बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
पृष्ठ 351, कुल 408 में से
संदर्भ में पढ़ेंआदर्शों का संघर्ष / 345
सुविधा हो जाएगी ।
इस व्याख्यान के बहुत पहले ही देहली में कांग्रेस के विशेष अधिवेशन के
ठीक बाद ही कुछ व्यक्तियों को बंगाल में रेगुलेशन 3 के अनुसार गिरफ्तार कर
लिया गया था। मैं अपने साथियों से, अर्थात् अनुशीलन समिति के नेताओं से,
यही कहा करता था कि आप लोग सब यों ही विशेष क़ानून के अनुसार गिरफ्तार
हो जाएँगे काम कुछ होगा नही, मुफ्त में जेल काटेंगे और क्रान्तिकारी आन्दोलन
कम-से-कम कुछ दिनों के लिए तो दब ही जाएगा। इससे बेहतर है कि कुछ ऐसा
काम किया जाय जिससे जनता के सामने यह सिद्ध हो जाय कि अंग्रेजों की सामरिक
शक्ति के मुकाबले मे जनता में भी शक्ति-संचय करने की योग्यता है और
इससे भी बढ़कर एक और काम यह करना है कि जिससे भारतवासियों की विचार-
धारा में घोर क्रान्ति मच जाय । काग्रेस के नेतागण दिन-रात यही प्रचार किया
करते थे कि क्रान्ति के मार्ग से भारत को स्वाधीन करना सम्भव नही है । भारत
की जनता भी समझती है कि ब्रिटिश सरकार की सामरिक शक्ति के सामने
उसके पास कोई शक्ति नही है। यदि यह भावना सत्य है तो इसका अर्थ होत
है कि भारतवर्ष कभी भी अंग्रेजों की अधीनता से मुक्त नहीं हो सकता। इस
मानसिक अवस्था के रहते हुए क्रान्ति कैसे सम्भव है ? इस मानसिक दुर्बलता को
मिटाने के लिए हम लोगों को सर्वप्रथम आन्तरिक प्रयत्न करना पड़ेगा। ये सब
काम हम लोग करते नही । केवल गुप्त रीति से षड्यन्त्र करने से क्या बनेगा ।
लेकिन अनुशीलन समिति के नेतागणों को यह बात पसन्द नही थी। वे चाहते
थे संगठन फैल जाय, गुप्त रीति से बाहर से अस्त्र-शस्त्र मँगवाये जाएँ तब जाकर
दूसरे कामो में हाथ लगाया जाय । परन्तु संगठन का काम जारी रखना सरल
काम न था। स्थूल दृष्टि से किसी काम का सहारा न लेकर संगठन का कार्य
चलाना सम्भव नही है। सस्था के प्रत्येक व्यक्ति के लिए कुछ-न-कुछ काम होना
विशेष आवश्यक है। यदि किसी संस्था की ओर से प्रत्येक सदस्य के लिए उप-
युक्त काम नहीं दिया जा सकता तो वह संस्था उन्नति नहीं कर सकती। प्रत्येक
संस्था के यथारीति संचालन के लिए धन की विशेष आवश्यकता होती है। भारत
में क्रान्तिकारी संस्थाओं के लिए धन-संग्रह करना एक अत्यन्त कठिन समस्या थी
और बिना धन के कोई काम होना सम्भव न था। क्रान्ति के कार्य में पूर्ण समय
देनेवाले गृह-त्यागी सब प्रकार से निस्वार्थी एवं साहसी कार्यकर्ताओं के अलावा
दूसरों से विप्लव-कार्य चलाना सम्भव नही है। लेकिन प्रश्न यह है कि ऐसे
कार्यकर्ताओं का निर्वाह कैसे हो। फिर समग्र भारतवर्ष के प्रत्येक प्रान्त में ऐसे
कार्यकर्ताओं के सदा घूमते रहने का भी तो खर्च है। क्रान्तिकारी साहित्य का
प्रचार करना, पर्चे बाँटना, सामयिक पत्रादि का चलाना इन सब कामों के लिए
भी तो पैसे की आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त भारत के बाहर भी आना-जाना
है, विदेश से बडे पैमाने में अस्त्र-शस्त्र भी तो मँगाना है। इतना पैसा कहाँ से
आए ?