बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआदर्शों का संघर्ष / 353
के नाम से प्रसिद्ध था। मुर्शिदाबाद और बहरमपुर पास-पास हैं जैसे कि पटना
और बाँकीपुर। मुझे कलकत्ते से बहरमपुर जाना था। हावड़ा और सियालदह के
स्टेशनों पर पुलिस की कड़ी निगरानी थी। लेकिन मेरा जाना तो आवश्यक था
ही। इसलिए कलकत्ते से बारह-चौदह मील दूर एक छोटे-से स्टेशन से ट्रेन पर
सवार हुआ और बहरमपुर न उतरकर उसके पहले ही एक अन्य स्टेशन पर उतर
गया। ऐसे आने-जाने के अवसरों पर थोड़ी-सी भूल के कारण गिरफ्तार हो जाना
सम्भव था। मेरे कई साथी इसी प्रकार गिरफ्तार हो चुके थे। एक सुप्रतिष्ठित
साम्राज्य के विरुद्ध लड़ाई लड़ने की तैयारी करना असाधारण कठिनाई और
संकट से पूर्ण है। इन्हीं सब बातों को देखते हुए हमारे देशवासी राष्ट्रीय षड्यन्त्रों
के मामलों में लिप्त होने में इतने हिचकिचाते हैं। इतिहास के दृष्टान्तों से उन्हें
कोई संकेत नहीं मिलता। कैसर के सुप्रतिष्ठित सुदृढ़ साम्राज्य के विरुद्ध जर्मनी
के क्रान्तिकारियों ने सफलतापूर्वक विद्रोह किया इस बात से उन्हें कोई प्रोत्साहन
नहीं मिलता, आयरलैंड ने ब्रिटेन के नितांत समीपवर्ती होने पर भी उनके विरुद्ध
विद्रोह किया, इससे भी हमारे देशवासियों को कोई शिक्षा नही मिलती। रूस में
भी राज्यक्रान्ति हो गई लेकिन फिर भी हमारे देशवासी समझते हैं कि ब्रिटिश
साम्राज्यशाही के विरुद्ध विद्रोह करने की कल्पना करना भी वाचालतामात्र है।
पता नही हम लोगों को यह सनक कैसे सवार हुई।
बहरमपुर की मीटिंग में हम लोगों का कोई समझौता नही हो पाया। बहुत
वितण्डावाद के बाद मैने अनुशीलन समिति के नेताओं को साफ-साफ बतला दिया
कि यदि वे लोग उग्र कार्यक्रम की नीति को स्वीकार नही कर सकते हैं तो मैं उत्तर
भारत में अर्थात् संयुक्त प्रांत और पंजाब में अपनी नीति के अनुसार कार्य करना
प्रारम्भ कर दूंगा। यदि उन लोगों को यह नीति स्वीकृत नही है तो मैं विवश हूँ।
आर्डिनेंस तो जारी होने ही वाला है। जेलो मे हम लोगों को सड़ना ही है। कुछ
काम करके क्यों न जाएँ। देशबन्धुदासजी की वक्तृता के पहले से ही कलकत्ते में
जोरों की अफ़वाह फैली हुई थी कि डिफेंस आफ इण्डिया ऐक्ट की तरह एक
नया काला क़ानून आर्डिनेंस के रूप में जारी होनेवाला है। दासजी की वक्तृता
के थोडे ही दिन बाद आर्डिनेन्स जारी हो गया था। दासजी की वक्तृता न भी
हुई होती तो भी यह क़ानून जारी अवश्य होता इसमे कोई सन्देह नही। इसकी
तैयारी पूरी तरह से हो रही थी। यह बात सबको मालूम थीं। मेरी दृढ़ता को
देखकर अनुशीलन के नेतागण कुछ विचलित हुए और उन्होंने यह कहा कि पर्चे
बाँटने व छपवाने का काम अभी आरम्भ कीजिए नोट बनाने की परीक्षा समाप्त
होने तक डकैती का काम स्थगित रखिए। पर्चे बाँटते समय केवल इस बात पर
ध्यान रखना है कि जिन स्थानों में उनके नेताओं के केन्द्र हैं उन स्थानों में ऐसा
कोई काम न होना चाहिए जिससे पुलिस की दृष्टि उन स्थानों पर आकृष्ट हो
सके। मैंने इसे भी स्वीकार कर लिया।
इसके बाद मैमनसिंह जिले के एक गांव में हमारे दल के सब नेताओं की एक