
जोरों की अफ़वाह फैली हुई थी कि डिफेंस आफ इण्डिया ऐक्ट की तरह एक
नया काला क़ानून आर्डिनेंस के रूप में जारी होनेवाला है। दासजी की वक्तृता
के थोडे ही दिन बाद आर्डिनेन्स जारी हो गया था। दासजी की वक्तृता न भी
हुई होती तो भी यह क़ानून जारी अवश्य होता इसमे कोई सन्देह नही। इसकी
तैयारी पूरी तरह से हो रही थी। यह बात सबको मालूम थीं। मेरी दृढ़ता को
देखकर अनुशीलन के नेतागण कुछ विचलित हुए और उन्होंने यह कहा कि पर्चे
बाँटने व छपवाने का काम अभी आरम्भ कीजिए नोट बनाने की परीक्षा समाप्त
होने तक डकैती का काम स्थगित रखिए। पर्चे बाँटते समय केवल इस बात पर
ध्यान रखना है कि जिन स्थानों में उनके नेताओं के केन्द्र हैं उन स्थानों में ऐसा
कोई काम न होना चाहिए जिससे पुलिस की दृष्टि उन स्थानों पर आकृष्ट हो
सके। मैंने इसे भी स्वीकार कर लिया।
इसके बाद मैमनसिंह जिले के एक गांव में हमारे दल के सब नेताओं की एक
354 / बन्दी जीवन'
बैठक हुई। बहरमपुर के दो-तीन नेताओ के अतिरिक्त और कोई उपस्थित न
था। मैमनसिंह की बैठक में लगभग आठ नेता उपस्थित थे । इस सभा में मैंने
हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की नियमावली सबको दिखलाई इसे देखकर
उन नेताओं के मन में परस्पर कुछ विरोधी भावनाओ की उत्पत्ति हुई। यह मेरा
अनुमान है क्योंकि उन सबों ने इस नियमावली की प्रशंसा भी की थी और साथ
ही यह भी कहा था कि इस प्रकार की लिखित नियमावली की कोई आवश्यकता
नहीं है। जिन सिद्धान्तो के आधार पर यह नियमावली बनाई गई थी मेरी समझ
में उन तक इन लोगो में से किसी की पहुँच न थी। कम्यूनिज्म की नीति से ये
लोग बहुत कुछ अपरिचित थे। बड़े पैमाने में विप्लव की आयोजना के स्थान पर
इन लोगों ने अभी तक केवल आतंकवाद को ही सबसे अधिक महत्त्व दिया था।
आज सन् 1939 ई० में बंगाल की अनुशीलन समिति की यह नीति निर्धारित हुई
है कि अपने दल के स्वतन्त्र अस्तित्व को स्थिर रखने हुए वह दल कांग्रेस समाज-
वादी दल में पूर्ण रूप से सम्मिलित हो जाय। अर्थात् कम्यूनिज्म की नीति को वह
दल आज अपनाना चाहता है तथापि कम्यूनिस्ट पार्टी में सम्मिलित होना वह
उचित नहीं समझता। इसमे यह अनुमान करना स्वाभाविक है कि या तो अनु-
शीलन समिति कम्यूनिज्म के सिद्धान्त को ठीक-ठीक ग्रहण नही कर पाया अथवा
यह बात है कि उसने कम्यूनिज्म के सिद्धान्त को जान-बूझकर ग्रहण नहीं किया।
कम्यूनिस्ट सिद्धान्त को यथार्थ रूप से ग्रहण कर लेने पर कम्यूनिस्ट पार्टी में
सम्मिलित हो जाना स्वाभाविक है। इसमे और भी बहुत-सी बातें हैं जिनकी
आलोचना इस स्थान पर करने की आवश्यकता नही है। यहाँ पर मैं केवल
इतना ही बतलाना चाहता हूँ कि आज जैसे अनुशीलन समिति के नेतागण
समाजवाद के सिद्धान्तों को कुछ सीमा तक ग्रहण कर रहे हैं। मैमनसिंह की
मीटिंग के अवसर पर हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की नीति में समाजवाद
के जितने सिद्धान्त ग्रहण किये गए थे उन्हें वे उस समय नही ग्रहण कर पाए
थे।
मैमनसिंह की मीटिंग रात-भर होती रही लेकिन मेरी समझ मे उस मीटिंग
में किसी विशेष महत्त्वपूर्ण बात का निर्णय नहीं हो पाया था। कुछ समय तक मैंने
उन लोगों की बातचीत में सहर्ष भाग लिया परन्तु जब मैने देखा कि बात मे बात
बढ़ जाती है और काम की बात कुछ नही हो पाती तो मैंने और अधिक बातचीत
करना उचित नहीं समझा। ऐसा मालूम पड़ता था कि राजनैतिक परिस्थितियों
से कैसे लाभ उठाया जा सकता है, उन परिस्थितियों के अन्तराल में कौन-कौन-
सी शक्तियाँ प्रबल रूप से कार्य कर रही हैं, भविष्य मे इन परिस्थितियों के रूप
कैसे पलटा खाएँगे, जनसाधारण के सामने किस प्रकार अपने सिद्धान्तों को रखना
