बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआदर्शों का संघर्ष | 347
इटली के प्रसिद्ध क्रान्तिकारी नेता जोसेफ मेजिनी ने एक स्थान पर ऐसा भी कहा
है कि सैकड़ों सभाएँ अथवा पर्चे बाँटने की अपेक्षा एक क्रान्तिकारी बलवे से हज़ारों
गुना अधिक काम होता है। सम्भव है अंग्रेज़ी शब्दों के आधार पर जो उद्धरण
ऊपर दिया गया है उसमें मूल से कुछ थोड़ा-बहुत अन्तर हो, लेकिन उसके तात्पर्य
में कोई अन्तर नही है। इसके साथ-साथ यह भी निश्चित है कि मेजिनी 'यंग-
इटली' नामक जो पर्चा निकाला करते थे उसका साहित्यिक एवं क्रान्तिकारी
प्रभाव इटली के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा है। दूसरे देशों से ये पर्चे इटली
में आते थे। विदेशों में रहकर ही मेजिनी 'यंग इटली' का सम्पादन कार्य करते
थे। इटली में किसी व्यक्ति के पास इस पर्चे से निकलने पर उसे फाँसी का दण्ड
दिया जाता था। 'यंग इटली' के लेखों का संग्रह करके ग्रथित आज भी अंग्रेज़ी में
एक ग्रन्थ उपलब्ध है और उसे प्रत्येक शिक्षित व्यक्ति बड़े उत्साह के साथ पढ़ता
है और उससे लाभ उठाता है। उसकी नैतिक एवं साहित्यिक मर्यादा आज भी
पूर्ववत अक्षुण्ण है। इसकी तुलना में भारतवर्ष में राष्ट्रीय आन्दोलन या क्रान्ति-
कारी आन्दोलन के सम्पर्क में हम कुछ भी नहीं दिखला सकते। रूस के क्रान्तिकारी
आन्दोलन के प्रति दृष्टिपात करने पर भी हमें विदित हो जाएगा कि उपयुक्त
साहित्य की सृष्टि की दृष्टि से हमारा आन्दोलन कितना पिछड़ा हुआ था और अब
भी है। चीन में भी राष्ट्रीय क्रान्तिकारी आन्दोलन के सम्पर्क में लाखों की संख्या
में पर्चे एवं पुस्तिकाएँ बाँटी गई हैं। उस देश में भी नवीन आन्दोलन के सम्पर्क में
एक नवीन साहित्य की सृष्टि हुई है। केवल इतना ही नहीं, अपितु डाक्टर सन-
यातसेन आदि प्रमुख नेताओं ने चीन के दार्शनिक विचारों में भी महान् परिवर्तन
लाने की चेष्टा की थी। इसी प्रकार रूस के विप्लवी नेताओं ने भी विचार जगत्
में विप्लव मचा दिया था। भारत में भी श्री अरविन्द एवं स्वर्गीय स्वामी
विवेकानन्द, रामतीर्थ, दयानन्द, लोकमान्य तिलक जैसे महानुभाव नेताओं ने
दार्शनिक दृष्टिकोण से तीव्र जागृति पैदा की थी, एक नवीन दार्शनिक आन्दोलन
प्रबल रूप से प्रारम्भ कर दिया था।
इस स्थान पर मेरे कहने का इतना ही तात्पर्य है कि अनुशीलन समिति के
नेताओं में मैंने आधुनिक युगपयोगी मानसिक उत्कर्षता को नहीं पाया था।
और उनकी कार्य-प्रणाली मुझे पसन्द न थी, इसलिए उनके माथ मेरी पटती नहीं
थी।
उत्तर भारत में मैंने जो अपना कार्यक्रम और नियमावली छपवाई थी अनु-
शीलन समिति के नेताओं ने उसको कोई महत्त्व नहीं दिया। वे सब ऐसे कागज़ी
नियम क़ानून को देखकर हँसा करते थे। उन नेताओं में से अधिकांश आधुनिक
विचारधारा से नितान्त अनभिज्ञ थे। मैंने उन्हें बहुत समझाना चाहा कि मान
लीजिए पण्डित जवाहरलाल जैसे विचारवान व्यक्ति के पास हमें अपना कार्यक्रम
लेकर जाना पड़े तो हमारे पास युक्ति एवं शृंखलाबद्ध ऐसा कौन-सा कार्यक्रम है
जिसको लेकर हम उनके सामने सगौरव खड़े हो सकते हैं। 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन