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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 346, कुल 408 में से

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पृष्ठ 346

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आदर्शों का संघर्ष
कामरेड एम० एन० राय के जो व्यक्ति देहली में मुझसे मिले थे उनसे मैं
कलकत्ते में फिर मिला। श्री कुतुबुद्दीन अहमद का नाम मैं पहले ही बता चुका हूँ।
कलकत्ता में उनके मकानात थे। मैं यह आशा करता था कि उनसे मुझे पैसे की
सहायता मिलेगी। इनकी सहायता से मैं चाहता था कि विदेश में मैं अपना आदमी
और अपना सन्देश भेजूँ। सन् 1914 के क्रान्तिकारी आन्दोलन की अभिज्ञता से
मुझे मालूम था कि बड़े पैमाने में अस्त्र-शस्त्र आदि के मँगाने की व्यवस्था किए
बिना क्रान्तिकारी आन्दोलन सफल नहीं हो सकता। एवं यह भी मैंने देखा था कि
पिछले आन्दोलन में हम लोगों ने विदेश में स्थित क्रान्तिकारी दलों के साथ कोई
सम्बन्ध स्थापित न करने से बहुत धोखा खाया। इन सब पिछली त्रुटियों को
दृष्टिकोण में रखते हुए अबकी बार विदेश में आदमी भेजने की मैंने यथेष्ठ चेष्टा
की, लेकिन कुतुबुद्दीनजी की सहायता से कोई सफलता प्राप्त नहीं हुई।
जिस रीति से क्रान्तिकारी दल के आदमी विदेश आया-जाया करते थे वह
आज पुलिस को मालूम हो गई है। उस रीति का अवलम्बन करके विदेश आना-
जाना बहुत कठिन हो गया है। जो बात पुलिस को मालूम है उसे जनता के सामने
रखने में कोई हानि नहीं है।
श्री कुतुबुद्दीन से पता चला कि वे अपने आदमी खलासी अथवा जहाज़ के
अन्य कर्मचारियों के रूप में भर्ती कराते थे, और विदेश आकर ये व्यक्ति जहाज़ से
उतरकर लापता हो जाते थे। मैंने भी सन् 1911 में एक बार अमेरिका भाग जाने
की निष्फल चेष्टा की थी।
सन् 1924 ई० के प्रारम्भ में थोड़े-से व्यक्ति रेगुलेशन 3 में नज़रबन्द कर
दिये गए थे। लेकिन मेरे कलकत्ता पहुँचने के बाद सरकार ने एक नये क़ानून के
अनुसार बड़ी संख्या में नौजवानों को गिरफ्तार कर लिया और अदालत में बिना
पेश किये ही उन्हें जेल में बन्द कर दिया। इसी सिलसिले में सुभाषबाबू भी
गिरफ्तार हो गए।
इसके पहले ही मैं देशबन्धुजी से मिल चुका था। उन्होंने हम लोगों को निय-
मित रूप से सहायता देने का वचन भी दिया था लेकिन अत्यन्त दुर्भाग्यवश यह
सहायता मिलने के पहले ही दासजी मुझसे अत्यन्त असन्तुष्ट हो गए थे। देश-