आवश्यक है जिससे भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन का रुख बदल जाय एवं जनसाधा-
रण प्रकाश्य नेताओं के नेतृत्व की अपेक्षा क्रान्तिकारियो के निर्देशों का प्रभाव
अधिक परिलक्षित हो सके, इन सब बातो का मर्म अनुशीलन समिति
आदर्शों का संघर्ष / 355
के नेतागण उपलब्ध नहीं कर पाए थे। क्रान्तिकारी आन्दोलन में ऐसे व्यक्तियों
का नितान्त अभाव होने के कारण भारतीय राजनीति पर उस आन्दोलन का
उतना प्रभाव नहीं दिखाई पड़ा जितना कि उचित रूप से पड़ना चाहिए था।
मैमनसिंह की मीटिंग में बंगाल, युक्त प्रान्त एवं पंजाब के संगठन का समस्त
कार्यभार मेरे ऊपर छोड़ दिया गया।
वर्षार्ऋतु का अभी अवसान नहीं हुआ था। वायुमंडल वाष्प-भार से
क्लान्त हो रहा था। प्रकृति में तरी के आधिक्य के कारण मनुष्यों के मन नीरस
हो रहे थे। ग्रीष्म ऋतु के अन्त में जैसे नव-नीरद दल को देखने के लिए मनुष्य
तरस जाते हैं वर्षा ऋतु के अन्त में वैसे ही वे नीरद जल से ऊबकर निर्मल
आकाश में सूर्य का प्रकाश देखने के लिए चंचल हो उठते हैं। उत्तर भारत के
निवासियो के लिए तो यह एक साधारण बात है। परन्तु वर्षा ऋतु के अन्त मे
बंगाल एवं विशेष करके पूर्व बंगाल सदा स्नेहार्द्र सजल तटभूमि और जलाशयों के
ऊपर अममान आवाम-स्थानों को देखकर उत्तर भारत के निवासी विस्मय पुल-
कित हो जाते है और व्याकुल भी हो उठते हैं।
पूर्व बंगाल मे जितनी नदियां है भारतवर्ष-भर मे इतनी और कही नही
मिलेगी। मानो उस देश की नदियों का जाल बिछा हुआ है पूर्व बंगाल में जितने
स्टीमर चलते है उतने भारतवर्ष-भर मे और कही नही। वर्षा ऋतु में तो स्टीमर
और नावों की सहायता के बिना कही भी आना-जाना सम्भव ही नही।
नौका पर यात्रा की शोभा एवं उसके सकटो का कुछ भी आभास इन लेखों
से नही मिल सकता। भाषा की परिपाटी से कल्पना का उद्रेक हो सकता है।
परन्तु कल्पना और वास्तविकता मे आकाश पाताल का अन्तर है। नदी के किनारे-
किनारे नौका चल रही है। इतने में पास से स्टीमर निकल गया। स्टीमर के
अधिक समीप रहने में नौका को अत्यन्त खतरा रहता है। और अधिक दूरी पर
रहने से भी स्टीमर के निकलने से जो उत्ताल तरंगें उत्पन्न होती हैं उनका सामना
करना पड़ता है। पूर्व बंगाल के नाविकों को इस बात का बहुत ध्यान रहता है।
नौका के पार्श्व में तरंगों का आघात होने से उसके उलट जाने की विशेष सम्भा-
वना रहती है। इसलिए खवैये तरंगों को आते हुए देखकर अपनी नावों के सम्मुख
भागों को उन तरंगों की ओर मोड़ देते हैं एवं इस प्रकार से नावों को चलाते हैं
कि दोलायमान होने पर भी उनके उलटने की संभावना बहुत कम रह जाती है।
वैशाख के महीने मे तो इतनी आँधियाँ आती हैं कि नौका पर यात्रा करना
भयप्रद होता है। नावें अक्सर पाल लगाकर चलती हैं और जरा-सी भूल के कारण
एक झोके से ही वे उलट सकती हैं। पालों का उपयोग करने में पूर्व बंगाल के
नाविक बहुत ही अनुभवी होते हैं। शहर की सड़कों पर जिस प्रकार इक्के-तांगे
तथा मोटरों के आपस में लड़ जाने की मदा आशंका बनी रहती है उमी प्रकार
पूर्व बंगाल में नदियों पर नावों के आपस में लड़ जाने की सदा आशंका बनी
रहती है। जैसे शहरों में सड़कों के चौराहे होते हैं उसी प्रकार पूर्व बंगाल में
356 / बन्दी जीवन
नदियों के भी चौराहे होते हैं। बंगाल में इन्हें मोहाना कहते हैं। ऐसे जोहानों
पर नावों के लिए खतरा रहता है। किसी-किसी मोहाने के लिए नाविकों में ऐसी
किंवदन्तियां प्रचलित हैं कि अमुक स्थान पर प्रायः नावें डूब जाती हैं। उन
स्थानों से गुजरते समय पूर्व बंगाल के मुसलमान नाविकगण भी नदियों की देवियों
की प्रार्थना करने लगते हैं। पूर्व बंगाल के प्रायः सभी मल्लाह मुसलमान होते हैं।
