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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 352, कुल 408 में से

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पृष्ठ 352

350 / बन्दी जीवन
कांग्रेस अथवा अन्य संस्थाओं के लिए तो रास्ता खुला है, उनके लिए प्रकाश्य
रूप से अर्थ मांगा जा सकता है। उन संस्थाओं के लिए पैसा देने में भी कोई भय
की बात नही है। क्रान्तिकारी आन्दोलन के लिए तो एक पैसा देना भी खतरे
की बात है। इस संकट मे पडने के लिए भारतवासी आज भी प्रस्तुत नही है।
ऐसी परिस्थिति मे क्रान्तिकारी आन्दोलन को कैसे सफल किया जाय।
दूसरे देश के क्रान्तिकारी आन्दोलन के विस्तृत इतिहास को पढ़ने पर भी
ठीक प्रकार से यह पता नही चला कि उन देशों मे उक्त समस्या का समाधान
वहां के क्रान्तिकारी कैसे करते थे। मैट्सिनी के जीवन मे ऐसा भी समय आया
था कि प्रत्येक इटैलियन से एक-एक रुपया माँगने पर भी मैट्सिनी को कुछ भी
नही मिला था। रूस की बोल्शेविक पार्टी की नीति के अनुसार डाका डालकर
अर्थ संग्रह क रना उचित नही समझा गया था तथापि लेनिन की अनुमति एव
अनुमोदन से स्टालिन के दल को डकैती द्वारा अर्थ-संग्रह करना पड़ा था। लेकिन
यह भी बात सत्य है कि आयरलैंड मे शीनफीन पार्टी के लिए प्रत्येक सदस्य चन्दा
दिया करता था। प्रधानतया इसी चन्दे मे दल का काम चलता था।
यदि हम लोग किसान और मजदूर आन्दोलन मे यथारीति भाग लिए होते
तो सम्भव था कि कुछ सीमा तक हमारा आर्थिक संकट निवारित हो जाता लेकिन
मजदूर अथवा किसान आन्दोलन के लिए जैसे व्यक्तियो की आवश्यकता होती है
वैसे हमारे पास अधिक सख्या मे न थे। मामूली कार्यकर्ता तो हमारे पास बहुत
थे परन्तु जिनमे उपयुक्त सगठन शक्ति हो जिनमे कुछ नियन्त्रण शक्ति हो
ऐसे व्यक्ति हमारे पास अधिक न थे। जितने व्यक्ति थे भी उन्हें हम लोगो ने
क्रान्तिकारी सगठन मे कार्य मे लगा रक्खा था। यदि मै फरार हालत मे न होता
तो मै यथा-रीति मजदूर आन्दोलन मे काम कर सकता था जैसा कि मैने जमशेदपुर
मे प्रारम्भ किया था। लेकिन फरार हालत मे ऐसा करना सम्भव न था। इन
सब बातो के होते हुए भी मजदूरो मे काम करने के लिए मैने अपने आदमी भेजना
प्रारम्भ कर दिया था। श्री एम० एन० राय के दल के आदमी उन व्यक्ति-विशेष
की सहायता से जिनसे देहली मे मेरा परिचय हुआ था। मैने अपने आदमी
कलकत्ते के आस-पास के मिलो मे भेजना प्रारम्भ कर दिया था। यदि मै कुछ
दिन और न पकड़ा जाता तो सम्भव था थोडे ही दिनो मे हमारे आदमी
मजदूर-आन्दोलन मे भी भली प्रकार से काम करने लगते और क्रान्तिकारी
आन्दोलन के साथ-साथ मजदूर आन्दोलन मे भी हमारा दल निपुण और योग्य
हो जाता। कलकत्ते से काँचडा पाडा इत्यादि स्थानो के आने-जाने का खर्च
श्री एम० एन० राय के साथी श्री कुतुबुद्दीन अहमद दिया करते थे। उन लोगो
ने मजदूरो मे जागृति फैलाने के लिए एक साप्ताहिक पत्र भी निकाला था। हमारे
आदमी इन पत्रो को मजदूरो मे बेचने के लिए मिलो और कारखानो मे ले जाते
थे। लेकिन क्रान्तिकारी आन्दोलन के कार्य मे सहायता देने के लिए कुतुबुद्दीन
साहब तैयार न थे।