बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
पृष्ठ 357, कुल 408 में से
संदर्भ में पढ़ेंआदर्शों का संघर्ष / 355
के नेतागण उपलब्ध नहीं कर पाए थे। क्रान्तिकारी आन्दोलन में ऐसे व्यक्तियों
का नितान्त अभाव होने के कारण भारतीय राजनीति पर उस आन्दोलन का
उतना प्रभाव नहीं दिखाई पड़ा जितना कि उचित रूप से पड़ना चाहिए था।
मैमनसिंह की मीटिंग में बंगाल, युक्त प्रान्त एवं पंजाब के संगठन का समस्त
कार्यभार मेरे ऊपर छोड़ दिया गया।
वर्षार्ऋतु का अभी अवसान नहीं हुआ था। वायुमंडल वाष्प-भार से
क्लान्त हो रहा था। प्रकृति में तरी के आधिक्य के कारण मनुष्यों के मन नीरस
हो रहे थे। ग्रीष्म ऋतु के अन्त में जैसे नव-नीरद दल को देखने के लिए मनुष्य
तरस जाते हैं वर्षा ऋतु के अन्त में वैसे ही वे नीरद जल से ऊबकर निर्मल
आकाश में सूर्य का प्रकाश देखने के लिए चंचल हो उठते हैं। उत्तर भारत के
निवासियो के लिए तो यह एक साधारण बात है। परन्तु वर्षा ऋतु के अन्त मे
बंगाल एवं विशेष करके पूर्व बंगाल सदा स्नेहार्द्र सजल तटभूमि और जलाशयों के
ऊपर अममान आवाम-स्थानों को देखकर उत्तर भारत के निवासी विस्मय पुल-
कित हो जाते है और व्याकुल भी हो उठते हैं।
पूर्व बंगाल मे जितनी नदियां है भारतवर्ष-भर मे इतनी और कही नही
मिलेगी। मानो उस देश की नदियों का जाल बिछा हुआ है पूर्व बंगाल में जितने
स्टीमर चलते है उतने भारतवर्ष-भर मे और कही नही। वर्षा ऋतु में तो स्टीमर
और नावों की सहायता के बिना कही भी आना-जाना सम्भव ही नही।
नौका पर यात्रा की शोभा एवं उसके सकटो का कुछ भी आभास इन लेखों
से नही मिल सकता। भाषा की परिपाटी से कल्पना का उद्रेक हो सकता है।
परन्तु कल्पना और वास्तविकता मे आकाश पाताल का अन्तर है। नदी के किनारे-
किनारे नौका चल रही है। इतने में पास से स्टीमर निकल गया। स्टीमर के
अधिक समीप रहने में नौका को अत्यन्त खतरा रहता है। और अधिक दूरी पर
रहने से भी स्टीमर के निकलने से जो उत्ताल तरंगें उत्पन्न होती हैं उनका सामना
करना पड़ता है। पूर्व बंगाल के नाविकों को इस बात का बहुत ध्यान रहता है।
नौका के पार्श्व में तरंगों का आघात होने से उसके उलट जाने की विशेष सम्भा-
वना रहती है। इसलिए खवैये तरंगों को आते हुए देखकर अपनी नावों के सम्मुख
भागों को उन तरंगों की ओर मोड़ देते हैं एवं इस प्रकार से नावों को चलाते हैं
कि दोलायमान होने पर भी उनके उलटने की संभावना बहुत कम रह जाती है।
वैशाख के महीने मे तो इतनी आँधियाँ आती हैं कि नौका पर यात्रा करना
भयप्रद होता है। नावें अक्सर पाल लगाकर चलती हैं और जरा-सी भूल के कारण
एक झोके से ही वे उलट सकती हैं। पालों का उपयोग करने में पूर्व बंगाल के
नाविक बहुत ही अनुभवी होते हैं। शहर की सड़कों पर जिस प्रकार इक्के-तांगे
तथा मोटरों के आपस में लड़ जाने की मदा आशंका बनी रहती है उमी प्रकार
पूर्व बंगाल में नदियों पर नावों के आपस में लड़ जाने की सदा आशंका बनी
रहती है। जैसे शहरों में सड़कों के चौराहे होते हैं उसी प्रकार पूर्व बंगाल में