परन्तु संकट के समय देव, देवी, जिन्द आदि के भी वे पुजारी बन जाते हैं।
इंग्लैण्ड के प्रसिद्ध ऐतिहासिक वक्ल साहब का कहना है कि समुद्र और नदियों
में प्रकृति के निष्ठुर एवं अनियमित आचरणों के कारण नाविक में कुसंस्कार की
मात्रा अत्यन्त अधिक होती है। संभव है इस सिद्धान्त में कुछ सत्यता हो।
मैं वर्षा ऋतु के अन्त में नाव पर मैमनसिंह आया था एवं इसके पहले भी
मुझे पूर्व बंगाल एक-आध दफ़े आना पड़ा था। इन अवसरों पर पूर्व बंगाल के
नौका-रोहण के रहस्य से कुछ-कुछ परिचित हुआ था। नौका पर चलते हुए किसी-
किसी मोहाने पर नाविकों की मानसिक उत्कंठा को देखकर हमारे मन में भी एक
मानसिक उद्वेग उत्पन्न हो जाता था कभी-कभी ऐसे अवसरों पर यह शंका उत्पन्न
हो जाती थी कि ब्रिटिश पुलिस के निर्यातन से तो छुटकारा पा गए परन्तु अब
इन नदी-देवियों के हाथ से निष्कृति पाना दुष्कर है। मल्लाहों एवं यात्रियों में बात-
चीत होने लगती है कि कब-कब इन स्थानो पर कौन-कौन मल्लाह किन-किन
यात्रियों को लेकर नदी गर्भ में विलुप्त हो गए थे। ऐसी परिस्थिति में कुसंस्कार
विमुक्त साहसी पुरुषों के हृदयों में भी मुहूर्त-भर के लिए तो एक अव्यक्त शंका
उपस्थित हो ही जाती है। मुंह से तो हँसते रहते हैं और मूढ़ जनता के कुसंस्कारों
पर अवज्ञा, उपहास एवं अवहेलना की कृपा दृष्टि डालते हैं और अपने को उनसे
श्रेष्ठ समझते हैं परन्तु हृदय के गुप्त कन्दर में एक अनिर्देश्य भय बना रहता है
कि कहीं डूब न जाएँ। कभी-कभी आकाश-मण्डल में जब काले-काले घने बादल
दिखाई देने लगते हैं तो भी मन में कुछ कम शंका पैदा नही होती। इन बातों से
मल्लाह उतना नही डरते थे जितना मैं डरता था।
पश्चिम देश के निवासी इसकी कल्पना भी नही कर सकते हैं कि वर्षा ऋतु
में पूर्व बंगाल के गाँव और कस्बे कैसे समुद्रवत पानी के बीच में टापू से तैरते रहते
हैं, हजारों बीघा भूमि पानी में डूब जाती है। परन्तु उस भूमि का धान पुरछा-
भर पानी से दो-ढाई हाथ ऊपर निकला रहता है। इन धान के खेतों के बीच से
नावें चला करती हैं। न जाने मल्लाह इन पानी से भरे हुए खेतों के बीच से अपने
रास्ते का निर्णय कैसे करते हैं ! बंगाल की नावों पर छप्पर लगे रहते हैं इन
छप्परों के नीचे आराम से बैठने और लेटने का स्थान रहता है। हम नदी में
चलते हुए छप्पर के नीचे आराम से लेटे हुए थे। न जाने कब नदी को छोड़कर
किसी गाँव की ओर चलने लगे। धान के खेतों के बीच से रास्ता बनाते हुए नाव
चलने लगी। धान के पौधों के साथ नाव के पार्श्वदेव और उसके छप्पर के लगने
से सर, सर-सी आवाज सुनकर जब मैंने छप्पर के नीचे के नाव के आगे की ओर
आदर्शों का संघर्ष / 357
बढ़कर सामने देखा तो देखता हूँ धान के खेतों के बीच न जाने कहाँ छिप गए हैं।
एक लम्बे से बाँस की सहायता से मल्लाह पानी के नीचे की भूमि को ढकेलते
हुए अपनी नाव को आगे बढ़ा रहा है। मैं छप्पर के नीचे से निकलकर नाव के
बाहरी भाग पर खड़ा हो गया तो क्या देखता हूँ कि चारों तरफ अनन्त की ओर
धान के पौधे विस्तृत हैं। और बीच-बीच में कुछ बड़े-बड़े वृक्ष भी दिखाई देते
हैं। संभव है मल्लाह इन्हीं वृक्ष तथा बगीचों को देखकर अपने रास्ते का निर्णय
करता हो। कभी-कभी दूसरी ओर से अन्य नावों को भी आते-जाते देखते थे।
इसी प्रकार खेतों के बीच से नावों पर चलते-चलते एक खाड़ी के अन्दर आ गए।
यह स्थान स्वप्न-लोक-सा मालूम पड़ता था। खाड़ी दोनों ओर से वृक्षों से घिरी
हुई थी। दोपहर के समय भी चारों दिशाओं में सूर्य की दीप्ति रहते हुए भी वृक्षों
से घिरी हुई इस खाड़ी के अन्दर अँधेरा-सा लग रहा था। औपन्यासिकों की सृष्टि
