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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 348, कुल 408 में से

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पृष्ठ 348

346 / बन्दी जीवन
जन-साधारण के सामने अपने मनोभावों को व्यक्त करते रहें, और देश की विभिन्न
परिस्थितियों में अपने स्वतन्त्र विचारों को दृढ़तापूर्वक जनता के सामने रखें तो
यह सम्भव हो सकता है कि क्रान्तिकारीगण भी जनता के हृदय पर अधिकार
स्थापन कर लें। अनुशीलन समिति के नेताओं में यह प्रवृत्ति नहीं थी।
मैं अनुशीलन समिति के जितने नेताओं के संस्पर्श में आया उससे मेरे मन
में यह धारणा हो गई थी कि उनके मानसिक उत्कर्ष उस प्रकार के न थे जिस
प्रकार यूरोप के क्रान्तिकारी नेताओं में पाये जाते हैं। लेकिन उनके अनुयायियों
में से ऐसे बहुत-से प्रतिभाशाली युवक थे जिनमें उपर्युक्त नेतृत्व गुणों का उन्मेष
था, किन्तु अनुशीलन समिति की कार्य-प्रणाली के कारण इन प्रतिभाशाली युवकों
को अपनी प्रतिभा के प्रयोग का अवसर नहीं मिल रहा है। क्रान्तिकारी आन्दोलन
की प्रथम अवस्था में थोड़ी आयु के बहुत-से नवयुवकों ने स्कूल कालेजों से पड़ना
छोड़कर योगदान किया था। रूस, आयरलैण्ड अथवा इटली में भी ऐसा ही
हुआ था। लेकिन उन देशों में एवं विशेष रूप से रूस देश में क्रान्तिकारियों ने अपनी
कार्य-प्रणाली, उद्यम एवं अध्यवसाय से अद्भुत मानसिक उत्कर्ष को प्राप्त कर
लिया था। रूस के क्रान्तिकारीगण जब तक पकड़े नहीं जाते थे तब तक राज-
नीतिक कार्यों में प्रचंड रूप से लगे रहते थे। उस समय उन्हें अपना मानसिक
उत्कर्ष प्राप्त करने का अवसर नहीं मिलता था। लेकिन पकड़े जाने पर जेलों में
उन्होंने अपने समय का अपने मानसिक उत्कर्ष साधन में अच्छा सदुपयोग किया।
हमारे देश में भी ऐसा ही हुआ है।
अनुशीलन समिति की कार्य-प्रणाली से बहुत-से उग्र मत वाले सदस्य असन्तुष्ट
थे। ये सदस्यगण ऐसे कार्यक्रम के पक्षपाती थे जिसमे जनता पर क्रान्तिकारी
आन्दोलन का यथेष्ट प्रभाव पड़े। इन लोगों ने अनुशीलन समिति के पुराने नेतृत्व
के विरुद्ध विद्रोह करके एक अलग कार्यक्रम बना लिया था। ये केवल गुप्त रीति
से षड्यन्त्र करके ही तृप्त नहीं होते थे। वे ऐसा काम करना चाहते थे जिससे
जनता मे क्रान्तिकारी भावना तीव्र रूप मे फैल जाए और उसे प्रतीत हो जाय कि
क्रान्तिकारी मार्ग से भारत को स्वतन्त्र करना सम्भव है। चिटागाँव के स्वर्गीय
सूर्यकान्त सेन इस दल के अग्रणी थे। चिटागाँव अथवा चटगांव में इनका पूरा
अधिकार था। परन्तु दूसरे बहुत-से जिलो मे भी इनके पक्ष के आदमी कई थे।
मैं भी अनुशीलन समिति के नेताओं की नीति से सन्तुष्ट नहीं था। पिछले
क्रान्तिकारी आन्दोलन के अनुभव से मैं यह समझ गया कि किसी आन्दोलन की
सहायता के लिए पर्याप्त रूप से उसके पक्ष में उपयुक्त साहित्य की सृष्टि करना
अत्यन्त आवश्यक है। हम लोगों ने क्रान्तिकारी आन्दोलन के पक्ष में साहित्य की
सृष्टि कहने योग्य कुछ भी नहीं की थी। इसके अतिरिक्त हमारी कार्य-प्रणाली
ऐसी नहीं होती थी कि जिससे जनसाधारण को हम क्रान्तिकारी मार्ग पर चलने
के लिए प्रोत्साहित कर सकते। गुप्त रीति से दो-चार पिस्तौल इकट्ठे किये या
कुछ बम बना लिए तो केवल इसी से देश को कैसे स्वाधीन किया जा सकता है !