सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 365, कुल 408 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 365

आदर्शों का संघर्ष / 363
अनुकूल है यह भी एक स्वतन्त्र प्रश्न है और इसके साथ भी हिंसा-अहिंसा का
कोई सम्बन्ध नहीं है। कल्याण-अकल्याण की धारणा भी हिंसा और अहिंसा नीति
पर अवलम्बित नहीं है। अर्थात् समाज की कल्याण-कामना से यदि हम ऐसे मार्ग
का अवलम्बन करते हैं जिसमें दण्ड का प्रयोग हो तो उसको हम हिंसात्मक
आचरण नहीं कह सकते। समाज अथवा राष्ट्र का परिचालन तभी सुचारू रूप
से सम्पन्न हो सकता है जब आवश्यकता पड़ने पर हम उपयुक्त रीति से दण्ड
का प्रयोग कर सकें। इससे यह तात्पर्य निकालना उचित न होगा कि संसार में
शान्ति की आवश्यकता नहीं है अथवा शान्ति से संघर्ष अधिक श्रेयस्कर है। संसार
में शान्ति की इच्छा सभी करते हैं। परन्तु यह शान्ति तभी संभव है जब मनुष्यों
के आचरण एक-दूसरे के प्रति न्याययुक्त हों। स्वार्थबुद्धि ही संसार में सब अनर्थों
का मूल है। जब तक संसार के समस्त मनुष्य स्वार्थ लेश शून्य न हो जाएँ तब तक
संसार में शान्ति संभव नहीं है। इस प्रकार मनुष्य चरित्र में संशोधन किए बिना
केवल अहिंसा नीति के प्रचार से हम संसार में शान्ति नहीं ला सकते।
आध्यात्मिक दृष्टि से जब तक हम एक परिपूर्णांग जीवनादर्श का विकास नहीं
करते तब तक संसार में शान्ति संभव नहीं है।
कोरिया में, चीन में, मिश्र में, आयरलेंड में तथा रूस के अन्यान्य प्रदेशों में भी
तो विराट् रूप से आन्दोलन हुए हैं। वहाँ तो हिंसा-अहिंसा नीति पर भारतवर्ष
की तरह व्यर्थ की चर्चा नहीं होती थी। जनान्दोलन को सफल बनाने के लिए
अहिंसा नीति को इतना अधिक महत्त्व देना कायरता का लक्षण मालूम पड़ता है।
अस्तु धीरेन्द्र से मेरा वाद-विवाद चलता रहा और अन्त में वे हमारे दल में सम्मि-
लित होने के लिए प्रस्तुत हो गए। उनकी अमेरिका जाने की तैयारी होने लगी।
मैं ऐसा अनुमान कर रहा था कि भारतवर्ष में रहते हुए क्रान्तिकारी आन्दोलन में
भाग लेने से धीरेन्द्र कुछ हिचक रहे थे। सम्भव है वह ऐसा सोच रहे हों कि भारत
में क्रान्तिकारी आन्दोलन में भाग लेने से वे कुछ कर भी नहीं पाएँगे और व्यर्थ के
लिए उन्हें कठिन दण्ड भोगना पड़ेगा। और विदेश जाने में एक रोमांचकारी
जीवनयापन की आशा बनती है। यह सन्तोष उत्पन्न होता है कि इस प्रकार से
अपना जीवन किसी न किसी प्रकार सफल होगा। मैं आशा कर रहा था कि इस
लालच से धीरेन्द्र हमारे दल में सम्मिलित हो जाएँगे। मेरी आशा सफल हो गई।
आज हमारे वही पुराने साथी श्री धीरेन्द्रनाथ मुकर्जी कट्टर नास्तिकवादी हो
गए हैं, कम्यूनिस्ट सिद्धान्त के आधार पर काम करना चाहते हैं। इस दिन वह
कट्टर गांधी भक्त बन गए थे। आज उसी तरह वे कट्टर कम्यूनिस्ट पन्थी बन गए।
मैंने एक व्यक्ति विशेष को लेकर इतनी आलोचना एक विशेष कारणवश की है।
धीरेन्द्र के लिए जहाज़ में बॉय (Boy) के काम की व्यवस्था हो गई। अमे-
रिका की तरफ जाने वाले एक जहाज़ में धीरेन्द्र काम करने वाले थे। जहाज़ के
रवाना होने का दिन भी निश्चित हो गया। मैंने उन्हें बड़ी कठिनता से पाँच सौ
रुपये जमा करके दिए। जाने का दिन ज्यों-ज्यों निकट आने लगा त्यों-त्यों धीरेन्द्र