नितान्त काल्पनिक नहीं होती। हम षड्यन्त्रकारी गण ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध
अंग्रेजों की पलटनों और पुलिस की दृष्टि बचाते हुए इस प्रकार नद-नदी और
खाड़ियों के बीच स्वप्नवत घूमते-घूमते मैमनसिंह के एक गांव को गए और लौट
आए।
मैमनसिंह के गांव में जिस मकान में हम लोग ठहरे थे उसके कितने ही कमरे
बाँसों के मचानों के ऊपर बने हुए थे। इस समय पानी तो हट गया था परन्तु
समस्त स्थान सेंवार से भरे हुए थे। इस दृश्य से मनुष्य व्याकुल हो उठता है।
गुप्त मीटिंग होने के बाद इस मकान में हम लोगों को एक रात और रहना पड़ा
था। अनुशीलन समिति के एक नेता श्री प्रतुल गांगुली और मैंने एक ही कमरे में
रात्रि व्यतीत की थी। एक रात जगने के बाद दूसरी रात हम लोग खूब सोये।
पुलिस हम लोगों की खोज में थी। बंगाल आर्डिनेंस के अनुसार हम लोग गिर-
फ्तार किये जा सकते थे। हम लोगों के वारंट नाम से निकले हुए थे। सोते
समय प्रतुल बाबू ने दो मनुष्यों को बारी-बारी से पहरे में रख दिया था।
मीटिंग का सब काम समाप्त होने पर मैं और प्रतुल बाबू कलकत्ता वापस
लौटे। मेरे साथ बंगवाणी नामक प्रसिद्ध बंगला मासिक पत्र के कुछ अंक थे।
इनमे मेरे लिखे हुए बन्दी जीवन के द्वितीय भाग के कुछ अंश छपे थे। रास्ते में
मैंने प्रतुल बाबू को अपने लिखे हुए इन अंशों को पढ़कर सुनाया।
प्रतुल बाबू चाहते थे कि मैं उनके साथ कलकत्ता को वापस जाते हुए बंगाल
के कुछ जिलों में जाऊँ। मैं जानता था कि प्रतुल बाबू को बंगाल की खुफिया
पुलिस अच्छी तरह से पहचानती है। और मैं यह भी जानता था कि बंगाल की
अधिकांश पुलिस मुझे नहीं पहचानती। इसलिए मैं प्रतुल बाबू के साथ नहीं जाना
चाहता था। प्रतुल बाबू ने मुझे अपने साथ ले जाने के लिए बहुत अनुरोध किया
परन्तु मैंने स्वीकार नहीं किया। आखिर में हुआ वही। मैं तो अपने स्थान पर
सकुशल पहुँच गया लेकिन प्रतुल बाबू घूमते-घूमते एक स्थान पर गिरफ्तार हो
गए।
358 / बन्दी जीवन
कलकत्ता पहुंचकर मैंने अनुशीलन समिति के दूसरे साथियों को फिर नये
सिरे से समझाना चाहा कि हम सब प्रतुल गांगुली की तरह एक-एक करके
गिरफ्तार हो जाएंगे और काम कुछ भी न कर पाएंगे। इसलिए हमारे कार्यक्रम
में शीघ्र ही ऐसा परिवर्तन आवश्यक है जिससे गिरफ्तार होने के पहले हम लोग
कुछ कर सकें और भारतवर्ष के स्वतन्त्रता-संग्राम को आगे बढ़ा सकें।
मैमनसिंह से लौटते समय रास्ते में प्रतुल बाबू से मेरी जो कुछ बातचीत
हुई उससे मैंने अनुभव किया था कि प्रतुल बाबू उस समय तक कम्युनिज्म आदि
सिद्धान्तों से परिचित नहीं थे। भारतीय समाज के नव जागरण से राजनीतिक
क्षेत्र में नवीन चेतना का जैसे संचार होगा वैसे ही साहित्य, कला, ऐतिहासिक
गवेषणा, दार्शनिक सिद्धान्तों तथा धार्मिक भावनाओं में भी युगान्तकारी परिवर्तन
होंगे। इस बात से अनभिज्ञ रहने के कारण प्रतुल बाबू और उनके साथी राज-
नीतिक क्षेत्र के एक तंग दायरे के अन्दर ही अपने विशिष्ट कार्यक्रम में लिप्त
रहते थे। मैमनसिंह से वापस लौटते समय मैंने प्रतुल बाबू को अपने कुछ लेख
पढ़कर सुनाए थे। इन लेखों में कुछ दार्शनिक बातों की भी चर्चा थी। प्रतुल बाबू
इन सब बातों को उपेक्षा की दृष्टि से देखते थे। कम्युनिस्ट नेतागण इस बात
को भली प्रकार समझ गए हैं कि दार्शनिक विचार भूमि पर जिस सिद्धान्त की
प्रतिष्ठा नहीं हुई है उसकी उपयोगिता तथा उसका स्थायित्व सन्देह-युक्त है।
समाज का सर्वांगीण विकास तभी सम्भव है जब एक सुचिन्तित एवं सुविन्यस्त
विचारधारा के आधार पर उसकी अभिव्यक्ति होती हो। कम्युनिज्म के इस
दृष्टिकोण से भारतीय नवयुवकगण आज भी अच्छी तरह परिचित नहीं हैं।
कलकत्ता वापस आकर मैंने सब जिलों से अपने दल के कार्यकर्ताओं को
