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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 363, कुल 408 में से

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पृष्ठ 363

आदर्शों का संघर्ष / 361
रास्ते आदि की जाँच-पड़ताल करने लगे । इधर अनुशीलन समिति के अन्य पुराने
नेतागण हमारे कार्यक्रम का तीव्र विरोध करने लगे । मैं भी धीरे-धीरे अत्यन्त
हठ करने लगा । इस खींचा-तानी के परिणाम मे प्रतुल बाबू की गिरफ्तारी के बाद
बहरमपुर में एक और गुप्त सभा हुई । बहरमपुर मुर्शिदाबाद के पास ही का एक
आधुनिक नगर है। यहाँ पर एक बड़ा कालेज भी है। इस सभा मे सर्वश्री नरेन्द्र-
नाथ सेन, रमेशचन्द्र आचार्य आदि अनुशीलन के पुराने नेता उपस्थित थे।
सियालदह एवं हावडा कलकत्ता के इन दो स्टेशनो पर एव उनके निकटवर्ती
छोटे-छोटे स्टेशनों पर भी पुलिस की खूब निगरानी रहती थी। इन लोगो की आंखे
बचाकर मुझे बहरमपुर जाना था। मुझे ऐसा भी सन्देह होने लगा कि पुलिसवाले
मुझे कलकत्ता मे जोरो से ढूँढ़ने लगे है। ऐसी अवस्था मे कैसे मैं कलकत्ता के
बाहर निकल गया और सकुशल वापस आ गया इसका आनुपूर्वीक वर्णन करना मै
आज भी उचित नही समझता हूँ।
बहरमपुर की गुप्त बैठक मे भाग लेकर लौट आने के बाद मै अपन सगठन
और उसके कार्यों को आगे बढाने मे लग गया । बनारस के अपने पुराने साथी श्री
जितेन्द्र मुखर्जी के छोटे भाई श्री धीरेन्द्र मुखर्जी की बात मैं पहले भी कर चुका
हूँ । उनको अपने दल मे सम्मिलित करने का मेरा प्रयत्न निरन्तर चला हुआ था।
इतने आदमियो के रहते हुए भी मैं क्यो धीरेन्द्र के पीछे इतना समय नष्ट कर
रहा था। इसका एक कारण तो यह था कि धीरेन्द्र विज्ञान के बहुत अच्छे छात्र
थे। हम लोगो मे ऐसे व्यक्ति बहुत कम थे जिनमे त्याग हो, दुर्दमनीय साहस हो,
बुद्धिमत्ता हो एवं जो विद्या-बुद्धि-सम्पन्न हो और विज्ञान का ज्ञाता हो। यदि मै
धीरेन्द्र को क्रान्तिकारी बना लेता तो उनमे उन सब गुणो का समावेश हम पा
सकते थे। दूसरी बात यह थी कि वे हमारे परिचित मित्रो मे से थे । इलाहाबाद
मे उन्होने मुझसे राजनीति में आने की प्रबल इच्छा प्रकट की थी। इधर प्रबल
ब्रिटिश साम्राज्य की समस्त पुलिस शक्ति मेरा पीछा कर रही थी। ऐसी अवस्था
में मेरे साथ सम्बन्ध रखने मे धीरेन्द्र अनिच्छुक नही थे। उनके जैसा व्यक्ति
जिस किसी काम में जुट जाएगा उसी मे सफलता प्राप्त करेगा ऐसी मेरी धारणा
थी। इसलिए मै उनको अपने दल मे लाने की आशा से बार-बार उनके पास
जाया करता था।
जन-साधारण की तरह धीरेन्द्र भी यही समझते थे कि क्रान्तिकारियों में
विचारवान अभिज्ञ समझदार व्यक्ति नही होते हैं। कुछ अर्द्धशिक्षित उत्तेजना-
प्रवण, अविवेचक किन्तु साहसी देशप्राण युवकवृन्द असहिष्णु होकर अव्यवस्थित
रूप से आतंकवादी बन गए है। यथार्थ में विराट् रूप से ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध
विद्रोह करने के लिए न कोई संगठन ही है और न कोई ऐसी भावना ही है। मेरी
लिखी 'बन्दी जीवन' पुस्तक जैसी कुछ पुस्तको के प्रकाशित होने के बाद ही जन-
साधारण को थोड़ा-बहुत पता लगा कि भारत मे भी एक व्यापक विद्रोह की
प्रचेष्टा चल रही थी । मेरे संस्पर्श मे आकर श्रीरेन्द्र को भी अपना भ्रम मालूम