बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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नदियों के भी चौराहे होते हैं। बंगाल में इन्हें मोहाना कहते हैं। ऐसे जोहानों
पर नावों के लिए खतरा रहता है। किसी-किसी मोहाने के लिए नाविकों में ऐसी
किंवदन्तियां प्रचलित हैं कि अमुक स्थान पर प्रायः नावें डूब जाती हैं। उन
स्थानों से गुजरते समय पूर्व बंगाल के मुसलमान नाविकगण भी नदियों की देवियों
की प्रार्थना करने लगते हैं। पूर्व बंगाल के प्रायः सभी मल्लाह मुसलमान होते हैं।
परन्तु संकट के समय देव, देवी, जिन्द आदि के भी वे पुजारी बन जाते हैं।
इंग्लैण्ड के प्रसिद्ध ऐतिहासिक वक्ल साहब का कहना है कि समुद्र और नदियों
में प्रकृति के निष्ठुर एवं अनियमित आचरणों के कारण नाविक में कुसंस्कार की
मात्रा अत्यन्त अधिक होती है। संभव है इस सिद्धान्त में कुछ सत्यता हो।
मैं वर्षा ऋतु के अन्त में नाव पर मैमनसिंह आया था एवं इसके पहले भी
मुझे पूर्व बंगाल एक-आध दफ़े आना पड़ा था। इन अवसरों पर पूर्व बंगाल के
नौका-रोहण के रहस्य से कुछ-कुछ परिचित हुआ था। नौका पर चलते हुए किसी-
किसी मोहाने पर नाविकों की मानसिक उत्कंठा को देखकर हमारे मन में भी एक
मानसिक उद्वेग उत्पन्न हो जाता था कभी-कभी ऐसे अवसरों पर यह शंका उत्पन्न
हो जाती थी कि ब्रिटिश पुलिस के निर्यातन से तो छुटकारा पा गए परन्तु अब
इन नदी-देवियों के हाथ से निष्कृति पाना दुष्कर है। मल्लाहों एवं यात्रियों में बात-
चीत होने लगती है कि कब-कब इन स्थानो पर कौन-कौन मल्लाह किन-किन
यात्रियों को लेकर नदी गर्भ में विलुप्त हो गए थे। ऐसी परिस्थिति में कुसंस्कार
विमुक्त साहसी पुरुषों के हृदयों में भी मुहूर्त-भर के लिए तो एक अव्यक्त शंका
उपस्थित हो ही जाती है। मुंह से तो हँसते रहते हैं और मूढ़ जनता के कुसंस्कारों
पर अवज्ञा, उपहास एवं अवहेलना की कृपा दृष्टि डालते हैं और अपने को उनसे
श्रेष्ठ समझते हैं परन्तु हृदय के गुप्त कन्दर में एक अनिर्देश्य भय बना रहता है
कि कहीं डूब न जाएँ। कभी-कभी आकाश-मण्डल में जब काले-काले घने बादल
दिखाई देने लगते हैं तो भी मन में कुछ कम शंका पैदा नही होती। इन बातों से
मल्लाह उतना नही डरते थे जितना मैं डरता था।
पश्चिम देश के निवासी इसकी कल्पना भी नही कर सकते हैं कि वर्षा ऋतु
में पूर्व बंगाल के गाँव और कस्बे कैसे समुद्रवत पानी के बीच में टापू से तैरते रहते
हैं, हजारों बीघा भूमि पानी में डूब जाती है। परन्तु उस भूमि का धान पुरछा-
भर पानी से दो-ढाई हाथ ऊपर निकला रहता है। इन धान के खेतों के बीच से
नावें चला करती हैं। न जाने मल्लाह इन पानी से भरे हुए खेतों के बीच से अपने
रास्ते का निर्णय कैसे करते हैं ! बंगाल की नावों पर छप्पर लगे रहते हैं इन
छप्परों के नीचे आराम से बैठने और लेटने का स्थान रहता है। हम नदी में
चलते हुए छप्पर के नीचे आराम से लेटे हुए थे। न जाने कब नदी को छोड़कर
किसी गाँव की ओर चलने लगे। धान के खेतों के बीच से रास्ता बनाते हुए नाव
चलने लगी। धान के पौधों के साथ नाव के पार्श्वदेव और उसके छप्पर के लगने
से सर, सर-सी आवाज सुनकर जब मैंने छप्पर के नीचे के नाव के आगे की ओर