बुलाना प्रारम्भ कर दिया। अधिकांश कार्यकर्त्ता उग्र कार्यक्रम के पक्ष में थे।
हमारे सामने प्रश्न यह था कि एक ओर तो सरकार ने बिना मुकदमा चलाए हम
लोगों को पकड़-पकड़कर जेलों में बन्द करना प्रारम्भ कर दिया था और दूसरी
ओर अनुशीलन समिति के पुराने नेतागण ऐसा कोई काम करना नहीं चाहते थे
जिससे जनता में क्रान्तिकारी भावनाओं का यथेष्ठ प्रचार होता। मैं यह समझता
था कि संगठित रूप से विस्तारपूर्वक युक्तिपूर्ण ओजस्वी लेखों के द्वारा क्रान्ति-
कारी सिद्धान्तों का प्रचार होना परम आवश्यक है एवं इसके साथ-साथ अर्थ-
संग्रह के लिए देशी धनी व्यक्तियों पर डकैती न डालकर सरकारी सम्पत्ति को
लूटने का प्रबन्ध करना पड़ेगा। अनुशीलन के अन्य नेतागण इस बात से सहमत
नहीं हो रहे थे। परन्तु मैंने स्वतन्त्र रूप से इन सब बातों का प्रबन्ध करना
प्रारम्भ कर दिया।
मैमनसिंह सभा के निर्णय के अनुसार अनुशीलन समिति के पुराने कार्यकर्त्ताओं
ने अपने-अपने अधीन सब सदस्यों का मेरे साथ परिचय कराना प्रारम्भ कर दिया।
इसके अतिरिक्त बंगाल के दूसरे क्रान्तिकारी दलों के नेताओं से मैंने स्वतन्त्र रूप
से मिलना प्रारम्भ किया। इस सम्बन्ध में चटगांव के एक दल के मुख्य व्यक्तियों
आदर्शों का संघर्ष / 359
के साथ मेरा परिचय हुआ। सूर्यकान्त सेन इस दल के प्रमुख नेता थे। इनके दो-
तीन विश्वस्त साथियों से मेरी बातचीत हुई थी। यह दल अनुशीलन समिति की
ही एक शाखा थी। अनुशीलन समिति की नीति से ऊबकर इस दल ने उस समिति
से अपने को अलग कर लिया था। यह दल भी मेरी ही तरह उस नीति का पक्ष-
पाती था। इन लोगों से बातचीत करके मैंने ऐसा अनुभव किया कि इनसे मेरी
पट जाएगी। श्री सूर्यसेन के विश्वस्त आदमियों से मेरी बहुत कुछ बातचीत हो
गई। कलकत्ता के अन्य दल के भी कुछ व्यक्ति चटगांव के दल के साथ काम करने
लगे थे। इनसे भी मेरी बातचीत हुई। इन सब बातचीतों के परिणाम में उत्तर-
भारत के दल के साथ इनका सम्पर्क हो गया और जब दक्षिणेश्वर में एक बम
का कारखाना पकड़ा गया तो उसमें हमारे दल के प्रमुख कार्यकर्ता अमर शहीद
राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी भी गिरफ्तार हुए थे। मैं चाहता था कि हम कलकत्ता के दूसरे
क्रान्तिकारी दलों को भी अपने साथ मिलाकर एक विराट दल बना लें। इस कार्य
के सम्बन्ध मे मैं बहुत-से दलों के कार्यकर्ताओं से मिला दूसरी ओर मैंने यह निश्चय
कर लिया कि क्रान्तिकारी दल की ओर से परचे बाँटे जाएँगे। मैं चाहता था कि
पहले पर्चे में क्रान्तिकारी आन्दोलन के कार्यक्रम की एक रूपरेखा अंकित हो
जाय। मेरे प्रति घड़ी के कार्य के अन्तराल मे यह भावना सदा बनी रहती थी कि
अपने पर्चे में किस ढंग से अपने वक्तव्य को प्रभावोत्पादक ढंग से कहूँ। एक दिन
मैं अपने एक साथी के मकान में बैठा था। उनके बड़े भाई भी उस कमरे में बैठे
थे जो कलकत्ता के एक कालेज के इतिहास के प्रोफेसर थे। उन्हें यह पता था कि
मैं क्रान्तिकारी हूँ। योंही बातचीत होते-होते हिंसा-अहिंसा पर बातचीत चल
पड़ी। इस सिलसिले में उक्त प्रोफेसर महोदय ने आयरलैंड के इतिहास की एक
महत्त्वपूर्ण बात मुझे बताई। ग्रैण्ट राबर्टसन लिखित एक अंग्रेज़ी इतिहास ग्रन्थ से
उन्होंने ये वाक्य मुझे दिखाए—"English statesmen have taught the
Irish politicians that England can be bullied but not argued
into justice and generosity."
(अंग्रेज़ राजनीतिज्ञों ने आयरलैंड के नेताओं को यह सिखाया है कि इंग्लैंड
के इशारे से ही नीति के रास्ते पर लाया जा सकता है न कि युक्ति और तर्क की
सहायता से) इस किताब का नाम था 'England under Hatanoverians."
