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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 353, कुल 408 में से

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पृष्ठ 353

आदर्शों का संघर्ष / 351
क्रान्तिकारी आन्दोलन के लिए अर्थ-संग्रह करना एक अत्यन्त कठिन समस्या
थी। अनुशीलन समिति के नेतागण इस बार डाका डालकर अर्थ-संग्रह करने के
अत्यन्त विरोधी थे। कारण यह कि ऐसा करने से वे समझते थे कि क्रान्तिकारी
आन्दोलन को धक्का लगेगा, पुलिस सचेत हो जाएगी, और इस प्रकार संगठन-
कार्य पूरा होने के पहले ही इतनी बाधाएं उपस्थित होंगी कि शान्ति से काम
करना कठिन हो जाएगा। उस समय मैं इन लोगों की राय से सहमत नही हो
सका। मैं यह समझता था कि बलपूर्वक अर्थ सग्रह करने की नीति के कारण हम
लोगो मे छापामार युद्ध (गोरीलावार) चलाने की शक्ति उत्पन्न होती जाएगी
और अर्थ का सग्रह भी होगा तथा सगठित रूप से सकटपूर्ण कार्यं में हाथ बटाने
का अभ्यास भी होता जाएगा। अपने आदमियों मे कौन साहसी है, किसमें
कितनी त्याग की भावना है, सकट का सामना करने के लिए कितने व्यक्ति प्रस्तुत
हैं इन सब बातो का ठीक-ठीक पता चलता रहेगा। परन्तु मैं ग्रामीणों के घर मे
डाका डालने का पक्षपाती न था। अनुशीलन समिति के नेतागणों की नीति को
न मानकर मैं कलकत्ता के निकटस्थ बड़े-बड़े अंग्रेज़ मिल मालिको के रुपयों पर
हाथ डालने का प्रबन्ध करने लगा था। उनको भी यह बात मालूम थी। इसी
समय मै बम्बई और पजाब मेल ट्रेन के डाक के डिब्बे पर छापा मारने की तैयारी
कर रहा था। इसके अतिरिक्त क्रान्तिकारी नीति पर भी मैं एक लेख लिख रहा
था। मैं चाहता था कि अपने दल की ओर से जनता की जानकारी के लिए
क्रान्तिकारी आन्दोलन के कार्यक्रम को स्पष्ट शब्दों में खोलकर रख दिया जाय।
यदि प्रकाश्य रूप से कोई सामयिक पत्र चलाने का अवसर हमे प्राप्त नहीं है तो
कम-से-कम गुप्त रीति से पर्चे बँटवाने की व्यवस्था तो हमें अवश्य ही करनी
चाहिए। अनुशीलन समिति के नेतागण मेरी इन नीतियों के घोर विरोधी थे।
कलकत्ता मे आकर अनुशीलन समिति की सहायता न लेते हुए स्वतन्त्र रूप
मे मैं लोकसग्रह के कार्य मे जुट गया था। इसी प्रकार मैंने कुछ लोग इकट्ठे किए
जो कि यूनिवर्सिटी ट्रेनिंगकोर मे सामरिक शिक्षा पा रहे थे। ये सब कालेजों के
लड़के थे। इनमे दो एक इंजीनियरिंग कालेज के लड़के भी थे। इन लोगों की
सहायता से श्री सुशीलकुमार बैनर्जी नामक एक अच्छे कार्यकर्ता से मेरा परिचय
हो गया। ये पहले ही अनुशीलन समिति के सदस्य बन चुके थे। एक दिन मैंने
श्री सुशीलकुमार के साथ रास्ते पर चलते हुए कुछ नौजवानो को कांग्रेस-कार्य
करने मे तत्पर देखा। इनमे से एक के प्रति मेरी दृष्टि विशेष रूप से आकृष्ट,
हुई। ये साँवले रंग के थे। आयु लगभग बीस वर्ष की होगी। मैंने सुशील बाबू से
कहा कि मैं इस युवक से परिचित होना चाहता हूँ। सुशील बाबू ने कहा कि मेरी
भी निगाह इस पर लगी हुई है परन्तु इसके कुछ ऐसे मित्र है जो हमारी समिति
में नही है। मैने कहा कि अब देर करने की आवश्यकता नहीं है। सुशील बाबू कुछ
देर करना चाहते थे लेकिन मैंने कहा कि मैं आज ही उनसे मिलना चाहता हूँ।
उस दिन तो नही, परन्तु दो-एक दिन के अन्दर ही उनसे मेरा परिचय हो गया।