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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 356, कुल 408 में से

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पृष्ठ 356

354 / बन्दी जीवन'
बैठक हुई। बहरमपुर के दो-तीन नेताओ के अतिरिक्त और कोई उपस्थित न
था। मैमनसिंह की बैठक में लगभग आठ नेता उपस्थित थे । इस सभा में मैंने
हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की नियमावली सबको दिखलाई इसे देखकर
उन नेताओं के मन में परस्पर कुछ विरोधी भावनाओ की उत्पत्ति हुई। यह मेरा
अनुमान है क्योंकि उन सबों ने इस नियमावली की प्रशंसा भी की थी और साथ
ही यह भी कहा था कि इस प्रकार की लिखित नियमावली की कोई आवश्यकता
नहीं है। जिन सिद्धान्तो के आधार पर यह नियमावली बनाई गई थी मेरी समझ
में उन तक इन लोगो में से किसी की पहुँच न थी। कम्यूनिज्म की नीति से ये
लोग बहुत कुछ अपरिचित थे। बड़े पैमाने में विप्लव की आयोजना के स्थान पर
इन लोगों ने अभी तक केवल आतंकवाद को ही सबसे अधिक महत्त्व दिया था।
आज सन् 1939 ई० में बंगाल की अनुशीलन समिति की यह नीति निर्धारित हुई
है कि अपने दल के स्वतन्त्र अस्तित्व को स्थिर रखने हुए वह दल कांग्रेस समाज-
वादी दल में पूर्ण रूप से सम्मिलित हो जाय। अर्थात् कम्यूनिज्म की नीति को वह
दल आज अपनाना चाहता है तथापि कम्यूनिस्ट पार्टी में सम्मिलित होना वह
उचित नहीं समझता। इसमे यह अनुमान करना स्वाभाविक है कि या तो अनु-
शीलन समिति कम्यूनिज्म के सिद्धान्त को ठीक-ठीक ग्रहण नही कर पाया अथवा
यह बात है कि उसने कम्यूनिज्म के सिद्धान्त को जान-बूझकर ग्रहण नहीं किया।
कम्यूनिस्ट सिद्धान्त को यथार्थ रूप से ग्रहण कर लेने पर कम्यूनिस्ट पार्टी में
सम्मिलित हो जाना स्वाभाविक है। इसमे और भी बहुत-सी बातें हैं जिनकी
आलोचना इस स्थान पर करने की आवश्यकता नही है। यहाँ पर मैं केवल
इतना ही बतलाना चाहता हूँ कि आज जैसे अनुशीलन समिति के नेतागण
समाजवाद के सिद्धान्तों को कुछ सीमा तक ग्रहण कर रहे हैं। मैमनसिंह की
मीटिंग के अवसर पर हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की नीति में समाजवाद
के जितने सिद्धान्त ग्रहण किये गए थे उन्हें वे उस समय नही ग्रहण कर पाए
थे।
मैमनसिंह की मीटिंग रात-भर होती रही लेकिन मेरी समझ मे उस मीटिंग
में किसी विशेष महत्त्वपूर्ण बात का निर्णय नहीं हो पाया था। कुछ समय तक मैंने
उन लोगों की बातचीत में सहर्ष भाग लिया परन्तु जब मैने देखा कि बात मे बात
बढ़ जाती है और काम की बात कुछ नही हो पाती तो मैंने और अधिक बातचीत
करना उचित नहीं समझा। ऐसा मालूम पड़ता था कि राजनैतिक परिस्थितियों
से कैसे लाभ उठाया जा सकता है, उन परिस्थितियों के अन्तराल में कौन-कौन-
सी शक्तियाँ प्रबल रूप से कार्य कर रही हैं, भविष्य मे इन परिस्थितियों के रूप
कैसे पलटा खाएँगे, जनसाधारण के सामने किस प्रकार अपने सिद्धान्तों को रखना
आवश्यक है जिससे भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन का रुख बदल जाय एवं जनसाधा-
रण प्रकाश्य नेताओं के नेतृत्व की अपेक्षा क्रान्तिकारियो के निर्देशों का प्रभाव
अधिक परिलक्षित हो सके, इन सब बातो का मर्म अनुशीलन समिति