इसे मैंने अपने नोटबुक में नोट कर लिया। इटली के स्वाधीनता संग्राम के इतिहास
को भी मैंने अच्छी तरह से पढ़ लिया था। इटली के इतिहास की बहुत-सी बातें
रह-रहकर मेरी चेतना पर बार-बार आघात करती थी। एक दिन मैंने स्वर्गीय
लाला हरदयाल लिखित एक लेख पढ़ा। उसमें बाइबिल से कुछ वचन उद्धृत हुए
थे। मुझे वे पसन्द आए। उन वाक्यों को भी मैंने नोट कर लिया। उन दिनों मैं
नीत्से को भी पढ़ा करता था। उनके ग्रन्थ की एक बात मुझे बहुत पसन्द आयी :
"Chaos is necessary to the birth of new star." (नवीन तारे के जन्म
के लिए भीषण बवंडर और उथल-पुथल अत्यावश्यक है) इसे भी मैंने नोट कर
360 / बन्दी जीवन
लिया । इस प्रकार पढते समय, घूमते समय, किसी से बात करते समय, किसी के
पास आते-जाते समय, प्रतिक्षण मैं उक्त क्रान्तिकारी पर्चे में लिखने के विषय में
सोचता रहता था।
एक ओर जैसे मै विभिन्न क्रान्तिकारी दलों के कार्यकर्ताओं से बातचीत चला
रहा था और इसके साथ-साथ पर्चे छपवाने का भी प्रबन्ध कर रहा था दूसरी ओर
वैसे ही मैं जापान, फ्रांस एवं अमेरिका (United States) में उपर्युक्त कार्यकर्ताओं
को गुप्त रीति से भेजने का भी प्रबंध कर रहा था। इसके दो उद्देश्य थे। हम
चाहते थे कि हमारे कुछ कार्यकुशल आदमी विदेश में जाकर वैज्ञानिक रीति से
सामरिक विभाग की विभिन्न शिक्षाएँ प्राप्त कर लें। हम चाहते थे कि सामरिक
शिक्षा प्राप्त करने के साथ-साथ दूसरे आदमी गोला-बारूद तोप आदि बनाने के
कारखानों का काम चलाना भी सीख लें। कारण विप्लव के समय अस्त्र-शस्त्र
बनाने का काम आदि हमारे हाथ में नही रहता है तो आधुनिक युग में खुले विद्रोह
को अधिक दिन तक चलाना सम्भव नहीं है। दूसरी बात यह थी कि विदेशो में
जहाँ-जहाँ भारतीय विप्लव का सगठन किया जा रहा था उन स्थानों
आदर्शों का संघर्ष / 361
रास्ते आदि की जाँच-पड़ताल करने लगे । इधर अनुशीलन समिति के अन्य पुराने
नेतागण हमारे कार्यक्रम का तीव्र विरोध करने लगे । मैं भी धीरे-धीरे अत्यन्त
हठ करने लगा । इस खींचा-तानी के परिणाम मे प्रतुल बाबू की गिरफ्तारी के बाद
बहरमपुर में एक और गुप्त सभा हुई । बहरमपुर मुर्शिदाबाद के पास ही का एक
आधुनिक नगर है। यहाँ पर एक बड़ा कालेज भी है। इस सभा मे सर्वश्री नरेन्द्र-
नाथ सेन, रमेशचन्द्र आचार्य आदि अनुशीलन के पुराने नेता उपस्थित थे।
सियालदह एवं हावडा कलकत्ता के इन दो स्टेशनो पर एव उनके निकटवर्ती
छोटे-छोटे स्टेशनों पर भी पुलिस की खूब निगरानी रहती थी। इन लोगो की आंखे
बचाकर मुझे बहरमपुर जाना था। मुझे ऐसा भी सन्देह होने लगा कि पुलिसवाले
मुझे कलकत्ता मे जोरो से ढूँढ़ने लगे है। ऐसी अवस्था मे कैसे मैं कलकत्ता के
बाहर निकल गया और सकुशल वापस आ गया इसका आनुपूर्वीक वर्णन करना मै
आज भी उचित नही समझता हूँ।
बहरमपुर की गुप्त बैठक मे भाग लेकर लौट आने के बाद मै अपन सगठन
और उसके कार्यों को आगे बढाने मे लग गया । बनारस के अपने पुराने साथी श्री
जितेन्द्र मुखर्जी के छोटे भाई श्री धीरेन्द्र मुखर्जी की बात मैं पहले भी कर चुका
हूँ । उनको अपने दल मे सम्मिलित करने का मेरा प्रयत्न निरन्तर चला हुआ था।
इतने आदमियो के रहते हुए भी मैं क्यो धीरेन्द्र के पीछे इतना समय नष्ट कर
रहा था। इसका एक कारण तो यह था कि धीरेन्द्र विज्ञान के बहुत अच्छे छात्र
थे। हम लोगो मे ऐसे व्यक्ति बहुत कम थे जिनमे त्याग हो, दुर्दमनीय साहस हो,
बुद्धिमत्ता हो एवं जो विद्या-बुद्धि-सम्पन्न हो और विज्ञान का ज्ञाता हो। यदि मै
धीरेन्द्र को क्रान्तिकारी बना लेता तो उनमे उन सब गुणो का समावेश हम पा
सकते थे। दूसरी बात यह थी कि वे हमारे परिचित मित्रो मे से थे । इलाहाबाद
