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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 350, कुल 408 में से

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पृष्ठ 350

348 / बन्दी जीवन
एसोसिएशन' ऐसा ही एक युक्तियुक्त प्रोग्राम है जिसे हम किसी भी चिन्तनशील
व्यक्ति के सामने सगौरव रख सकते हैं। लेकिन अनुशीलन समिति के नेताओं ने
उपेक्षा की हंसी हंसकर हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की नियमावली एवं
कार्यक्रम को एक तरफ उठाकर रख दिया। मैंने समझ लिया कि उनकी समझ
उक्त एसोसिएशन के आदर्श तक नहीं पहुंच पाई है।
इसके अतिरिक्त उन नेताओं के पास जनता के सामने रखने योग्य कोई
कार्यक्रम नहीं था। मैं चाहता था कि अब की बार इस प्रकार से कार्य किया जाय
जिससे जन-साधारण पर क्रान्तिकारी आन्दोलन का अमोघ प्रभाव परिलक्षित
हो। अनुशीलन समिति के नेतागण विरोधी थे। वे ऐसा कोई काम नहीं करना
चाहते थे जिससे जनता की दृष्टि क्रान्तिकारी आन्दोलन के प्रति आकृष्ट होती।
इसका कारण यह था कि वे पुलिस की दृष्टि को बचाना चाहते थे। वे ऐसा
समझते थे कि अभी ऐसा कोई काम करना उचित नहीं है जिससे पुलिस की
दृष्टि क्रान्तिकारी आन्दोलन के प्रति आकृष्ट हो जाय। वे चाहते थे कि तैरना
भी सीख जाएं और पानी भी न छूना पड़े। वे भूल गए थे कि राजनीतिक क्षेत्र
में ऐसा सम्भव नहीं है।
जैसाकि मैं पहले उल्लेख कर चुका हूँ देशबन्धुदासजी से मेरी बातचीत के
परिणामतः उन्हें यह प्रतीत हो गया था कि क्रान्तिकारी आन्दोलन समग्र उत्तर
भारत में प्रबल और विस्तृत रूप से बढ़ रहा है। और उसी समय एक भाषण में
दासजी ने सरकार को यह चेतावनी दी थी कि भारतवासियों की मांग को
अविलम्ब पूरा न करने से भारत में एक भीषण परिस्थिति उत्पन्न होगी क्योंकि
कांग्रेस के अतिरिक्त भारत के क्रान्तिकारीगण भी भीषण रूप से काम कर रहे
हैं। यदि गवर्नमेंट यह सोचती है कि क्रान्तिकारी आन्दोलन दब गया है तो यह
उसकी भारी भूल है। भारत में क्रान्तिकारी आन्दोलन दबा नहीं है। सरकार
को पता नहीं है कि यह आन्दोलन कितना उग्र रूप धारण करने जा रहा है।
यह भी मैं पहले ही बतला चुका हूँ कि इस व्याख्यान के बाद सरकार की ओर से
खुफिया विभाग के सुपरिटेण्डेण्ट श्री भूपेन्द्र चटर्जी को दासजी के पास भेजा गया
था। इस घटना के बाद दासजी से मेरी बातचीत हुई थी । दासजी के व्याख्यान
से सरकार को यह शंका हो गई थी कि कहीं महायुद्ध के समय की तरह फिर
क्रान्तिकारी आन्दोलन उग्र रूप धारण न कर ले। भूपेन्द्र चटर्जी दासजी से
यह जानना चाहते थे कि क्या उनकी धारणा में शीघ्र ही विप्लव मच सकता है।
दासजी क्यों ऐसा समझते हैं कि भारत में क्रान्तिकारी आन्दोलन उग्र रूप धारण
कर रहा है ? क्रान्तिकारियों के साथ दासजी का क्या और कहाँ तक सम्बन्ध है ?
दासजी के इस व्याख्यान से अनुशीलन समिति के नेतागण मुझसे असन्तुष्ट
हो गए थे। उनकी धारणा थी कि इस व्याख्यान से क्रान्तिकारी आन्दोलन को
विशेष धक्का पहुंचेगा। मैं समझता था कि इस व्याख्यान से क्रान्तिकारी भावनाओं
का खूब प्रचार होगा, इससे क्रान्तिकारी मार्ग पर कार्य करने के लिए विशेष