मे उन्होने मुझसे राजनीति में आने की प्रबल इच्छा प्रकट की थी। इधर प्रबल
ब्रिटिश साम्राज्य की समस्त पुलिस शक्ति मेरा पीछा कर रही थी। ऐसी अवस्था
में मेरे साथ सम्बन्ध रखने मे धीरेन्द्र अनिच्छुक नही थे। उनके जैसा व्यक्ति
जिस किसी काम में जुट जाएगा उसी मे सफलता प्राप्त करेगा ऐसी मेरी धारणा
थी। इसलिए मै उनको अपने दल मे लाने की आशा से बार-बार उनके पास
जाया करता था।
जन-साधारण की तरह धीरेन्द्र भी यही समझते थे कि क्रान्तिकारियों में
विचारवान अभिज्ञ समझदार व्यक्ति नही होते हैं। कुछ अर्द्धशिक्षित उत्तेजना-
प्रवण, अविवेचक किन्तु साहसी देशप्राण युवकवृन्द असहिष्णु होकर अव्यवस्थित
रूप से आतंकवादी बन गए है। यथार्थ में विराट् रूप से ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध
विद्रोह करने के लिए न कोई संगठन ही है और न कोई ऐसी भावना ही है। मेरी
लिखी 'बन्दी जीवन' पुस्तक जैसी कुछ पुस्तको के प्रकाशित होने के बाद ही जन-
साधारण को थोड़ा-बहुत पता लगा कि भारत मे भी एक व्यापक विद्रोह की
प्रचेष्टा चल रही थी । मेरे संस्पर्श मे आकर श्रीरेन्द्र को भी अपना भ्रम मालूम
362 / बन्दी जीवन
पड़ा कि भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन निरा बच्चों का खिलवाड़ नहीं है। परन्तु
उनकी गांधी-प्रीति उन्हें हमारे दल में आने से रोक रही थी। यदि किसी दिन
तुमुल तर्क के बाद मैं उन्हें कुछ झुकता हुआ पाता था तो किसी दूसरे दिन पुनः
वही पुराना तर्क खड़ा हो जाता था। धीरेन्द्र बार-बार इस बात पर जोर देते कि
अहिंसा नीति पर ही विराट् जन-आन्दोलन की सृष्टि हो सकती है जैसी महात्मा
जी ने की है। उनके समझाने पर भी मैं यह नहीं समझ पाता था कि विराट् रूप
से जन-आन्दोलन करने के लिए अहिंसा के सिद्धान्त पर इतना अधिक जोर डालने
की क्या आवश्यकता है। महात्माजी के कथनानुसार यह बात सत्य नहीं है कि
व्यक्तिगत जीवन में जैसा हम तपस्या के परिणाम में अहिंसा के द्वारा हिंसा को
जीत सकते हैं, उसी तरह से तपस्या न करके ही असंख्य जनसाधारण स्थूल दृष्टि
से अहिंसक रहने पर कैसे हिंसा पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। ममत्व बोध का
पूर्ण रीति से बिना त्याग किए कोई भी मनुष्य यथार्थ में अहिंसक नहीं हो सकता
है। ममत्व बोध का त्यागना जीवनभर की तपस्या का परिणाम होता है। जन-
साधारण से ऐसी तपस्या की आशा हम कैसे कर सकते हैं फिर परिपूर्ण तपस्या के
बाद जो कुछ प्राप्त की जाती है उस सिद्धि को पहले ही आधे रास्ते में ही हम कैसे
प्राप्त कर सकते हैं। इन सब कारणों से सैद्धान्तिक रूप से हम अहिंसा नीति का
प्रयोग राजनीति के क्षेत्र में नहीं कर सकते। इसका अर्थ यह नहीं है कि हिंसा के
मार्ग पर ही हम जन-आन्दोलन को चला सकते हैं, हमारे पास अस्त्र नहीं है इस-
लिए हम बाध्य होकर जन-आन्दोलन को ऐसे मार्ग पर चला देंगे जिसमें अस्त्र की
आवश्यकता नहीं होगी। महात्माजी की मनोकामना तो यह है कि संसार को अहिंसा
रूपी नवीन धर्म देकर अपने जीवन को सार्थक बनाएं। इस नवीन धर्म प्रचार के
सामने भारत की स्वतन्त्रता का प्रश्न नितान्त तुच्छ बन गया है परन्तु पिछले
महायुद्ध के अवसर पर ब्रिटिश सरकार को अर्थ एवं जन की सहायता देकर
महात्माजी ने कैसे अहिंसानीति का पालन किया यह बहुतों के लिए नितान्त
दुर्बोध्य है। मेरे ऐसे क्रान्तिकारी के निकट अहिंसा के प्रश्न की मीमांसा इस
प्रकार है कि जैसे एक प्रवीण चिकित्सक रोगी की मंगल-कामना से प्रेरित होकर
उसकी देह पर बल-प्रयोग अथवा शल्योपचार करता है तो इस आचरण को कोई
भी सुधी जन हिंसात्मक नहीं कह सकता। उसी तरह यदि कोई क्रान्तिकारी
सरलतापूर्वक शुद्ध हृदय से निरहंकार होने की प्रबल चेष्टा करते हुए समाज की
कल्याण कामना से प्रेरित होकर सशस्त्र विद्रोह के लिए षड्यन्त्र करता है तो वह
भी हिंसा नहीं है। सशस्त्र क्रान्ति का आन्दोलन उचित है या नहीं, हिंसा-अहिंसा
के प्रश्न के साथ इसका कोई सम्बन्ध नहीं है। भारतीय दार्शनिक दृष्टि से हम यह
कह सकते हैं कि जो व्यक्ति ममता बोध का अतिक्रम कर चुका है उसके निकट
हिंसा अथवा द्वन्द्व ममत्व बोध तक ही सीमित है। जिस साधक का ममत्व बोध
लुप्त हो गया है और उसका जीवन लक्ष्य मानव-समाज की सेवा करना है उसका
व्यक्तित्व मानव-समाज से भिन्न नहीं है। कौन-सा लक्ष्य मानव-कल्याण के
आदर्शों का संघर्ष / 363
अनुकूल है यह भी एक स्वतन्त्र प्रश्न है और इसके साथ भी हिंसा-अहिंसा का
कोई सम्बन्ध नहीं है। कल्याण-अकल्याण की धारणा भी हिंसा और अहिंसा नीति
पर अवलम्बित नहीं है। अर्थात् समाज की कल्याण-कामना से यदि हम ऐसे मार्ग
का अवलम्बन करते हैं जिसमें दण्ड का प्रयोग हो तो उसको हम हिंसात्मक
आचरण नहीं कह सकते। समाज अथवा राष्ट्र का परिचालन तभी सुचारू रूप
से सम्पन्न हो सकता है जब आवश्यकता पड़ने पर हम उपयुक्त रीति से दण्ड
का प्रयोग कर सकें। इससे यह तात्पर्य निकालना उचित न होगा कि संसार में
शान्ति की आवश्यकता नहीं है अथवा शान्ति से संघर्ष अधिक श्रेयस्कर है। संसार
में शान्ति की इच्छा सभी करते हैं। परन्तु यह शान्ति तभी संभव है जब मनुष्यों
के आचरण एक-दूसरे के प्रति न्याययुक्त हों। स्वार्थबुद्धि ही संसार में सब अनर्थों
का मूल है। जब तक संसार के समस्त मनुष्य स्वार्थ लेश शून्य न हो जाएँ तब तक
संसार में शान्ति संभव नहीं है। इस प्रकार मनुष्य चरित्र में संशोधन किए बिना
केवल अहिंसा नीति के प्रचार से हम संसार में शान्ति नहीं ला सकते।
आध्यात्मिक दृष्टि से जब तक हम एक परिपूर्णांग जीवनादर्श का विकास नहीं
करते तब तक संसार में शान्ति संभव नहीं है।
कोरिया में, चीन में, मिश्र में, आयरलेंड में तथा रूस के अन्यान्य प्रदेशों में भी
तो विराट् रूप से आन्दोलन हुए हैं। वहाँ तो हिंसा-अहिंसा नीति पर भारतवर्ष
की तरह व्यर्थ की चर्चा नहीं होती थी। जनान्दोलन को सफल बनाने के लिए
अहिंसा नीति को इतना अधिक महत्त्व देना कायरता का लक्षण मालूम पड़ता है।
अस्तु धीरेन्द्र से मेरा वाद-विवाद चलता रहा और अन्त में वे हमारे दल में सम्मि-
लित होने के लिए प्रस्तुत हो गए। उनकी अमेरिका जाने की तैयारी होने लगी।
मैं ऐसा अनुमान कर रहा था कि भारतवर्ष में रहते हुए क्रान्तिकारी आन्दोलन में
भाग लेने से धीरेन्द्र कुछ हिचक रहे थे। सम्भव है वह ऐसा सोच रहे हों कि भारत
में क्रान्तिकारी आन्दोलन में भाग लेने से वे कुछ कर भी नहीं पाएँगे और व्यर्थ के
लिए उन्हें कठिन दण्ड भोगना पड़ेगा। और विदेश जाने में एक रोमांचकारी
जीवनयापन की आशा बनती है। यह सन्तोष उत्पन्न होता है कि इस प्रकार से
अपना जीवन किसी न किसी प्रकार सफल होगा। मैं आशा कर रहा था कि इस
लालच से धीरेन्द्र हमारे दल में सम्मिलित हो जाएँगे। मेरी आशा सफल हो गई।
आज हमारे वही पुराने साथी श्री धीरेन्द्रनाथ मुकर्जी कट्टर नास्तिकवादी हो
गए हैं, कम्यूनिस्ट सिद्धान्त के आधार पर काम करना चाहते हैं। इस दिन वह
कट्टर गांधी भक्त बन गए थे। आज उसी तरह वे कट्टर कम्यूनिस्ट पन्थी बन गए।
मैंने एक व्यक्ति विशेष को लेकर इतनी आलोचना एक विशेष कारणवश की है।
धीरेन्द्र के लिए जहाज़ में बॉय (Boy) के काम की व्यवस्था हो गई। अमे-
रिका की तरफ जाने वाले एक जहाज़ में धीरेन्द्र काम करने वाले थे। जहाज़ के
रवाना होने का दिन भी निश्चित हो गया। मैंने उन्हें बड़ी कठिनता से पाँच सौ
रुपये जमा करके दिए। जाने का दिन ज्यों-ज्यों निकट आने लगा त्यों-त्यों धीरेन्द्र